फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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छठा अध्याय : योग १२९ हैं। श्रीकंठ शिव को और विरञ्चि ब्रह्मा को। इन्हीं तीनों के नाम से यह तीन योग लिखे गये हैं। (१) यदि लग्न का स्वामी, सूर्य और चन्द्रमा अपनी स्वराशि मित्रराशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो श्रीकंठ योग होता है। (२) यदि बुध, शुक्र और भाग्यस्थान का स्वामी यह तीनों उच्चराशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर, लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो श्रीनाथ योग होता है । (३) यदि पञ्चम का स्वामी, बृहस्पति और शनि ये तीनों उच्च- राशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो विरञ्चि योग होता है । (१) जो व्यक्ति श्रीकंठ योग में पैदा होता है वह रुद्राक्ष धारण करने वाला, विभूति लगाने से शरीर की धवल कान्ति वाला महात्मा, सदैव भगवान् शंकर का ध्यान करने वाला, धार्मिक और सदाचार के नियमों को अच्छी तरह पालन करने वाला, भगवान् शिव के सम्प्रदाय में दीक्षित होता है। ऐसा व्यक्ति साधु लोगों का उपकार करता है। और दूसरे धार्मिक सम्प्रदायों से न द्वेष करता है न ईर्षा करता है। ऐसा व्यक्ति सतत शिवाराधन से सुप्रसन्न और तेजस्वी होता है। यह समस्त लक्षण श्रीकंठ योग वाले व्यक्ति में पाये जायेंगे टिप्पणी:—यदि तीनों योग कारक ग्रह उच्च हों तो पूर्ण फल होगा। यदि स्वराशि के हों तो उससे न्यून फल और यदि मित्र राशि के हों तो उससे भी न्यून फल समझना चाहिये। चतुर्थ अध्याय में जो
- मूल श्लोक में आत्मप शब्द आया है। इसका अर्थ है आत्म- स्थान का स्वामी, अध्याय १ श्लोक १२ में यह लिखा है कि आत्मा का विचार पंचम स्थान से करे, इस कारण आत्मप शब्द का अर्थ पञ्चमेश किया है।