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पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

२२ पातञ्जलयोगदर्शन

**व्याख्या—**नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है । इसी कारण शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञ-को सब यज्ञोंसे श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), 'ॐ' उस परमेश्वरका वेदोक्त नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १ । २ । १५-१७) इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ॥२७॥

**सम्बन्ध—**ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं—

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥२८॥

'उस ॐकारका जप और उसके अर्थस्वरूप परमेश्वरका चिन्तन करना चाहिये।'

**व्याख्या—**यही पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या शरणागति है। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहुत-से प्रकार हैं, परन्तु यह सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है। गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३)। इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी साधनोंको ईश्वरकी प्रसन्नताके हेतु होनेसे निर्बीज समाधिकी सिद्धिके हेतु समझना चाहिये अर्थात् ईश्वर-की भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥२८॥

समाधिपाद-१ २३

सम्बन्ध— अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनका फल वर्णन करते हैं—

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥२९॥

'उक्त साधनसे विघ्नोंका अभाव और आत्माके स्वरूपका ज्ञान भी हो जाता है।'

व्याख्या— अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और आत्माके स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है; अतः यह निर्बीज समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है ॥२९॥

सम्बन्ध— पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं—

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शना-

लब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपा-

स्तेऽन्तरायाः ॥३०॥

'व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व—ये नौ चित्तके विक्षेप हैं, ये ही अन्तराय (विघ्न) हैं।'

व्याख्या— योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप

२४ पातञ्जलयोगदर्शन

उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।

( १ ) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाना 'व्याधि' है।

( २ ) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव 'स्त्यान' है।

( ३ ) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें सन्देह हो जानेका नाम 'संशय' है।

( ४ ) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना ( बेपरवाही ) करते रहना 'प्रमाद' है।

( ५ ) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना 'आलस्य' है।

( ६ ) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे 'अविरति' कहते हैं।

( ७ ) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं है, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना 'भ्रान्तिदर्शन' है।

( ८ ) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना—यह 'अलब्धभूमिकत्व' है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।

समाधिपाद-१ २५

( ९ ) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना 'अनवस्थितत्व' है ।

इन नौ प्रकारके चित्त-विक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न, योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥३०॥

सम्बन्ध—इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं—

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेप-सहभुवः ॥३१॥

'दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास—ये पाँच विघ्न विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।'

व्याख्या—( १ ) दुःख—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण, व्याधि आदिके कारण या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको 'आध्यात्मिक दुःख' कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी, सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिभौतिक दुःख' है। तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली पीड़ाका नाम 'आधिदैविक दुःख' है।

( २ ) दौर्मनस्य—इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे 'दौर्मनस्य' कहते हैं।

२६ पातञ्जलयोगदर्शन

( ३ ) अङ्गमेजयत्व—शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना 'अङ्गमेजयत्व' है।

( ४ ) श्वास—विना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'श्वास' है।

( ५ ) प्रश्वास—बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना 'प्रश्वास' है।

ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको 'विक्षेपसहभू' कहते हैं ॥३१॥

सम्बन्ध—उक्त विघ्नोंको दूर करनेका उपाय बतलाते हैं—

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥३२॥

'उनको दूर करनेके लिये एक तत्त्वका अभ्यास ( करना चाहिये )। '

व्याख्या—उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विघ्नोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥३२॥

सम्बन्ध—चित्तके अंदर राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता; अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं—

समाधिपाद-१ २७

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य-

विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥३३॥

'सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्मा—ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी मित्रता, दया, प्रसन्नता और उपेक्षाकी भावनासे चित्त स्वच्छ हो जाता है।'

व्याख्या—सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका नाश होकर चित्त शुद्ध—निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥३३॥

सम्बन्ध—चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं—

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥३४॥

'अथवा प्राणवायुको बारंबार बाहर निकालने और रोकनेके अभ्याससे भी चित्त निर्मल हो जाता है।'

व्याख्या—बारंबार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेके अभ्याससे तथा यथाशक्ति बाहर रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका मल भी नष्ट होता है ॥३४॥

सम्बन्ध—प्रसङ्गवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य हेतु बतलाते हैं—

२८ पातञ्जलयोगदर्शन

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

'विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मनकी स्थितिको बाँधनेवाली हो जाती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है; इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें हेतु बन जाती है ॥३५॥

सम्बन्ध—इसी प्रकारका और भी हेतु बतलाते हैं—

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ ३६॥

'इसके सिवा (यदि) शोकरहित ज्योतिष्मती प्रवृत्ति (उत्पन्न हो जाय तो वह) भी मनकी स्थिति करनेवाली होती है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥३६॥

सम्बन्ध—अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं—

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

'वीतरागको विषय करनेवाला चित्त भी (स्थिर हो जाता है)।'

समाधिपाद-१ २९

**व्याख्या—**जिन पुरुषोंके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषोंको ध्येय बनाकर अभ्यास करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥३७॥

**सम्बन्ध—**और भी अन्य उपाय बतलाते हैं—

स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

'स्वप्न और निद्राके ज्ञानका अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है।'

