भारतकोश
पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

Patanjali Yoga Darshan

महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा

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१० पातञ्जलयोगदर्शन

**व्याख्या—**चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य—ये दो उपाय हैं। चित्तकी वृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक भोगोंकी ओर चल रहा है, उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥१२॥

**सम्बन्ध—**उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं—

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥१३॥

'उन दोनोंमेंसे जो (चित्तकी) स्थिरताके लिये प्रयत्न करना है, वह अभ्यास है।'

**व्याख्या—**जो स्वभावसे ही चञ्चल है, ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारंबार चेष्टा करते रहनेका नाम 'अभ्यास' है। इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे ३९ वें तक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो, जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो, उसके लिये वही ठीक है ॥१३॥


* गीतामें भी कहा है—

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ (६।३५)

'हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! अभ्यास अर्थात् स्थितिके लिये बारंबार यत्न करनेसे और वैराग्यसे मन वशमें होता है, इसलिये इसको अवश्य वशमें करना चाहिये।'