फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १३१ त्रिंशद्वैन्यमुदीरितं व्ययरिपुच्छिद्रादिनाथोत्थिता- स्त्वष्टौ शौर्यपतेः खला निगदिताः शेषा महाख्याः स्मृताः ।।३२।। मूर्खः स्यादपवादको दुरितकृन्नित्यं सपत्नादितः क्रूरोक्तिः किलदैन्यजश्चलमतिर्विच्छिन्नकार्योद्यमः । उद्धृत्तश्च खले कदाचिदखिलं भाग्यं लभेताखिलं सौम्योक्तिश्च कदाचिदेवमशुभं दारिद्र्यदुःखादिकम् ।।३३।। श्रौकटाक्षनिलयः प्रभुराढ्यश्चित्रवस्त्रकनकाभरणश्च । पार्थिवाप्तबहुमानसमान्जो यानवृत्तसुतवांश्च महाख्ये ।।३४।। इन तीन श्लोकों में ६६ योग बताये हैं। यदि दो स्थानों (भाव) के स्वामी परस्पर स्थान परिवर्तन कर लें तो ये योग बनते हैं। (१) लग्नेश द्वितीय में, द्वितीयेश लग्न में, (२) लग्नेश चतुर्थ में, चतुर्थेश लग्न में ‘(३) लग्नेश पञ्चम में, पञ्चमेश लग्न में ‘(४) लग्नेश सप्तम में, सप्तमेश लग्न में (५) लग्नेश नवम में; नवमेश लग्न में (६) लग्नेश दशम में दशमेश लग्न में, (७) लग्नेश* लाभ में, लाभेश लग्न में (८) ४धनेश७ चतुर्थ में और चतुर्थेश धन में (९) धनेश पञ्चम में; पञ्चमेश धन में (१०) धनेश सप्तम में और सप्तमेश धन में (११) धनेश भाग्य में और भाग्येश धन में (१२) धनेश दशम में और दशमेश धन में (१३) धनेश
- लाभ ग्यारहवें स्थान को कहते हैं। ४ धनेश दूसरे घर के मालिक को कहते हैं। ७ भाग्य स्थान नवम स्थान को कहते हैं।