भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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११८ फलदीपिका जो अमला योग में पैदा होता है, वह आचारवान् धर्म में मति रखने वाला, प्रसन्न, सौभाग्यवान्, राजा द्वारा सम्मानित, मृदु स्वभाव का, मुस्कराकर बोलने वाला और धनी होता है। ॥ १२ ॥ सुशुभे शुभकर्तर्यां वेस्यादौ सुनभादिवत् । शुभैः क्रमात्फलं ज्ञेयं विपरीतमसद्ग्रहैः ॥ १३ ॥ सुशुभ, शुभकर्त्री और शुभवेसि का फल, सुनफा आदि योगों के ही समान समझना चाहिये अर्थात् सुवेसि और सुशुभ का वही फल समझे जो सुनफा का और शुभवासि का वही फल समझना चाहिये जो अनफा का। शुभ उभयचरी का फल दुरुधरा के समान समझना चाहिये। सूर्य के (१) आगे की राशि में (२) पीछे की राशि में (३) तथा दोनो ओर की राशियों में शुभ ग्रह होने से ही शुभ फल बताया है। यदि पाप ग्रह यह योग करें तो अशुभ फल समझना चाहिये। अर्थात् शुभवेसि आदि का जो फल बताया है उससे बिल्कुल उलटा । ॥ १३ ॥ ओजेष्वर्केन्दुलग्नान्यजनि दिवि पुमांश्चेन्महाभाग्ययोगः स्त्रीणान्तद्व्यत्ययेस्याच्छशिनि सुरगुरोः केन्द्रगे केसरीति । जीवान्त्याष्टारिसंस्थे शशिनि तु शकटः केन्द्रगे नास्ति लग्ना- च्चन्द्रे केन्द्रादिगेऽर्कादधमसमवरिष्ठाख्ययोगाः प्रसिद्धाः ॥१४॥

  • ऊपर सुनफा, अनफा, दुरुधरा, केमद्रुम, सुवेसि, सुवासि, शुभ उभयचरी, पापवेसि, पापवासि, शुभ कर्त्री, पापकर्त्री और सुशुभ केवल इन योगों के लक्षण बताये गये हैं, अमला योग का लक्षण अभी तक मूल में नहीं आया है ।