भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

छठा अध्याय : योग १४१ देखिये साथ की उदाहरण कुण्डली में लग्नेश, मंगल, धनु राशि में हैं और इस धनु राशि का स्वामी बृहस्पति अपनी उच्च राशि (कर्क में) स्थित होकर केन्द्र में है, इस कारण पर्वत योग हुआ। जो पर्वत योग में उत्पन्न होता है। उसका सुख और धन दोनों स्थिर रहते हैं वह स्थिर कार्य करने वाला होता है अर्थात् उसके किये हुये कार्य दीर्घ काल तक रहते हैं। मकान बनाना, वाग लगाना, फैक्टरी बनाना आदि स्थिर कार्य हैं। धर्मशाला बनाना, कुएँ या तालाब खुदवाना यह भी परोपकार के स्थिर कार्य हैं। पर्वत योग वाला मनुष्य क्षितीश्वर (पृथ्वी, भूमि का मालिक या उच्च पदाधिकारी होता है ॥ ३५-३६ ॥ धर्मकर्मभवनाधिपती द्वौ संयुतौ महितभावगतौ चेत् । राजयोग इति तद्विह स्यात् केन्द्रकोणयुतिर्यति शङ्खः ॥३७॥ भेरीशङ्खप्रणादैर्धृतमृदुपटिकाजातवृत्तातपत्रो हस्त्यश्वान्दोलिकाद्यैः सह मगधकृतप्रस्तुतिर्भूमिपालः । नानारूपोपहारस्फुरितकरयुतैः प्रार्थितः सज्जनैः स्या- द्राजा स्याच्छङ्खयोगे बहुवरवनिताभोगसम्पत्तिपूर्णः ॥३८॥