फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० फलदीपिका (ङ) यदि सूर्य से पणफर स्थान में चन्द्रमा हो तो सम योग होता है। (च) यदि सूर्य से तृतीय, षष्ठ, नवम या द्वादश स्थान में चन्द्रमा हो तो वरिष्ठ योग होता है। अब आगे के श्लोकों में उपर्युक्त छः योगों का पृथक्-पृथक् फल बताते हैं। महाभाग्ये जातः सकलनयनानन्दजनको वदान्यो विख्यातः क्षितिपतिरशीत्यायुरमलः। वधूनां योगेऽस्मिन् सति धनसुमाङ्गल्यसहिता चिरं पुत्रैः पौत्रैः शुभमुपगता सा सुचरिता ॥ १५ ॥ जो व्यक्ति महाभाग्य योग में उत्पन्न होता है वह सबके नेत्रों को आनन्द देने वाला, उदार, विख्यात, निर्मल चरित्र का, भूमि का स्वामी, राजा के समान ऐश्वर्य शाली होता है। जिन स्त्रियों की कुण्डलियों में यह योग हो वह उत्तम चरित्र की, सौभाग्य शालिनी, धनवती होती हैं। पति, पुत्र, पौत्रों का सुख उन्हें चिरकाल तक प्राप्त होता है और सदैव सौभाग्यवती रहती हैं। ॥ १५ ॥ केसरीव रिपुवर्गनिहन्ता प्रौढवाक् सदसि राजसवृत्तिः । दीर्घजीव्यतियशाः पटुबुद्धिस्तेजसा जयति केसरियोगे ॥ १६ ॥ अब केसरी योग का फल बताते हैं। जो व्यक्ति केसरी योग में उत्पन्न होता है वह केसरी (शेर) की तरह अपने शत्रुवर्गों को नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति सभाओं में प्रौढ़ (जिसका वाणी पर आधिपत्य हो, किसी विषय पर गम्भीरतापूर्वक और अधिकार से बोलना