भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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२२ पातञ्जलयोगदर्शन

**व्याख्या—**नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है । इसी कारण शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञ-को सब यज्ञोंसे श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), 'ॐ' उस परमेश्वरका वेदोक्त नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १ । २ । १५-१७) इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ॥२७॥

**सम्बन्ध—**ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं—

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥

'उस ॐकारका जप और उसके अर्थस्वरूप परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये।'

**व्याख्या—**यही पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या शरणागति है। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहुत-से प्रकार हैं, परन्तु यह सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है। गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३)। इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी साधनोंको ईश्वरकी प्रसन्नताके हेतु होनेसे निर्बीज समाधिकी सिद्धिके हेतु समझना चाहिये अर्थात् ईश्वर-की भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥२८॥