फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १२३ कष्टमध्यमवराह्वययोगे द्रव्यवाहनयशः सुखसंपत् । ज्ञानधीविनयनैपुणविद्यात्यागभोगजफलान्यपि तद्वत् ॥ १८ ॥ (ख) यदि सम योग में जन्म हो तो ऊपर जो बातें बतायी गई हैं उनका मध्यम सुख प्राप्त हो। (ग) यदि वरिष्ठ योग में जन्म हो तो ऊपर बतायी गई सब बातों का श्रेष्ठ फल प्राप्त हो अर्थात् द्रव्य, सुख आदि प्रचुर मात्रा में मिलें। चन्द्राद्वा वसुमांस्तथोपचयगैर्लग्नात्समस्तैः शुभै- श्चन्द्राद्व्योम्यमलाह्वयः शुभखगैर्योगो विलग्नादपि । जन्मेशे सहिते विलग्नपतिना केन्द्रेऽधिमित्रर्क्षगे लग्नं पश्यति कश्चिदत्र बलवान्योगो भवेत्पुष्कलः ॥ १९ ॥ तिष्ठेयुः स्वगृहे सदा वसुमति द्रव्याण्यनल्पान्यपि क्ष्मेशः स्यादा मले धनी सुतयशः संपद्युतो नीतिमान् । श्रीमान् पुष्कलयोगजो नृपवरैः सम्मानितो विश्रुतः स्वाकल्पाम्बरभूषितः शुभवचाः सर्वोत्तमः स्यात्प्रभुः ॥२०॥ इस श्लोक में चार योग बताये गये हैं, वसुमान्, अमला और पुष्कल। इन्हीं की क्रमशः व्याख्या करते हैं— (१) यदि समस्त शुभग्रह लग्न से गिनने पर ३, ६, १०, ११ इन स्थानों में हों (यह लाज़मी नहीं कि एक तीसरे में, एक छठे, एक दसवें में एक ग्यारहवें में हो—सब ग्रह उपचय* स्थान में हों यह आवश्यक है) तो वसुमान् योग होता है।
- लग्न से ३, ६, १०, ११—इन स्थानों को उपचय स्थान कहते हैं ।