**व्याख्या—**स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो जाता है तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीति नहीं होती, उसी प्रकार समस्त वृत्तियोंका बाध करके वृत्तियोंके अभावके ज्ञानका अवलम्बन करनेसे अर्थात् उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता हो, उस समय यह अभ्यास नहीं करना चाहिये। जिस समय चित्त और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥३८॥

**सम्बन्ध—**मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं—

३०पातञ्जलयोगदर्शन

यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥

'जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यानसे भी मन स्थिर हो जाता है।'

व्याख्या—उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे भी मन स्थिर हो जाता है ॥ ३९॥

सम्बन्ध—चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है—

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥

'(उस समय) इसका परमाणुसे लेकर परम महत्त्वतक वशीकार हो जाता है।'

व्याख्या—अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है, उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थसे लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है ॥४०॥

सम्बन्ध—पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है, उसके बाद किस प्रकार

समाधिपाद-१ · ३१

क्रमसे संप्रज्ञात और निर्बीज समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं—

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥४१॥

'जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिकमणिकी भाँति निर्मल चित्तका जो ग्रहीता (पुरुष), ग्रहण (अन्तःकरण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयों) में स्थित हो जाना और तदाकार हो जाना है, यही संप्रज्ञात समाधि है।'

व्याख्या—पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३ । ४४) या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७) अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३ । ४९)—जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर तदाकार हो जाता है। इसीको संप्रज्ञात समाधि कहते हैं; क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है, उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता।*


* इसी समाधिका वर्णन पहले सतरहवें सूत्रमें भी आया है, वहाँ वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारोंके सम्बन्धसे होनेवाले योगको संप्रज्ञात बतलाया है।

३२ पातञ्जलयोगदर्शन

सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें न तो आनन्दानुगत समाधिकी चर्चा की है, न ग्रहण या इन्द्रियानुगतकी और न अस्मिता या पुरुषानुगतकी; इस कारण यद्यपि यह विषय स्पष्ट नहीं होता, परन्तु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला दी, इससे मन, इन्द्रियाँ और अस्मिताका उसीमें अन्तर्भाव माना जा सकता है। सम्भव है, इसीसे उन्होंने इन्द्रियानुगत और अस्मितानुगत समाधिके भेदोंका अलग वर्णन न किया हो; क्योंकि तीसरे पादके ४४ वें, ४७ वें और ४९ वें सूत्रमें जहाँ ग्राह्यविषयक, ग्रहण-विषयक और ग्रहीतृविषयक संयमका फल बताया है, वहाँ ग्राह्यके सूक्ष्मरूपमें तन्मात्राओंको और ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें अस्मिताको ले लिया है। आनन्द भी मनका ग्राह्य विषय होनेके कारण इसको भी सूक्ष्म ग्राह्यविषयक समाधिके ही अन्तर्गत माना जा सकता है।*

अतः यहाँ यह मानना उचित मालूम होता है कि आकाशादि पञ्च महाभूत और उनका कार्य तो स्थूल ग्राह्य विषय है तथा तन्मात्रा और उनका सूक्ष्म कार्य सूक्ष्म ग्राह्य विषय है। इन्द्रियाँ और अन्तःकरण ग्रहणविषयक समाधिके


* कुछ टीकाकारोंका कहना है कि वितर्क और विचारके स्थानपर तो यहाँ 'ग्राह्य' शब्द है, आनन्दकी जगह 'ग्रहण' शब्द है और अस्मिताकी जगह 'ग्रहीता' शब्द है। दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता करनेके लिये उन लोगोंने उस सूत्रकी टीकामें आनन्दका अर्थ इन्द्रियाँ किया है और इस सूत्रमें 'ग्रहीता' का अर्थ अस्मिता किया है; किंतु व्यासभाष्यमें ऐसा नहीं किया गया है। उन्होंने वहाँ आनन्दका अर्थ आह्लाद और यहाँ 'ग्रहीता' का अर्थ साधारण पुरुष और मुक्त पुरुष—इस प्रकार किया है।

समाधिपाद-१ ३३

अन्तर्गत हैं, वे ग्राह्यविषयक समाधिमें तो नहीं आते; परंतु सूक्ष्म विषयकी हद अलिङ्गपर्यन्त बतला देनेसे ग्रहणविषयक समाधिका भी विचारानुगत समाधिमें ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार आनन्द नाम आह्लादका है। यह प्रकृति और पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाला और मनके द्वारा ग्राह्य है। अतः वह सूक्ष्म विषयके अन्तर्गत आ जानेके कारण उसका भी ग्राह्य समाधिमें अन्तर्भाव है। एवं यहाँ जो गृहीतृविषयक समाधि बतायी गयी है, वह भी तीसरे पादके पैंतीसवें सूत्रके अनुसार प्रकृति-पुरुषके संयोग-कालमें ही पुरुषके स्वरूपमें की जाती है। अतः वह भी अस्मितानुगत समाधि ही है; क्योंकि उसका फल उसी सूत्रमें पुरुषका ज्ञान बतलाया गया है ॥४१॥

