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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

छठा अध्याय : योग १२९ हैं। श्रीकंठ शिव को और विरञ्चि ब्रह्मा को। इन्हीं तीनों के नाम से यह तीन योग लिखे गये हैं। (१) यदि लग्न का स्वामी, सूर्य और चन्द्रमा अपनी स्वराशि मित्रराशि या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हों तो श्रीकंठ योग होता है। (२) यदि बुध, शुक्र और भाग्यस्थान का स्वामी यह तीनों उच्चराशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर, लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो श्रीनाथ योग होता है । (३) यदि पञ्चम का स्वामी, बृहस्पति और शनि ये तीनों उच्च- राशि, स्वराशि या मित्रराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो विरञ्चि योग होता है । (१) जो व्यक्ति श्रीकंठ योग में पैदा होता है वह रुद्राक्ष धारण करने वाला, विभूति लगाने से शरीर की धवल कान्ति वाला महात्मा, सदैव भगवान् शंकर का ध्यान करने वाला, धार्मिक और सदाचार के नियमों को अच्छी तरह पालन करने वाला, भगवान् शिव के सम्प्रदाय में दीक्षित होता है। ऐसा व्यक्ति साधु लोगों का उपकार करता है। और दूसरे धार्मिक सम्प्रदायों से न द्वेष करता है न ईर्षा करता है। ऐसा व्यक्ति सतत शिवाराधन से सुप्रसन्न और तेजस्वी होता है। यह समस्त लक्षण श्रीकंठ योग वाले व्यक्ति में पाये जायेंगे टिप्पणी:—यदि तीनों योग कारक ग्रह उच्च हों तो पूर्ण फल होगा। यदि स्वराशि के हों तो उससे न्यून फल और यदि मित्र राशि के हों तो उससे भी न्यून फल समझना चाहिये। चतुर्थ अध्याय में जो

  • मूल श्लोक में आत्मप शब्द आया है। इसका अर्थ है आत्म- स्थान का स्वामी, अध्याय १ श्लोक १२ में यह लिखा है कि आत्मा का विचार पंचम स्थान से करे, इस कारण आत्मप शब्द का अर्थ पञ्चमेश किया है।

१३० फलदीपिका ग्रहों का बल निकालना बताया गया है उसके अनुसार सूर्य, चन्द्र और लग्नेश जितने अधिक बली होंगे उतना ही अधिक विशिष्ट फल होगा ॥२९॥ (२) जो व्यक्ति श्रीनाथ योग में उत्पन्न होगा वह लक्ष्मीवान् (धनी), सरस* वचन बोलने वाला (अर्थात् जिसके वचन, वाणी, लेख या उक्ति में सरसता हो) अपने वचनों से दूसरों को प्रसन्न करने में निपुण, भगवान् नारायण के चिह्नों से (शंख, चक्र आदि) से चिह्नित होता है । ऐसे व्यक्ति अन्य सज्जनों के साथ सदैव भगवान् नारायण सम्बन्धी हृद्य (हृदय को आनन्द देने वाले) स्तोत्रों या नामावली, का संकीर्तन करते रहते हैं । जो लोग विष्णु भक्त होते हैं उनका ये लोग बहुत प्रसन्न हृदय से आदर करते हैं । जो लोग श्रीनाथ योग में उत्पन्न होते हैं वे स्वयं बड़े सुन्दर होते हैं और उनके दर्शन कर अन्य लोगों के, नेत्रों को भी बहुत आनन्द प्राप्त होता है । ऐसे व्यक्तियों को अच्छे पुत्रों का और स्त्री का पूर्ण सुख प्राप्त होता है । ॥ ३० ॥ (३) अब विरञ्चि योग में उत्पन्न जातक का फल बताते हैं । जिसकी कुंडली में विरञ्चि योग हो वह बहुत बुद्धिमान् हो; वैदिक धर्माचार्य हो; ब्रह्मज्ञान परायण हो और गुणी हो । ऐसा व्यक्ति सदैव ही प्रसन्नचित्त रहेगा और वेदोक्त मार्ग से कभी विचलित नहीं होगा । उसके अनेक प्रख्यात शिष्य होंगे । सौम्य वचन वाला, बहुत धन, पुत्र स्त्री आदि के सुख से युक्त । ऐसे व्यक्ति के मुख- मण्डल पर सात्विक ब्रह्म तेज की उज्ज्वलता रहती है । ऐसे व्यक्ति दीर्घायु और जितेन्द्रिय होते हैं, और राजा लोग भी उन्हें नमस्कार करते हैं । ॥३१॥ अन्योन्यं भवनस्थयोर्विहगयोर्लग्नाद्रिःफान्तकं भावाधीश्वरयोः क्रमेण कथिताः षट्षष्टियोगा जनैः ।

