पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमाधिपाद-१ <span style="float: right;">११</span>
सम्बन्ध—अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं—
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥
'परंतु वह (अभ्यास) बहुत कालतक निरन्तर (लगातार) और आदरपूर्वक साङ्गोपाङ्ग सेवन किया जानेपर दृढ़ अवस्थावाला होता है।'
व्याख्या—अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनसे कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रक्खे कि किया हुआ अभ्यास कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसन्देह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रक्खे, आजीवन अभ्यास करता रहे; साथ ही यह भी ध्यान रक्खे कि अभ्यासमें व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) अभ्यास चलता रहे। तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदरपूर्वक उसे साङ्गोपाङ्ग करता रहे। इस प्रकार किया हुआ अभ्यास ही दृढ़ होता है ॥१४॥*
* इस सूत्रका भाव गीतामें इस प्रकार आया है—
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ (६।२३)
'अर्थात् उस योगका अभ्यास बिना उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करते रहना चाहिये।'