पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ १९
वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। यही बात समाधिकी सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।
समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भावकी अधिकता आदि हेतुओंके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्र कहे हैं। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको सर्वथा निर्दोष बनानेकी चेष्टा रक्खे, उसमें किसी प्रकारकी भी शिथिलता न आने दे ॥२२॥
**सम्बन्ध—**अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज समाधिका सुगम उपाय बताया जाता है—
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥२३॥
'इसके सिवा ईश्वरप्रणिधानसे भी (निर्बीज समाधिकी सिद्धि शीघ्र हो सकती है)।'
**व्याख्या—**ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम 'ईश्वरप्रणिधान' है; (देखिये योग० २।१ की व्याख्या) इससे भी निर्बीज समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है। (योग० २।४५) क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसकी भावनानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४।११*) ॥२३॥
* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
'जो मेरेको जैसे भजते हैं, मैं भी उनको वैसे ही भजता हूँ।'