  • सरस की परिभाषा काव्य ग्रन्थों में देखिये ।

छठा अध्याय : योग १३१ त्रिंशद्वैन्यमुदीरितं व्ययरिपुच्छिद्रादिनाथोत्थिता- स्त्वष्टौ शौर्यपतेः खला निगदिताः शेषा महाख्याः स्मृताः ।।३२।। मूर्खः स्यादपवादको दुरितकृन्नित्यं सपत्नादितः क्रूरोक्तिः किलदैन्यजश्चलमतिर्विच्छिन्नकार्योद्यमः । उद्धृत्तश्च खले कदाचिदखिलं भाग्यं लभेताखिलं सौम्योक्तिश्च कदाचिदेवमशुभं दारिद्र्यदुःखादिकम् ।।३३।। श्रौकटाक्षनिलयः प्रभुराढ्यश्चित्रवस्त्रकनकाभरणश्च । पार्थिवाप्तबहुमानसमान्जो यानवृत्तसुतवांश्च महाख्ये ।।३४।। इन तीन श्लोकों में ६६ योग बताये हैं। यदि दो स्थानों (भाव) के स्वामी परस्पर स्थान परिवर्तन कर लें तो ये योग बनते हैं। (१) लग्नेश द्वितीय में, द्वितीयेश लग्न में, (२) लग्नेश चतुर्थ में, चतुर्थेश लग्न में ‘(३) लग्नेश पञ्चम में, पञ्चमेश लग्न में ‘(४) लग्नेश सप्तम में, सप्तमेश लग्न में (५) लग्नेश नवम में; नवमेश लग्न में (६) लग्नेश दशम में दशमेश लग्न में, (७) लग्नेश* लाभ में, लाभेश लग्न में (८) ४धनेश७ चतुर्थ में और चतुर्थेश धन में (९) धनेश पञ्चम में; पञ्चमेश धन में (१०) धनेश सप्तम में और सप्तमेश धन में (११) धनेश भाग्य में और भाग्येश धन में (१२) धनेश दशम में और दशमेश धन में (१३) धनेश

  • लाभ ग्यारहवें स्थान को कहते हैं। ४ धनेश दूसरे घर के मालिक को कहते हैं। ७ भाग्य स्थान नवम स्थान को कहते हैं।

१३२ फलदीपिका लाभ में, लाभेश धन में (१४)* सुखेश पञ्चम में और पञ्चमेश सुख में (१५) सुखेश सप्तम में और सप्तमेश सुख में (१६) सुखेश भाग्य में और भाग्येश सुख में (१७) सुखेश दशम में, दशमेश सुख में (१८) सुखेश लाभ में, लाभेश सुख में (१९) पञ्चमेश सप्तम में, सप्त- मेश पंचम में (२०) पंचमेश भाग्य में और भाग्येश पंचम में (२१) पंचमेश दशम में और दशमेश पंचम में (२२) पंचमेश लाभ में तथा लाभेश पंचम में (२३) सप्तमेश भाग्य में और भाग्येश सप्तम में (२४) सप्तमेश दशम में और दशमेश सप्तम में (२५) सप्तमेश लाभ में और लाभेश सप्तम में (२६) भाग्येश राज्य f में और राज्येश भाग्य में (२७) भाग्येश लाभ में और लाभेश भाग्य में (२८) राज्येश लाभ में और लाभेश राज्य में । ऊपर जो २८ योग बताये गये हैं उन सबको 'महायोग' कहते हैं। अब इनका फल बताते हैं। जो व्यक्ति महायोग में पैदा होता है उस पर लक्ष्मी का कृपा कटाक्ष होता है अर्थात् वह धनी होता है। ऐसा जातक अनेक व्यक्तियों का स्वामी, धनिक, सुन्दर वस्त्र और आभूषण धारण करने वाला, राजा (या सरकार) से सम्मानित और पुरस्कृत होगा। उच्च पदवी पर काम करे और उसे राजा से अधिकार मिले। ऐसे व्यक्ति को धन, पुत्र और सवारी का सुख प्राप्त हो। अब बाकी ३८ ऐसे योग बताते हैं जो अच्छे नहीं समझे जाते। इन ३८ योगों को दो भागों में बाँटा गया है। इनमें ८ तो खल योग कहलाते हैं और बाकी के ३० योग, दैन्य योग।

  • चौथे स्थान को सुख स्थान कहते हैं और चौथे घर के स्वामी को सुखेश कहते हैं। f दशम स्थान को राज्य स्थान कहते हैं और दशमेश को राज्येश ।

छठा अध्याय : योग १३३ (१) यदि व्ययेश* लग्न में हो और लग्नेश व्यय में (२) यदि व्ययेश द्वितीय में हों और द्वितीयेश व्यय में (३) यदि व्ययेश तृतीय में हो और तृतीयेश व्यय में (४) यदि व्ययेश सुख में हो और सुखेश व्यय में (५) यदि व्ययेश पंचम में हो और पंचमेश व्यय में (६) यदि व्ययेश षष्ठ में हो और षष्ठेश व्यय में (७) यदि व्ययेश सप्तम में हो और सप्तमेश व्यय में(८)यदि व्ययेश अष्टम में हो और अष्टमेश व्यय में (९) यदि व्ययेश भाग्य में हो और भाग्येश व्यय में (१०) यदि व्ययेश राज्य में हो और राज्येश व्यय में (११) यदि व्ययेश लाभ में हो और लाभेश व्यय में । (१२) यदि अष्टमेश लग्न में हो और लग्नेश अष्टम में (१३) यदि अष्टमेश धन में हो और धनेश अष्टम में (१४) यदि अष्टमेश तृतीय में हो और तृतीयेश अष्टम में (१५) यदि अष्टमेश सुख में हो और सुखेश अष्टम में (१६) यदि अष्टमेश पंचम में हो और पंचमेश अष्टम में (१७) यदि अष्टमेश छठे में हो और षष्ठेश अष्टम में (१८) यदि अष्टमेश सप्तम में हो और सप्तमेश अष्टम में (१९) यदि अष्टमेश भाग्य में हो और भाग्येश अष्टम में (२०) यदि अष्टमेश राज्य में और राज्येश अष्टम में (२१) यदि अष्टमेश लाभ में हो और लाभेश अष्टम में । (२२) यदि षष्ठेश लग्न में हो और लग्नेश षष्ठ में (२३) यदि षष्ठेश धन में और धनेश षष्ठ में (२४) यदि षष्ठेश तृतीय में और तृतीयेश षष्ठ में (२५)यदि षष्ठेश सुख में और सुखेश षष्ठ में(२६) यदि षष्ठेश पंचम में और पंचमेश षष्ठ में (२७) यदि षष्ठेश सप्तम में और सप्तमेश षष्ठ में (२८) यदि षष्ठश भाग्य में और भाग्येश

