भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१ २३

सम्बन्ध— अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनका फल वर्णन करते हैं—

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥

'उक्त साधनसे विघ्नोंका अभाव और आत्माके स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है।'

व्याख्या— अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और आत्माके स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है; अतः यह निर्बीज समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है ॥२९॥

सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं—

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शना-

लब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपा-

स्तेऽन्तरायाः ॥३०॥

'व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व—ये नौ चित्तके विक्षेप हैं, ये ही अन्तराय (विघ्न) हैं।'

व्याख्या— योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप