भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१३० फलदीपिका ग्रहों का बल निकालना बताया गया है उसके अनुसार सूर्य, चन्द्र और लग्नेश जितने अधिक बली होंगे उतना ही अधिक विशिष्ट फल होगा ॥२९॥ (२) जो व्यक्ति श्रीनाथ योग में उत्पन्न होगा वह लक्ष्मीवान् (धनी), सरस* वचन बोलने वाला (अर्थात् जिसके वचन, वाणी, लेख या उक्ति में सरसता हो) अपने वचनों से दूसरों को प्रसन्न करने में निपुण, भगवान् नारायण के चिह्नों से (शंख, चक्र आदि) से चिह्नित होता है । ऐसे व्यक्ति अन्य सज्जनों के साथ सदैव भगवान् नारायण सम्बन्धी हृद्य (हृदय को आनन्द देने वाले) स्तोत्रों या नामावली, का संकीर्तन करते रहते हैं । जो लोग विष्णु भक्त होते हैं उनका ये लोग बहुत प्रसन्न हृदय से आदर करते हैं । जो लोग श्रीनाथ योग में उत्पन्न होते हैं वे स्वयं बड़े सुन्दर होते हैं और उनके दर्शन कर अन्य लोगों के, नेत्रों को भी बहुत आनन्द प्राप्त होता है । ऐसे व्यक्तियों को अच्छे पुत्रों का और स्त्री का पूर्ण सुख प्राप्त होता है । ॥ ३० ॥ (३) अब विरञ्चि योग में उत्पन्न जातक का फल बताते हैं । जिसकी कुंडली में विरञ्चि योग हो वह बहुत बुद्धिमान् हो; वैदिक धर्माचार्य हो; ब्रह्मज्ञान परायण हो और गुणी हो । ऐसा व्यक्ति सदैव ही प्रसन्नचित्त रहेगा और वेदोक्त मार्ग से कभी विचलित नहीं होगा । उसके अनेक प्रख्यात शिष्य होंगे । सौम्य वचन वाला, बहुत धन, पुत्र स्त्री आदि के सुख से युक्त । ऐसे व्यक्ति के मुख- मण्डल पर सात्विक ब्रह्म तेज की उज्ज्वलता रहती है । ऐसे व्यक्ति दीर्घायु और जितेन्द्रिय होते हैं, और राजा लोग भी उन्हें नमस्कार करते हैं । ॥३१॥ अन्योन्यं भवनस्थयोर्विहगयोर्लग्नाद्रिःफान्तकं भावाधीश्वरयोः क्रमेण कथिताः षट्षष्टियोगा जनैः ।

  • सरस की परिभाषा काव्य ग्रन्थों में देखिये ।