  • बारहवें घर को व्ययस्थान और इस स्थान के स्वामी को व्ययेश कहते हैं ।

१३४ फलदीपिका षष्ठ में (२९) यदि षष्ठेश राज्य में और राज्येश षष्ठ में (३०) यदि षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में हो तो दैन्य योग होता है । यह तीसों योग दैन्य योग कहलाते हैं। जो व्यक्ति दैन्य योग में उत्पन्न होता है वह स्वयं मूर्ख परन्तु दूसरों की निन्दा करने वाला, दुष्ट- कर्मा और सदैव शत्रुओं से पीड़ित रहता है। ऐसा व्यक्ति कूर वचन बोलता है और स्थिर मति का नहीं होता । वह जिस भी कार्य को प्रारम्भ करेगा उसमें विघ्न और विच्छेद उत्पन्न हो जावेंगे । अब आठ खल योग बताये जाते हैं। (१) लग्नेश तृतीय में-तृतीयेश लग्न में (२) धनेश तृतीय में-तृतीयेश धन में (३) तृतीयेश चतुर्थ में-चतुर्थेश तृतीय में (४) तृतीयेश पंचम में-पंचमेश तृतीय में (५) तृतीयेश सप्तम में सप्तमेश तृतीय में (६) तृतीयेश भाग्य में - भाग्येश तृतीय में (७) तृतीयेश राज्य में - राज्येश तृतीय में (८) तृतीयेश लाभ में - लाभेश तृतीय में । यह ८ योग खलयौग कहलाते हैं । यह आठों दुष्ट प्रभाव उत्पन्न करने वाले हैं इस कारण इन्हें 'खल' कहा है। जो व्यक्ति खल योग में उत्पन्न होता है वह कभी अनाचार के मार्ग पर चलने वाला कभी सदाचार के मार्ग पर आरूढ़ - कभी अखिल सौभाग्यशाली कभी पूर्ण दरिद्रता और दुःख प्राप्त करने वाला, कभी शुभवाणी बोलने वाला और कभी दुष्ट - इस प्रकार शुभ तथा अशुभ दोनों प्रभावों से युक्त होता है। शेष में इसका फल उत्तम नहीं माना है - शुभ प्रभाव कम और अशुभ प्रभाव अधिक है - इसीलिये 'खल' संज्ञा दी गई है । ३२-३४ ॥ यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयं मन्त्रेश्वर महाराज ने इसी अध्याय में आगे श्लोक ५७-७० में छठे घर का स्वामी यदि दुः 'स्थान में पड़े तो हर्षयोग, आठवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े तो 'सरल योग' और बारहवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े तो 'विमल योग' बतलाया है । फिर इन श्लोकों में जो छठे स्थान का स्वामी आठवें या बारहवें के स्वामी से स्थान परिवर्तन करे, या आठवें

छठा अध्याय : योग १३५ का स्वामी बारहवें के मालिक से स्थान परिवर्तन करे तो दैन्य योग- जिसका फल अच्छा नहीं है, क्यों कहा ? इसमें हेतु यह है कि आगे के ५७ श्लोक से ७० श्लोक तक जो योग बताये गये हैं उनमें स्थान परिवर्तन वाली बात नहीं कही गई है और इन ३२ से ३४ श्लोकों में स्थान परिवर्तन की शर्त लगाई गई है। किन्तु उत्तर कालामृत खंड ४ श्लोक २२ में छठे, आठवें, बारहवें घर के मालिकों के परस्पर स्थान परिवर्तन का जो उत्तम फल बताया गया है वह फलदीपिका के मत से बिल्कुल उलटा पड़ता है। उत्तर कालामृत का श्लोक है। रन्ध्रेशो व्ययषष्ठगो रिपुपतौ रन्ध्रे व्यये वा स्थिते रिःफेशोऽपि तथैव रन्ध्ररिपुभे यस्यास्ति तस्मिन्वदेत् । अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चान्यैरयुक्तेक्षिता जातोऽसौ नृपतिः प्रशस्तविभवो राजाधिराजेश्वरः ॥ अर्थात् (१) यदि आठवें घर का स्वामी बारहवें या छठे घर में हो (२) यदि छठे घर का स्वामी आठवें या बारहव घर में हो (३) यदि बारहवें घर का स्वामी आठवें या छठे घर में हो और (४) यह तीनों स्वामी एक दूसरे की राशि में हों या एक दूसरे से देखे जाते हों और (५) अन्य भावों के स्वामियों से युत (सहित) या वीक्षित न हों (अर्थात् अन्यभवनों के स्वामियों से सम्बन्ध न करते हों तो) ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य बहुत वैभव वाला राजाधिराज नृपति होता है। इसे विपरीत राजयोग कहते हैं। अर्थात् जो ग्रह सामान्यतः अनिष्ट फल उत्पन्न करने वाले हैं, उनसे शुभफल उत्पन्न हो । यह उनके साधारण फल से जो उलटा फल हुआ इस कारण (विपरीत उलटे को कहते हैं) इसे विपरीत राजयोग की संज्ञा दी है। इसमें और फलदीपिका के योगों में कुछ विभिन्नता है। वह यह कि फलदीपिका में दो ग्रहों का (षष्ठेश, अष्टमेश, या द्वादशेश में से

