भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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११६ फलदीपिका से द्वितीय में कोई शुभ ग्रह नहीं हो और लग्न से द्वादश में हो तो कोई योग नहीं होता। इसका कारण यह है कि द्वादश अनिष्ट स्थान माना गया है। ॥ ८ ॥ जातः स्यात् सुभगः सुखी गुणनिधिर्धीरो नृपो धार्मिको विख्यातः सकलप्रियोऽतिसुभगो दाता महीशप्रियः । चार्वङ्गः प्रियवाक्प्रपञ्चरसिको वाग्मी यशस्वी धनी विद्यादत्र सुवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥ ९ ॥ जो व्यक्ति शुभवेसि योग में उत्पन्न हो वह देखने में सुन्दर, सुखी, गुणनिधि, धीर, धार्मिक और अनेक व्यक्तियों पर हुकूमत करने वाला होता है। जो व्यक्ति सुवासि योग में उत्पन्न हो वह अति सुन्दर, दाता, राजा का प्रिय (अच्छे ओहदे वाला) और विख्यात हो; उसको सब लोग चाहें। जो व्यक्ति शुभ उभयचरी योग में उत्पन्न हो वह वाग्मी (अच्छा बोलने वाला-वक्ता) प्रिय वचन बोलने वाला यशस्वी और धनी होता है। उसके सब अंग मनोहर होते हैं और सबको प्रसन्न करने वाला होता है ॥ ९ ॥ अन्यायाज्जननिन्दको हतरुचिर्हीनप्रियो दुर्जनो मायावी परनिन्दकः खलयुतो दुर्वृत्तशास्त्राधिकः । लोके स्यादपकीर्तिदुःखितमना विद्यार्थभाग्यैश्च्युतो जातश्चाशुभवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥१०॥ जो व्यक्ति पापवेसि में पैदा हो वह अन्याय से दूसरों की निन्दा करे। कान्तिहीन हो, छोटे आदमी की सोहबत करे और स्वयं दुर्जन हो पापवेसि या अशुभवेसि एक ही बात है।