फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ फलदीपिका (२) यदि, चन्द्रमा जिस राशि में है, उस राशि से उपचय राशि में—(अर्थात् तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें इन राशियों में सब शुभग्रह हों—चाहें किसी राशि में एक या अधिक शुभग्रह हों—परन्तु ३, ६, १०, ११ इन्हीं चारों राशियों में सब शुभग्रह—बुध, बृहस्पति, शुक्र हों तो भी वसुमान् योग होता है। (३) यदि लग्न या चन्द्रमा से दशम में शुभ ग्रह हो तो अमला योग होता है। (४) यदि लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हैं उनके स्वामी एक साथ केन्द्र में हों और किसी अधिमित्र के घर में हों और कोई बलवान् ग्रह लग्न को देखे तो पुष्कल योग होता है। ऊपर जो चार योग बताये हैं उनका क्रमशः फल बताते हैं। (१) जो वसुमान् योग में पैदा होता है वह सदैव अपने घर में रहेगा और उसके पास बहुत द्रव्य होगा। पहले समय में परदेश में रहना कष्ट का लक्षण और अपने घर में रहना सुख का लक्षण समझा जाता था। (२) जो अमला योग में उत्पन्न हो वह भूमि का स्वामी, धनी, नीतिज्ञ, पुत्र और सम्पत्ति से युक्त, यशस्वी हो। (३) जो पुष्कल योग में उत्पन्न हो वह राजाओं द्वारा सम्मानित किया जावे, धनी और प्रसिद्ध हो, उत्तम वस्त्र और आभूषण धारण करे। शुभ वाणी बोले, बहुतों का मालिक हो और श्रेष्ठ पदवी को प्राप्त हो। सर्वे पञ्चसु षट्सु सप्तसु शुभा मालाश्च पङ्क्त्या स्थिता यद्येवं मृतिषड्व्ययादिषु गृहेष्वत्राशुभाख्याः स्मृताः। स्वक्षोच्चे यदि कोणकण्टकयुतौ भाग्येशशुक्रावुभौ लक्ष्म्याख्योऽथ तथाविधे हिमकरे गौरीति जीवेक्षिते ॥२१॥