१३६ फलदीपिका कोई से दो ग्रहों के) परस्पर स्थान परिवर्तन का फ़ल बताया गया है । परन्तु उत्तर कालामृत में छठे, आठवें तथा बारहवें के मालिक तीनों दुः- स्थान* में हों, परस्पर युत (सहित) या ईक्षित (एक दूसरे से देखे जाते) हों और अन्य किसी शुभ स्थान के स्वामियों से सम्बन्ध न करें यह आवश्यक शर्त लगाई गई है । अस्तु, उत्तर कालामृत के इस श्लोक का हवाला तो प्रसंग वश दे दिया गया है । अब प्रस्तुत विषय पर आइये । शुभ स्थानों के स्वामियों के परस्पर स्थान परिवर्तन से जो महायोग कहे गये हैं उनके उदाहरण में कुछ जन्म कुण्डलियाँ नीचे दी जाती हैं । नीचे श्रीमती इन्दिरा गांधी की जन्म कुण्डली दी जा रही है । इनका जन्म प्रयाग में सूर्योदय के ४१ घड़ी ५२ पल २३ विपल बाद १९ नवम्बर १९१७ को हुआ । स्पष्ट लग्न और स्पष्ट ग्रह निम्नलिखित हैं :— लग्न ३-२७°-१३' सूर्य ७-४°-८' चन्द्र ९-५°-३७' मंगल ४-१६°-२३' बुध ७-१३°-१५' बृहस्पति १-१५°-१' वक्री शुक्र ८-२१°-०, शनि ३-२१°-४७' राहु ८-१०°-३३' केतु २-१०°-३३' इनकी जन्म कुण्डली में लग्नेश सप्तम में तथा सप्तमेश में लग्न है, यह एक महायोग हुआ । द्वितीयेश पंचम में, पंचमेश द्वितीय में है। यह दूसरा महायोग हुआ । किन्तु षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में है यह दैन्य योग है ।

  • ६, ८, १२ स्थान को दुः स्थान कहते हैं ।

छठा अध्याय : योग १३७ अब इंग्लेण्ड की महारानी एलिजबेथ की जन्म कुण्डली दी जाती है। इनका जन्म २१ अप्रैल १९२६ को लन्दन में २ बजकर ४० मिनिट पर हुआ। उस समय घड़ियाँ १ घंटे आगे बढ़ा दी गई थीं इसलिए वास्तविक समय एक बजकर ४० मिनिट था। इनकी जन्म कुण्डली नीचे दी जाती है। लग्न ८-२८-३८ सूर्य ०-७-२२ चन्द्र ३-१९-१७ मंगल ९-२८-३ बुध ११-११-५० बृहस्पति ९-२९-१३ शुक्र १०-२२-८ शनि ७-१-३६ राहु २-२७-४१ केतु ८-२७-४१ इनकी कुण्डली में धनेश द्वादश में तथा द्वादशेश धन में है, यह दैन्य योग हुआ। सूर्य, मंगल अपनी उच्च राशि में है, चन्द्रमा अपने घर का है; यह सब उत्तम योग हैं। राजकन्या होने से महारानी हो गईं। परन्तु इनका राजयोग क्रमशः पतनोन्मुख है। नीचे श्री रोबर्ट निक्सन की जन्म कुण्डली दी जा रही है। ये अमेरिका के प्रेसीडेन्ट हैं। इनका जन्म ९ जनवरी १९१३ को केलीफोर्निया में (अक्षांश ३३-४७ उत्तर, देशान्तर ११७-५१ पश्चिम

१३८ फलदीपिका में) वहां के स्टैण्डर्ड समय के अनुसार रात्रि को ९ बजकर ३० मिनिट पर हुआ।


[कुण्डली १]

भावराशि संख्याग्रह
लग्न (प्रथम भाव)
द्वितीय भावके.
तृतीय भाव
चतुर्थ भाव
पञ्चम भावसू. मं. बु. बृ.
षष्ठ भाव१०चं.
सप्तम भाव११शु.
अष्टम भाव१२रा.
नवम भाव
दशम भावश.
एकादश भाव
द्वादश भाव