सम्बन्ध— सामान्यरूपसे संप्रज्ञात समाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं—

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

'उनमें शब्द, अर्थ और ज्ञान—इन तीनोंके विकल्पोंसे संकीर्ण—मिली हुई समाधि सवितर्क है।'

व्याख्या— ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ दो प्रकारके होते हैं—(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म। इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके

पा० यो० द० ३—

३४ पातञ्जलयोगदर्शन

साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥

**सम्बन्ध—**इसके बाद—

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥४३॥

'(शब्द और प्रतीतिकी) स्मृतिके भलीभाँति लुप्त हो जानेपर अपने रूपसे शून्य हुईके सदृश केवल ध्येयमात्रके स्वरूपको प्रत्यक्ष करानेवाली (चित्तकी स्थिति ही) निर्वितर्क समाधि है।'

**व्याख्या—**पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी स्मरण नहीं रहता, तब अपने स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके विकल्पोंका अभाव हो जाने- के कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम 'निर्वितर्क' समाधि है। इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे 'निर्विकल्प' समाधि भी कहते हैं ॥४३॥

**सम्बन्ध—**इस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें होनेवाली संप्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं—

समाधिपाद-१ ३५

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

'इसीसे (पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्कके वर्णनसे ही) सूक्ष्म पदार्थोंमें की जानेवाली सविचार और निर्विचार समाधि-का भी वर्णन किया गया।'

व्याख्या— जिस प्रकार स्थूल ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥४४॥

सम्बन्ध— अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं—

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥

'तथा सूक्ष्मविषयताकी अवधि प्रकृति हैं।'

व्याख्या— पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रस-तन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाश-का शब्दतन्मात्रा है एवं उन सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म

३६ पातञ्जलयोगदर्शन

विषय यानी कारण प्रकृति है। उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है, वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थोंमें नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषके रूपमें की जाती है (योग० ३।३५)। अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत मान लेनेमें कोई आपत्ति मालूम नहीं होती।

इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका भी उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने 'विचार' शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है ॥४५॥

सम्बन्ध—इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक संप्रज्ञात समाधि- का भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं—

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

‘वे सब-की-सब सबीज समाधि हैं।’

समाधिपाद-१ ३७

**व्याख्या—**निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं; ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं; क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है । अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥४६॥

**सम्बन्ध—**उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है, यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं—

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

‘निर्विचार समाधि अत्यन्त निर्मल होनेपर (योगीको) अध्यात्मप्रसादका लाभ होता है।’

**व्याख्या—**निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा शुद्ध हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका भी किञ्चिन्मात्र भी मल नहीं रहता, उस समय योगीकी बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ—निर्मल हो जाती है (योग० ३।५)॥४७॥

**सम्बन्ध—**अतः—

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

‘उस समय (योगीकी) बुद्धि ऋतम्भरा होती है।’

**व्याख्या—**उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

**सम्बन्ध—**उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं—

३८ पातञ्जलयोगदर्शन

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥

'श्रवण और अनुमानसे होनेवाली बुद्धिकी अपेक्षा इस बुद्धिका विषय विलक्षण है; क्योंकि यह विशेषार्थवाली है।'

व्याख्या—वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमान-से भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुत-बुद्धि है; इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमानबुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धिवृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता। किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण (अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥४९॥

सम्बन्ध—इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं—

तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

'उससे उत्पन्न होनेवाला संस्कार दूसरे संस्कारोंका बाध करनेवाला होता है।'

व्याख्या—मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २। १२)

समाधिपाद-१ ३९

के नामसे कहा है । ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं ( योग० २ । १३ ) ; इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है । अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है, तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्योंमें स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब प्रकारके राग-द्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं, इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥

सम्बन्ध—अब निर्बीज समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते हैं—

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥५१॥

'उसका भी निरोध हो जानेपर सबका निरोध हो जानेके कारण निर्बीज समाधि हो जाती है ।'

व्याख्या—जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है; उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारोंमें भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है । उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है । अतः संसारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम निर्बीज समाधि है । इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं ॥५१॥


ॐ श्रीपरमात्मने नमः

साधनपाद-२

पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया। किन्तु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभावसे ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है—

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ १ ॥

‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति—ये तीनों क्रिया-योग हैं।’

**व्याख्या—(१) तप—**अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना—इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है; यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।

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( २ ) स्वाध्याय—जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्‌के ॐकार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना 'स्वाध्याय' है।

( ३ ) ईश्वर-प्रणिधान—ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम 'ईश्वर-प्रणिधान' है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोंको भगवान्‌के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्‌के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना—ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं।

यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं, तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है॥१॥

**सम्बन्ध—**उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं—

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥२॥

'(यह क्रियायोग) समाधिकी सिद्धि करनेवाला और अविद्यादि क्लेशोंको क्षीण करनेवाला है।'

**व्याख्या—**उपर्युक्त क्रियायोगके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