फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १४७ सत्क्रियां सकललोकसंमतामाचरन्नवति सज्जनान्नृपः । पुत्रमित्रधनदारभाग्यवान् ख्यातिजो भवति लोकविश्रुतः ॥५४॥ नित्यमङ्गल्युतः पृथिवीशः संचितार्थनिचयः सुकुटुम्बी । सत्कथाश्रवणभक्तिरभिज्ञो पारिजातजननः शिवतातिः ॥५५॥ कृच्छ्रलब्धधनवान् परिभूतो लोलसंपदुचितव्ययशीलः । स्वर्गमेव लभन्तेत्यदशायां जाल्मको मुसलजश्चपलश्च ॥५६॥ (१) यदि लग्न में शुभ ग्रह हों या लग्न को शुभ ग्रह देखते हों और लग्नेश अस्त न होकर उत्तम स्थान में स्वराशि का या स्वक्षेत्री होकर बैठा हो तो चामर योग होता है। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह वृद्धि को प्राप्त होता है। शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति वह सुन्दर और सुशील भी होता है। ऐसा व्यक्ति लक्ष्मीवान्, कीर्तिवान्, दीर्घायु और जनपति (अनेक जनों पर हुकूमत करने वाला) हो। (२) यदि दूसरे घर में शुभ ग्रह हों या दूसरे घर को शुभ ग्रह देखने हों और दूसरे घर का मालिक उदित होकर स्वराशि या उच्च- राशि में स्थित होता हुआ सुस्थान में बैठा हो तो धेनु योग होता है। ऐसा व्यक्ति सुवर्ण, धन, धान्य और रत्न से समृद्ध, राजराज के समान होता है। राजराज के दो अर्थ हैं राजाओं का राजा और कुबेर । भावार्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति धनी होता है। दूसरे घर से विद्या, कुटुम्ब, भोजन, पान
- शोभनशील का अर्थ उत्तम शील वाला भी हो सकता है ।
- दुः स्थान का अर्थ है ६, ८, १२। बाकी के सुस्थान या उत्तम स्थान समझे जाते हैं।