ग्रह-स्पष्ट: लग्न ४-२३-३३-२६ सूर्य ८-२६-४५-४८ चन्द्रमा ९-२७-२६ मंगल ८-७-७ बुध ८-७-२४ बृहस्पति ८-९-६ शुक्र १०-११-४३ शनि १-४-४० राहु ११-१४-८ केतु ५-१४-८


सप्तमेश राज्य में, राज्येश सप्तम में है यह महायोग है। लग्नेश, चतुर्थेश, पंचमेश, नवमेश एक साथ भी राजयोग कारक है परन्तु यहाँ केवल महायोग के उदाहरण के लिए यह कुण्डली दी गई है। नीचे स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्री शिवकुमार शास्त्री जी की जन्म कुण्डली दी जाती है। शुभ विक्रम संवत् १९०४ फाल्गुन कृष्ण एकादशी बुधे श्री सूर्योदयादिष्टम् ४।३०।


[कुण्डली २]

भावराशि संख्याग्रह
लग्न (प्रथम भाव)१२के. बु.
द्वितीय भाव
तृतीय भावमं.
चतुर्थ भावबृ.
पञ्चम भाव
षष्ठ भाव
सप्तम भावरा०
अष्टम भाव
नवम भाव
दशम भावचं.
एकादश भाव१०शु.
द्वादश भाव११सू. श.

लग्नेश चतुर्थ में, चतुर्थेश लग्न में महायोग करता है।

छठा अध्याय : योग १३९ लग्नाधिपाप्तभपतिस्थितराशिनाथः स्वोच्चस्वभेषु यदि कोणचतुष्टयस्थः । योगःस काहल इति प्रथितोऽथतद्वत् लग्नाधिपाप्तभपतिर्यदि पर्वताख्यः ॥ ३५ ॥ वर्द्धिष्णुरार्यः सुमतिः प्रसन्नः क्षेमङ्करः काहलजो नृमान्यः । स्थिरार्थसौख्यः स्थिरकार्यकर्त्ता क्षितीश्वरः पर्वतयोगजातः ॥३६॥ (१) जन्म कुण्डली में देखिये कि लग्नेश किस राशि में बैठा है— उस राशि का स्वामी जिस राशि में है — उस राशि का स्वामी अपनी [कुण्डली: लग्न १; २; ३; ४; ५ मं.; ६; ७ श.; ८; ९; १०; ११ सू.; १२] उच्च राशि या स्वराशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो काहल योग होता है। साथ की कुण्डली में मेष लग्न है। इसका स्वामी मंगल हुआ। मंगल सिंह राशि में बैठा है इस सिंह राशि का स्वामी सूर्य है—सूर्य कुम्भ में बैठा है; और कुंभ का स्वामी शनि तुला में उच्च का होकर लग्न से केन्द्र में बैठा है इस कारण काहल योग हुआ । जो काहल योग में उत्पन्न होता है वह अच्छी बुद्धि वाला, वर्द्धिष्णु (वृद्धि को प्राप्त) श्रेष्ठ, प्रसन्न, दूसरों का कल्याण करने वाला और जनता द्वारा मान्य होगा अर्थात् लोग उसका आदर करेंगे। देखिये श्री आशुतोष मुकर्जी की जन्म कुण्डली । इन बंगकेसरी का जन्म २९ जून सन् १९६४ को हुआ ।

१४० फलदीपिका इस कुण्डली में लग्नेश शुक्र मेष में है। मेष का मालिक मंगल है। मेष का मालिक (मंगल) अपनी राशि में है। परन्तु केन्द्र या त्रिकोण में नहीं है इसलिये योग नहीं हुआ। देखिये श्री के० के० शाह मंत्री भारत-सरकार की जन्म कुण्डली। इनका जन्म २७-१०-१९०८ को वृश्चिक लग्न में हुआ। लग्न का स्वामी मंगल है। यह लग्नेश मकर में है, मकर का स्वामी शनि है। शनि कुंभ में, कुंभ का स्वामी शनि केन्द्र में है इसलिये काहल योग हुआ (२) इसी प्रकार यह देखिये कि जन्म कुण्डली में लग्नेश जिस राशि में है उस राशि का स्वामी कहां है। यदि लग्नेश जिस राशि में है उस राशि का स्वामी अपनी उच्च राशि या स्वराशि में स्थित होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो तो पर्वत योग होता है।

छठा अध्याय : योग १४१ देखिये साथ की उदाहरण कुण्डली में लग्नेश, मंगल, धनु राशि में हैं और इस धनु राशि का स्वामी बृहस्पति अपनी उच्च राशि (कर्क में) स्थित होकर केन्द्र में है, इस कारण पर्वत योग हुआ। जो पर्वत योग में उत्पन्न होता है। उसका सुख और धन दोनों स्थिर रहते हैं वह स्थिर कार्य करने वाला होता है अर्थात् उसके किये हुये कार्य दीर्घ काल तक रहते हैं। मकान बनाना, वाग लगाना, फैक्टरी बनाना आदि स्थिर कार्य हैं। धर्मशाला बनाना, कुएँ या तालाब खुदवाना यह भी परोपकार के स्थिर कार्य हैं। पर्वत योग वाला मनुष्य क्षितीश्वर (पृथ्वी, भूमि का मालिक या उच्च पदाधिकारी होता है ॥ ३५-३६ ॥ धर्मकर्मभवनाधिपती द्वौ संयुतौ महितभावगतौ चेत् । राजयोग इति तद्विह स्यात् केन्द्रकोणयुतिर्यति शङ्खः ॥३७॥ भेरीशङ्खप्रणादैर्धृतमृदुपटिकाजातवृत्तातपत्रो हस्त्यश्वान्दोलिकाद्यैः सह मगधकृतप्रस्तुतिर्भूमिपालः । नानारूपोपहारस्फुरितकरयुतैः प्रार्थितः सज्जनैः स्या- द्राजा स्याच्छङ्खयोगे बहुवरवनिताभोगसम्पत्तिपूर्णः ॥३८॥

