पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ १७
नहीं है । इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है । श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है । श्रद्धा और वीर्य—इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधक-की स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है, तथा उसमें योग-साधनके संस्कारोंका ही बारंबार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है, इसीको समाधि कहते हैं (योग० १ । ४६; ३ । ३ ) । इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि 'ऋतम्भरा'—सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १ । ४८) । अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक उसका निर्बीज समाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है । गीतामें भी कहा है—
'श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥' (४ । ३९)
'जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके—तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है' ॥२०॥
सम्बन्ध—अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अतिशीघ्र होनेकी बात कहते हैं—
तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥२१॥
'जिनके साधनकी गति तीव्र है, उनकी (निर्बीज समाधि) शीघ्र (सिद्ध) होती है।'
व्याख्या—जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर अपने
पा० यो० द० २—