भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१०० फलदीपिका अब भाव बल बताते हैं :— लग्नादिकानामधिपस्य पिण्डे रूपान्विते तद्बलपिण्डमाहुः । गृहस्य यस्यां दिशादिग्बलं स्यात्तद्भाववीर्य सहितस्य दृष्ट्या ॥२४॥ लग्न आदि किसी भाव का बल निकालना हो तो—जिस भाव का बल निकालना है तो उस भावेश को जितना बल (जितने रूप) प्राप्त हों¹ उसमें भाव दिग्बल तथा भाव पर जो दृक्बल हो वह जोड़ने से भाव बल निकल आता है भाव यदि अपने स्वामी, बृहस्पति, शुक्र या बुध से युत हो या अपने स्वामी, बृहस्पति, बुध से दृष्ट हो तो वह बल भी जोड़ना चाहिये । देखिये श्लोक ६ की व्याख्या पृष्ठ ८८ ॥ २४ ॥ भाव बल निकालने का प्रयोजन यह है कि भाव बली है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा । भाव निर्बल है तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल अल्प होगा, अशुभ फल अधिक होगा । १. एक टीकाकार ने लिखा है कि भावेश बल में एक रूप और जोड़ दें ।