१४२ फलदीपिका श्री शाह की जन्म कुण्डली में पर्वत योग भी होता है क्योंकि लग्नेश (मंगल) स्थित राशि (मकर) का स्वामी शनि स्वराशि में केन्द्र में है। साथ में श्री मोरार जी देसाई की कुंडली दी जाती है । इनका जन्म, २९ फरवरी १८९६ को मिथुन लग्न में हुआ। मिथुन लग्न का स्वामी बुध मकर में है । मकर का स्वामी शनि अपनी उच्च राशि में त्रिकोण इस कारण पर्वत योग हुआ । (१.) यदि नवम और दशम भवन के स्वामी दोनों संयुक्त होकर किसी शुभ भाव में एक साथ बैठें तो राजयोग होता है। (२) यदि किसी केन्द्र का स्वामी किसी त्रिकोण के स्वामी के साथ संयुक्त होकर किसी शुभ भाव में बैठे तो शंख योग होता है। ॥३७॥ जो व्यक्ति राजयोग में उत्पन्न होता है वह राजा या राजा* के समान पदवी वाला होता है। जब वह यात्रा करता है तो भेरी, शंख ढोल आदि बाजे साथ में बजते हुये चलते हैं; उसके सिर पर छत्र रहता है। उसके साथ-साथ, हाथी, घोड़े, पालकी आदि बहुत सी सवारी चलती हैं। भाट और चारण उसकी स्तुति या प्रशंसा गाते रहते हैं और बहुत से बड़े-बड़े आदमी नाना रूप के सुन्दर उपहार हाथों में लिये भेंट करने के लिये प्रस्तुत रहते हैं। बहुत सी श्रेष्ठ वनिताओं का भोग और सम्पत्ति प्राप्त होती है। ॥३८॥

  • जिस समय आज से सैकड़ों वर्ष पहले मन्त्रेश्वर महाराज ने फलदीपिका का निर्माण किया उस समय भारतवर्ष में हजारों राजा थे। ऐसे-ऐसे व्यक्ति राजा थे जिनकी आय ३०-४० या ५० हजार

छठा अध्याय : योग १४३ संख्यायोगाः सप्तसप्तर्क्षसंस्थे- रेकापायाद्वल्लकीदामपाशम् । केदाराख्यः शूलयोगो युगं च गोलश्चान्यान् पूर्वमुक्तानविहाय ॥३९॥ वीणायोगे नृत्तगीतप्रियोऽर्थी दाम्नि त्यागीभूपतिश्चोपकारी । पाशे भोगी सार्थसच्छीलबन्धुः केदाराख्ये श्रीकृषिक्षेत्रयुक्तः॥४०॥ शूले हिंस्रः क्रोधशीलो दरिद्रः पाषण्डी स्याद् द्रव्यहीनो युगाख्ये । निस्वः पापी म्लेच्छयुक्तः कुशिल्पी गोले जातश्चालसोऽल्पायुरेव ॥ ४१ ॥ *(१) यदि सूर्य आदि सात ग्रह ७ पृथक्-पृथक् राशियों में हों तो वल्लकी योग होता है। इसे वीणा योग भी कहते हैं। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह नाचने, गाने बजाने का शौकीन और धनी होता है। (२) यदि सातों ग्रह कुल ६ राशियों में हों—चाहे किसी भी क्रम से अधिक नहीं थी इसलिये जहां-जहां राजा शब्द आवे उसका शब्दार्थ न लेकर भावार्थ--उच्च पदाधिकारी, धन वैभव सम्पन्न--यह अर्थ लेना चाहिये ।

  • यहां जो योग बताये गये हैं उनमें सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध बृहस्पति, शुक्र, शनि इन सातों ग्रहों का विचार करना चाहिये । राहु और केतु का विचार इनमें नहीं किया जाता ।

