भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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समाधिपाद-१

सम्बन्ध— अब स्मृतिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं—

अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥११॥

'अनुभव किये हुए विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना स्मृति है।'

व्याख्या— उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा—इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है। उपर्युक्त चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं, उनसे भी पुनः स्मृति-वृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट—दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस स्मरणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग-द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है।

स्वप्नको कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परन्तु स्वप्नमें जाग्रत्‌की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥११॥

सम्बन्ध— यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते हैं—

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥१२॥

'उन ( चित्तवृत्तियों ) का निरोध अभ्यास और वैराग्यसे होता है।'