भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१३४ फलदीपिका षष्ठ में (२९) यदि षष्ठेश राज्य में और राज्येश षष्ठ में (३०) यदि षष्ठेश लाभ में और लाभेश षष्ठ में हो तो दैन्य योग होता है । यह तीसों योग दैन्य योग कहलाते हैं। जो व्यक्ति दैन्य योग में उत्पन्न होता है वह स्वयं मूर्ख परन्तु दूसरों की निन्दा करने वाला, दुष्ट- कर्मा और सदैव शत्रुओं से पीड़ित रहता है। ऐसा व्यक्ति कूर वचन बोलता है और स्थिर मति का नहीं होता । वह जिस भी कार्य को प्रारम्भ करेगा उसमें विघ्न और विच्छेद उत्पन्न हो जावेंगे । अब आठ खल योग बताये जाते हैं। (१) लग्नेश तृतीय में-तृतीयेश लग्न में (२) धनेश तृतीय में-तृतीयेश धन में (३) तृतीयेश चतुर्थ में-चतुर्थेश तृतीय में (४) तृतीयेश पंचम में-पंचमेश तृतीय में (५) तृतीयेश सप्तम में सप्तमेश तृतीय में (६) तृतीयेश भाग्य में - भाग्येश तृतीय में (७) तृतीयेश राज्य में - राज्येश तृतीय में (८) तृतीयेश लाभ में - लाभेश तृतीय में । यह ८ योग खलयौग कहलाते हैं । यह आठों दुष्ट प्रभाव उत्पन्न करने वाले हैं इस कारण इन्हें 'खल' कहा है। जो व्यक्ति खल योग में उत्पन्न होता है वह कभी अनाचार के मार्ग पर चलने वाला कभी सदाचार के मार्ग पर आरूढ़ - कभी अखिल सौभाग्यशाली कभी पूर्ण दरिद्रता और दुःख प्राप्त करने वाला, कभी शुभवाणी बोलने वाला और कभी दुष्ट - इस प्रकार शुभ तथा अशुभ दोनों प्रभावों से युक्त होता है। शेष में इसका फल उत्तम नहीं माना है - शुभ प्रभाव कम और अशुभ प्रभाव अधिक है - इसीलिये 'खल' संज्ञा दी गई है । ३२-३४ ॥ यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयं मन्त्रेश्वर महाराज ने इसी अध्याय में आगे श्लोक ५७-७० में छठे घर का स्वामी यदि दुः 'स्थान में पड़े तो हर्षयोग, आठवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े तो 'सरल योग' और बारहवें घर का स्वामी यदि दुः स्थान में पड़े तो 'विमल योग' बतलाया है । फिर इन श्लोकों में जो छठे स्थान का स्वामी आठवें या बारहवें के स्वामी से स्थान परिवर्तन करे, या आठवें