१४४ फलदीपिका से तो दाम योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह राजा के समान दूसरों का उपकार करने वाला और स्वयं त्यागी होता है। (३) यदि ७ ग्रह केवल ५ राशियों में हों तो पाश योग होता है। इस योग में उत्पन्न भोगी, धनी, सुशील और बन्धुयुक्त होता है। (४) यदि सातों ग्रह कुल ४ राशियों में हों तो केदार योग बनता है। इस योग वाले व्यक्ति को खेत, खेती और लक्ष्मी का शुभ योग होता है (५) यदि कुल ग्रह ३ राशियों में हों तो शूल योग होता है। इस योग वाला व्यक्ति हिंसक प्रवृत्ति का क्रोधी और दरिद्र होता है। (६) यदि सूर्य आदि सातों ग्रह केवल दो राशियों में हों तो युग योग होता है। इस योग में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति पाखण्डी और धनहीन होते हैं। (७) यदि सूर्य आदि सातों ग्रह एक ही राशि में हों तो गोल योग होता है। जो गोल योग में उत्पन्न हो वह आलसी अल्पायु, दरिद्री, पापी, म्लेच्छों की संगति में रहने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति शिल्पकार्य में भी निपुण नहीं होता। ॥३९-४१॥ (१) यदि चन्द्रमा से छठे, सातवें, आठवें शुभ ग्रह हों तो अधि- योग होता है। सौम्यैरिन्दोद्यू॑ नषड्रन्ध्रसंस्थैस्तद्वल्लग्नात्संस्थितैर्वाधियोगः । नेता मन्त्री भूपतिः स्यात्क्रमेण स्यातः श्रीमान्दीर्घजीवी मनस्वी ॥ अधियोगभवो नरेश्वरः स्थिरसंपद्बहुबन्धुपोषकः । अमुना रिपवः पराजिताश्चिरमायुर्लभते प्रसिद्धताम् ॥४३॥ (२) यदि लग्न से छठे, सातवें, आठवें शुभ ग्रह हों तो भी अधि- योग होता है। यदि यह तीनों पूर्ण बली हों अर्थात् बुध, वृहस्पति, शुक्र तीनों पूर्ण बली हों तो अधियोग में उत्पन्न मनुष्य भूपति होता है यदि तीनों मध्यबली हों तो जातक मन्त्री होता है यदि बुध, वृहस्पति शुक्र हीन बली हों तो मनुष्य नेता होता है किन्तु शुभ प्रभाव तब भी रहता

छठा अध्याय : योग १४५ है। अधियोग* में उत्पन्न मनुष्य लक्ष्मीवान्, दीर्घायु और मनस्वी होते हैं। अधियोग में उत्पन्न होने वाले मनुष्य स्थिर सम्पत्ति वाले, बहुत से बन्धुओं का पोषण करने में तत्पर और अनेक व्यक्तियों पर हुकूमत करने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति शत्रुओं को पराजित करने में सफल होते हैं और प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।।४२-४३।। भावैः सौम्ययुतेक्षितैस्तदधिपैः सुस्थानगैर्भास्वरैः स्वोच्चस्वर्क्षगतैर्विलग्नभवनाद्योगाः क्रमाद्द्वादश। संज्ञाश्चामरधेनुशौर्यजलधिच्छत्रास्त्रक मासुरा- भाग्यख्यातिसुपारिजातमसुलास्तज्ज्ञैर्यथा कीर्तिताः ॥४४॥ प्रत्यहं व्रजति वृद्धिमुदग्रां शुक्लचन्द्र इव शोभनशीलः। कीर्तिमान् जनपतिश्चिरजीवी श्रीनिधिर्भवति चामरजातः ॥४५॥ सान्नपान्नविभवोऽखिलविद्यापुष्कलोऽधिककुटुम्बविभूतिः। हेमरत्नधनधान्यसमृद्धो राजराज इव राजति धेनौ ॥४६॥

  • बहुत से लोगों के विचार से चन्द्रमा से छठे, सातवें, आठवें तीनों घरों में बुध, गुरु, शुक्र हों-अर्थात् ६, ७, ८ इन तीनों में कोई घर खाली न हो तभी अधियोग होता है किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि श्रुतकीर्ति का वाक्य है कि व्यास तथा अन्य प्राचीन ज्योतिषियों के अनुसार चाहे ६, ७, ८ इन तीनों घरों में कोई ख़ाली भी हो-यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र एक साथ या अलग-अलग या दो एक साथ, एक अलग, किसी भी प्रकार से स्थित हों तो अधि- योग होता है।

१४६ फलदीपिका कीर्तिमद्भीरनुजैरभिष्टुतो लालितो महितविक्रमयुक्तः । शौर्यजो भवति राम इवासौ राजकार्यनिरतोऽतियशस्वी ॥४७॥ गोसंपद्धनधान्यशोभिसदनं बन्धुप्रपूर्णं वर- स्त्रीरत्नाम्बरभूषणानि महितस्थानं च सर्वोत्तमम् । प्राप्नोत्यम्बुधियोगजः स्थिरसुखो हस्त्यश्वयानादिगो राजेज्यो द्विजदेवकार्यनिरतः कूपप्रपाकृत्पथि ॥४८॥ सुसंसारसौभाग्यसन्तानलक्ष्मी निवासो यशस्वी सुभाषी मनीषी । अमात्यो महीशस्य पूज्यो धनाढ्यः स्फुरत्तीक्ष्णबुद्धिर्भवेच्छत्रयोगे ॥४९॥ शत्रून् बलिष्ठान् बलवन्निगृह्य क्रूरप्रवृत्त्या सहितोऽभिमानी । व्रणाङ्किताङ्गश्च विवादकारी स्यादास्त्रयोगे दृढगात्रयुक्तः ॥५०॥ परदारपराङ्मुखो भवेद्वरदारात्मजबन्धुसंश्रितः । जनकादधिकः शुभैर्गुणैर्महनीयां श्रियमेति कामजः ॥५१॥ हन्त्यन्यकार्यं पिशुनः स्वकार्यपरो दरिद्रश्च दुराग्रही स्यात् । स्वयंकृतानर्थपरंपरार्तः कुकर्मकृच्चासुरयोगजातः ॥५२॥ चञ्चच्चामरवाद्यघोषनिबिडामान्दोलिकां शाश्वतीं लक्ष्मीं प्राप्य महाजनैः कृतनतिः स्याद्धर्ममार्गे स्थितः । प्रीणात्येष पितॄन् सुरान्द्विजगणांस्तत्तत्प्रियैः पूजनैः स्वाचारः स्वकुलोद्वहः सुहृदयः स्याद्भाग्ययोगोद्भवः ॥५३॥

