फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग ११७ जो* अशुभवासि में उत्पन्न होता है वह भी दूसरों की निन्दा करने वाला, मायावी, दुष्टों का मित्र, स्वयं दुराचरण करने वाला लेकिन शास्त्रों की दुहाई देने वाला हो । जो अशुभ उभयचरी योग में उत्पन्न होते हैं वे विद्याहीन, भाग्यहीन, धनहीन रहते हैं। उनका चित्त सदैव दुःखित रहता है और उन्हें अपकीर्ति (निन्दा) प्राप्त होती है। जैवातृको विभयरोगरिपुः सुखी स्या- दाढ्यः श्रिया च शुभकर्तरियोगजातः । निःस्वोऽशुचिर्विसुखदारसुतोऽङ्गहीनः स्यात्पापकर्तरिभवोऽचिरमायुरेति ॥ ११ ॥ जो व्यक्ति शुभ कर्त्री योग में उत्पन्न होता है वह दीर्घायु, सुखी लक्ष्मीवान् और वैभव से युक्त होता है। उसे शत्रुओं तथा रोगों से भय नहीं होता अर्थात् न तो उसके शत्रु होते हैं न रोग होते हैं। किन्तु जो पाप कर्त्री में पैदा होते हैं वह दरिद्र, अपवित्र, दुःखी अंगहीन, अल्पायु, भार्यारहित, पुत्ररहित होते हैं; संक्षेप में यह है कि शुभ कर्त्री का शुभ फल है और पाप कर्त्री का पापफल है। यह आवश्यक नहीं कि सब लक्षण अक्षरशः मिलें, भावार्थ लेना चाहिये ॥ १ ॥ आचारवान् धर्ममतिः प्रसन्नः सौभाग्यवान् पार्थिवमाननीयः । मृदुस्वभावः स्मितभाषणश्च धनी भवेच्चामलयोगजातः ॥ १२ ॥
- अशुभवासि और पापवासि एक ही बात है।