पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ पातञ्जलयोगदर्शन
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥
'अभावके ज्ञानका अवलम्बन (ग्रहण) करनेवाली वृत्ति निद्रा है।'
व्याख्या—जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता, केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके आश्रित रहता है, वह निद्रावृत्ति है।* निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती।
निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट—दो प्रकारकी होती है। जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विक भाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है (गीता ६।१७) †, वह अक्लिष्ट है; दूसरे प्रकारकी निद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका बोध कराकर आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे क्लिष्ट है ॥१०॥
* दूसरे दर्शनकार निद्राको वृत्ति नहीं मानते, सुषुप्ति-अवस्था मानते हैं; अतः यह लक्ष्य करानेके लिये कि 'निद्रा भी वृत्ति है', सूत्रमें 'वृत्तिः' पदका प्रयोग किया गया है।
† युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
'दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।'