छठा अध्याय : योग १४७ सत्क्रियां सकललोकसंमतामाचरन्नवति सज्जनान्नृपः । पुत्रमित्रधनदारभाग्यवान् ख्यातिजो भवति लोकविश्रुतः ॥५४॥ नित्यमङ्गल्युतः पृथिवीशः संचितार्थनिचयः सुकुटुम्बी । सत्कथाश्रवणभक्तिरभिज्ञो पारिजातजननः शिवतातिः ॥५५॥ कृच्छ्रलब्धधनवान् परिभूतो लोलसंपदुचितव्ययशीलः । स्वर्गमेव लभन्तेत्यदशायां जाल्मको मुसलजश्चपलश्च ॥५६॥ (१) यदि लग्न में शुभ ग्रह हों या लग्न को शुभ ग्रह देखते हों और लग्नेश अस्त न होकर उत्तम स्थान में स्वराशि का या स्वक्षेत्री होकर बैठा हो तो चामर योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह वृद्धि को प्राप्त होता है। शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति वह सुन्दर और सुशील भी होता है। ऐसा व्यक्ति लक्ष्मीवान्, कीर्तिवान्, दीर्घायु और जनपति (अनेक जनों पर हुकूमत करने वाला) हो। (२) यदि दूसरे घर में शुभ ग्रह हों या दूसरे घर को शुभ ग्रह देखने हों और दूसरे घर का मालिक उदित होकर स्वराशि या उच्च- राशि में स्थित होता हुआ सुस्थान में बैठा हो तो धेनु योग होता है। ऐसा व्यक्ति सुवर्ण, धन, धान्य और रत्न से समृद्ध, राजराज के समान होता है। राजराज के दो अर्थ हैं राजाओं का राजा और कुबेर । भावार्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति धनी होता है। दूसरे घर से विद्या, कुटुम्ब, भोजन, पान

  • शोभनशील का अर्थ उत्तम शील वाला भी हो सकता है ।
  • दुः स्थान का अर्थ है ६, ८, १२। बाकी के सुस्थान या उत्तम स्थान समझे जाते हैं।

१४८ फलदीपिका (पीने की वस्तु) आदि का भी विचार किया जाता है। और दूसरा स्थान तथा दूसरे स्थान के स्वामी के बलवान् होने से ऐसे व्यक्ति को उत्तम भोजन, पेय पदार्थ, विद्या, बड़े कुटुम्ब का सुख, आदि प्राप्त होंगे। दक्षिण भारत में दूसरे घर से भी विद्या का विचार किया जाता है। वास्तव में दूसरा घर मुख, जिह्वा या वाणी का है। वाणी और विद्या में बहुत समानता है। (३) यदि तृतीय भाव में शुभ ग्रह हों या इस भाव को शुभ ग्रह देखते हों और तृतीय भाव का स्वामी अस्त न हो और अपनी राशि या उच्चराशि में स्थित होकर उत्तम स्थान में हो तो 'शौर्य' योग होता है; ऐसा व्यक्ति बहुत पराक्रमी होता है और उसके छोटे भाई यशस्वी, और भ्रातृभक्त होते हैं। इसके भाई लोग जातक की प्रशंसा भी करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि तृतीय स्थान का भाई बहिन, पराक्रम सम्बन्धी पूर्ण सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं भी बहुत यशस्वी होता है और राज्य कार्य में निरत रहता है। फलितार्थ यह है कि अच्छे सरकारी ओहदे पर आसीन होता है। मन्त्रेश्वर महाराज ने तो यह भी लिखा है कि “राम” के समान पराक्रमी हो किन्तु इसे अर्थवाद समझना चाहिए। (४) यदि चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हों या शुभ ग्रह चौथे स्थान को देखते हों, चतुर्थेश अस्त न हो और अपनी स्वराशि या उच्चराशि में स्थित होकर उत्तम स्थान में हो तो अम्बुधि या जलधि योग होता है। अम्बुधि या जलधि समुद्र को कहते हैं। इस

  • संस्कृत में राम के तीन अर्थ हैं परशुराम, रामचन्द्र और बलराम—तीनों ही बड़े पराक्रमी थे।
  • अर्थवाद का अर्थ है किसी बात की बहुत प्रशंसा करना। जहाँ अर्थवाद हो वहाँ अक्षरशः अर्थ न लेकर भावार्थ मात्र लेना चाहिये यह संस्कृत शास्त्रों की परिपाटी है।