फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय कर्माजीव प्रकरण इस पाँचवें अध्याय का नाम है “कर्माजीवः” अर्थात् किस कर्म (कार्य के करने) से या किस उपाय से या स्थान से आजीविका (जीवन चलाने का साधन) धन की प्राप्ति होगी। प्रायः बहुत से मनुष्य अपनी जन्मकुण्डली दिखाते समय यह पूछते हैं कि किस साधन से विशेष धन प्राप्ति की आशा है अथवा किस रोज़गार या धन्धे से विशेष लाभ हो सकता है। उसी विषय को इस अध्याय में समझाया गया है। अर्थाप्ति कथयेद्विलग्नशशिनोः प्राबल्यतः खेचरैः कर्मस्थैः पितृमातृशात्रवसुहृद्भात्रादिभिः स्त्रीधनात् । भृत्याद्वा दिननाथलग्नशशिनां मध्ये बलीयांस्ततः कर्मेशस्थनवांशराशिपवशाद्वृत्ति जगुस्तद्विदः ॥ १ ॥ धन प्राप्ति कराने वाला कौनसा ग्रह है ? लग्न और चन्द्रमा इन दोनों में जो बलवान् हो उससे दशम में कौनसा ग्रह है ? सूर्य हो तो पिता द्वारा धनप्राप्ति, चन्द्रमा हो तो माता से, मंगल हो तो शत्रु से, बुध हो तो मित्रों से, बृहस्पति हो तो भाई आदि से, शुक्र हो तो स्त्री से, शनि हो तो नौकरों से । ऊपर रिश्तेदारों का निर्देश मात्र कर दिया गया है। जब ये ज्योतिष की पुस्तकें बनी थीं तब भारतवर्ष में आय के कार्य और साधन बहुत सीमित थे। किन्तु आजकल कारखाने, मशीनरी, इम्पोर्ट, एक्सपोर्ट आदि अनेक साधन नये हो गये हैं। इस कारण सूर्य से केवल