फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १३५ का स्वामी बारहवें के मालिक से स्थान परिवर्तन करे तो दैन्य योग- जिसका फल अच्छा नहीं है, क्यों कहा ? इसमें हेतु यह है कि आगे के ५७ श्लोक से ७० श्लोक तक जो योग बताये गये हैं उनमें स्थान परिवर्तन वाली बात नहीं कही गई है और इन ३२ से ३४ श्लोकों में स्थान परिवर्तन की शर्त लगाई गई है। किन्तु उत्तर कालामृत खंड ४ श्लोक २२ में छठे, आठवें, बारहवें घर के मालिकों के परस्पर स्थान परिवर्तन का जो उत्तम फल बताया गया है वह फलदीपिका के मत से बिल्कुल उलटा पड़ता है। उत्तर कालामृत का श्लोक है। रन्ध्रेशो व्ययषष्ठगो रिपुपतौ रन्ध्रे व्यये वा स्थिते रिःफेशोऽपि तथैव रन्ध्ररिपुभे यस्यास्ति तस्मिन्वदेत् । अन्योन्यर्क्षगता निरीक्षणयुताश्चान्यैरयुक्तेक्षिता जातोऽसौ नृपतिः प्रशस्तविभवो राजाधिराजेश्वरः ॥ अर्थात् (१) यदि आठवें घर का स्वामी बारहवें या छठे घर में हो (२) यदि छठे घर का स्वामी आठवें या बारहव घर में हो (३) यदि बारहवें घर का स्वामी आठवें या छठे घर में हो और (४) यह तीनों स्वामी एक दूसरे की राशि में हों या एक दूसरे से देखे जाते हों और (५) अन्य भावों के स्वामियों से युत (सहित) या वीक्षित न हों (अर्थात् अन्यभवनों के स्वामियों से सम्बन्ध न करते हों तो) ऐसे योग में उत्पन्न मनुष्य बहुत वैभव वाला राजाधिराज नृपति होता है। इसे विपरीत राजयोग कहते हैं। अर्थात् जो ग्रह सामान्यतः अनिष्ट फल उत्पन्न करने वाले हैं, उनसे शुभफल उत्पन्न हो । यह उनके साधारण फल से जो उलटा फल हुआ इस कारण (विपरीत उलटे को कहते हैं) इसे विपरीत राजयोग की संज्ञा दी है। इसमें और फलदीपिका के योगों में कुछ विभिन्नता है। वह यह कि फलदीपिका में दो ग्रहों का (षष्ठेश, अष्टमेश, या द्वादशेश में से