भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१ २१

है और जिससे बड़ा कोई नहीं हो, वह निरतिशय है । ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है, इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है । जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥

सम्बन्ध— और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—

पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६॥

‘( वह ) ईश्वर ( सबके ) पूर्वजोंका भी गुरु है; क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है ।’

व्याख्या— सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है ( गीता ८ । १७ )। ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य सबका आदि है ( गीता १० । २-३ ); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है । इसलिये वह सम्पूर्ण पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है ॥२६॥

सम्बन्ध— ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं—

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥

‘उस ईश्वरका वाचक ( नाम ) प्रणव ( ॐकार ) है ।’