पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)

पातञ्जल योगदर्शन (भाष्य सहित)
Patanjali Yoga Darshan
महर्षि पतञ्जलि / हरिकृष्णदास गोयन्दका द्वारा
DevanagariHindipublished184 पृष्ठ
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ॐ श्रीपरमात्मने नमः
पातञ्जलयोगदर्शनके प्रधान विषयोंकी सूची
समाधिपाद १
| सूत्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-४ | ग्रन्थके आरम्भकी प्रतिज्ञा, योगके लक्षण और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन | ... १-२ |
| ५-११ | चित्तकी वृत्तियोंके पाँच भेद और उनके लक्षण | ... २-९ |
| १२-१६ | अभ्यास और वैराग्यका प्रकरण | ... ९-१३ |
| १७-२२ | समाधिका विषय ... | ... १३-१९ |
| २३-२९ | ईश्वर-प्रणिधान और उसके फलका कथन | ... १९-२३ |
| ३०-४० | चित्तके विक्षेपोंका, उनके नाशका और मनकी स्थितिके लिये भिन्न-भिन्न उपायोंका वर्णन | ... २३-३० |
| ४१-५१ | समाधिके फलसहित अवान्तर भेदोंका वर्णन | ... ३१-३९ |
साधनपाद २
| सूत्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-२ | क्रियायोगके स्वरूप और फलका निरूपण | ... ४०-४२ |
| ३-९ | अविद्यादि पाँच क्लेशोंका वर्णन | ... ४२-४८ |
| १०-१७ | क्लेशोंके नाशका उपाय और उसकी आवश्यकताका प्रतिपादन | ... ४८-५५ |
| १८-२२ | दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका तथा दृश्यकी सार्थकताका कथन | ५६-५९ |
| २३-२७ | प्रकृति-पुरुषके अविद्याकृत संयोगका स्वरूप और उसके नाशके उपायभूत अविचल विवेकज्ञानका निरूपण | ५९-६४ |
| २८-५५ | विवेकज्ञानकी प्राप्तिके लिये अष्टाङ्गयोगके अनुष्ठानकी आवश्यकता, आठों अङ्गोंके नाम तथा उनमेंसे पाँच बाह्य अङ्गोंके लक्षण और उनके विभिन्न अवान्तर फलोंका वर्णन | ६४-८२ |