फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १४३ संख्यायोगाः सप्तसप्तर्क्षसंस्थे- रेकापायाद्वल्लकीदामपाशम् । केदाराख्यः शूलयोगो युगं च गोलश्चान्यान् पूर्वमुक्तानविहाय ॥३९॥ वीणायोगे नृत्तगीतप्रियोऽर्थी दाम्नि त्यागीभूपतिश्चोपकारी । पाशे भोगी सार्थसच्छीलबन्धुः केदाराख्ये श्रीकृषिक्षेत्रयुक्तः॥४०॥ शूले हिंस्रः क्रोधशीलो दरिद्रः पाषण्डी स्याद् द्रव्यहीनो युगाख्ये । निस्वः पापी म्लेच्छयुक्तः कुशिल्पी गोले जातश्चालसोऽल्पायुरेव ॥ ४१ ॥ *(१) यदि सूर्य आदि सात ग्रह ७ पृथक्-पृथक् राशियों में हों तो वल्लकी योग होता है। इसे वीणा योग भी कहते हैं। जो इस योग में उत्पन्न होता है वह नाचने, गाने बजाने का शौकीन और धनी होता है। (२) यदि सातों ग्रह कुल ६ राशियों में हों—चाहे किसी भी क्रम से अधिक नहीं थी इसलिये जहां-जहां राजा शब्द आवे उसका शब्दार्थ न लेकर भावार्थ--उच्च पदाधिकारी, धन वैभव सम्पन्न--यह अर्थ लेना चाहिये ।
- यहां जो योग बताये गये हैं उनमें सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध बृहस्पति, शुक्र, शनि इन सातों ग्रहों का विचार करना चाहिये । राहु और केतु का विचार इनमें नहीं किया जाता ।