भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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२०पातञ्जलयोगदर्शन

सम्बन्ध—अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं—

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

'जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशयके सम्बन्धसे रहित तथा समस्त पुरुषोंसे उत्तम है, वह ईश्वर है।'

व्याख्या—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश—ये पाँच 'क्लेश' हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। 'कर्म' चार प्रकारके हैं—पुण्य, पाप, पुण्य और पाप-मिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग० ४ । ७), कर्मोंके फलका नाम 'विपाक' है (योग० २ । १३) और कर्मोंके संस्कारोंका नाम 'आशय' है (योग० २ । १२)। समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है। यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता, तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किन्तु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है; इस कारण उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने 'पुरुषविशेषः' पदका प्रयोग किया है ॥२४॥

सम्बन्ध—ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं—

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥ २५ ॥

'उस (ईश्वर) में सर्वज्ञताका कारण (ज्ञान) निरतिशय है।'

व्याख्या—जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय

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