फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
२. अध्याय ८-१४: द्वादश भाव फल, स्त्री-जातक, नष्ट-जातक एवं आयु-निर्णय
१९० फलदीपिका होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत विख्यात, दीर्घायु, अपने कुल का पालन करने वाला श्रेष्ठ व्यक्ति होता है। ॥१२॥ यदि नवम में बुध हो तो मनुष्य विद्वान्, धनवान्, धार्मिक और आचारवान् होता है। ऐसा व्यक्ति बहुत बोलने वाला (इसे सद्गुण के अर्थ में लेना चाहिये अवगुण में नहीं) और प्रवीण होता है। दशम में बुध हो तो विद्वान्, बलवान्, बुद्धिमान्, सुखी, सत्कर्म करने वाला सत्यान्वित (सत्य पर कायम रहने वाला होता है) और सफलता प्राप्त करता है। जिस कार्य को प्रारम्भ करता है उसमें प्रारम्भ में ही सिद्धि (सफलता) प्राप्त होती है। यदि ग्यारहवें में बुध हो तो दीर्घायु सच बात पर कायम रहने वाला (अर्थात् जो वचन दे दिया उसे पूरा करने वाला) विपुल धन वाला, सुखी होता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरों का सुख भी प्राप्त होता है। द्वादश में बुध का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति दीन, आलसी, क्रूर, विद्याहीन होता है तथा अपमान को भी प्राप्त होता है। ॥१३॥ शोभावान् सुकृती चिरायुरभयो लग्ने गुरौ सात्मजो वाग्मी भोजनसारवांश्च सुमुखो वित्ते धनी कोविदः । सावज्ञः कृपणः प्रतीतसहजः शौर्येऽघकृद्दुष्टधी- 1 र्बन्धौ मातृसुहृत्परिच्छदसुतस्त्रीसौख्यधान्यान्वितः ॥१४॥ पुत्रैः क्लेशयुतो महीशसचिवो धीमान् सुतस्थे गुरौ षष्ठे स्यादलसोऽरिहा परिभवी मन्त्राभिचारे पटुः । सत्पत्नीसुतवान्मदेऽतिसुभगस्तातादुदारोऽधिको दीनो जीवति सेवया कलुषभाग्दीर्घायुरिज्येऽष्टमे ॥१५॥ ख्यातः सन् सचिवः शुभेऽर्थसुतवान् स्याद्धर्मकार्योत्सुकः स्वाचारः सुयशा नभस्यतिधनी जीवे महीशप्रियः ।
आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १९१ आयस्थे धनिकोऽभयोऽल्पतनयो जैवातृको यानगो द्वेष्यो धिक्कृतवाग्व्यये वितनयः साघोऽलसः सेवकः ॥१६॥ अब बृहस्पति का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में बृहस्पति हो तो शोभावान्, सत्कर्म करने वाला, दीर्घायु और निर्भय हो; उसे पुत्र सुख भी प्राप्त हो। यदि द्वितीय में बृहस्पति हो तो बुद्धिमान्, सुन्दर मुख वाला और वाग्मी (बोलने में कुशल) होता है। ऐसे मनुष्य को उत्तम भोजन प्राप्त होते हैं। अर्थात् द्वितीय भाव से जो-जो बातें देखी जाती हैं उन सबका सुख प्राप्त होता है। यदि तृतीय में बृहस्पति हो तो पापकर्मा, दुष्ट बुद्धि वाला, कृपण और अवज्ञा (अनादर) सहित हो। किन्तु उसका भाई किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुंचे या विख्यात हो। मूल में प्रतीतसहज शब्द आया है। इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि जिसका भाई में विश्वास हो। यदि चतुर्थ में बृहस्पति हो तो माता मित्र, भृत्य, पुत्र स्त्री, धान्य आदि का सुख प्राप्त हो और सुखी हो। ॥१४॥ यदि पंचम में बृहस्पति हो तो मिश्रित फल है। जातक बुद्धिमान् और राजा का मन्त्री होता है; किन्तु पुत्रों के कारण क्लेशयुक्त भी होता है। पुत्र उत्पन्न न होना भी क्लेश है, पुत्र का अभाव भी पुत्र- क्लेश है। पुत्र उत्पन्न होने पर नष्ट हो जावें यह भी पुत्रों से क्लेश है, तथा पुत्रों के आचरण से, व्यवहार से क्लेश उठाना पड़े या मन को क्लेश हो यह भी पुत्रों से क्लेश हुआ। छठे में बृहस्पति हो तो शत्रुओं का नाश करने वाला, आलसी, स्वयं अपमान को प्राप्त होने वाला, किन्तु मन्त्राभिचार (मन्त्रों का अनुष्ठान) करने वाला तथा चतुर होता है। यदि सप्तम में बृहस्पति हो तो सत्पत्नीवान् (उत्तम स्त्री *वाग्मी—जिसकी वाक् (बोलने की) शक्ति अच्छी हो उसे वाग्मी कहते हैं।
१९२ फलदीपिका वाला), पुत्रवान्, सुन्दर, अपने पिता से अधिक उदार होता है। कुछ अन्य पुस्तकों में यह भी लिखा है कि जिसके सप्तम में बृहस्पति हो वह अपने पिता से श्रेष्ठ पदवी को प्राप्त हो। अष्टम में बृहस्पति का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति दीन होता है और नौकरी से धनोपार्जन करता है। अष्टम में बृहस्पति वाला जघन्यकर्म (निकृष्ट कर्म करने वाला) किन्तु दीर्घायु होता है ॥ १५ ॥ यदि नवम में बृहस्पति हो तो जातक धनवान्, पुत्रवान्, विख्यात, धर्म कार्य के लिए उत्सुक और राजा का मन्त्री होता है। ऐसे व्यक्ति की धार्मिक कार्यों में प्रवृत्ति रहती है और शुभ कर्म करने में तत्पर रहता है। इसी कारण उसे धर्म कार्य में उत्सुक कहा। यदि वृहस्पति दशम भाव में हो तो जातक अत्यन्त धनी और राजा का प्यारा होता है। ऐसा व्यक्ति उत्तम आचरण करने वाला और यशस्वी भी होता है। यदि ग्यारहवें घर में वृहस्पति हो तो मनुष्य धनिक, निर्भय और दीर्घायु होता है। ऐसे व्यक्ति के पास सवारियां भी होती हैं किन्तु सन्तान थोड़ी होती है। यदि वृहस्पति बारहवें वर में हो तो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं और जातक स्वयं बुरे शब्द बोलने वाला, सन्तान हीन, पापकर्मा, आलसी, और सेवक (सेवा करने वाला) होता है ॥ १६ ॥ तनौ सुतनुदृक्प्रियं सुखिनमेव दीर्घायुषं करोति कविरर्थगः कविमनेकवित्तान्वितम् । विदारसुखसम्पदं कृपणमप्रियं विक्रमे सुवाहनसुमन्दिराभरणवस्त्रगन्धं सुखे ॥१७॥ अखण्डितधनं नृपं सुमतिमात्मजे सात्मजं विशत्रुमधनं क्षते युवतिदूषितं विक्लवम् ।
आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १९३ सुभार्यमसतीरतं मृतकलत्रमाढ्यं मदे चिरायुषमिलाधिपं धनिनमष्टमे संस्थितः ॥१८॥ सदारसुहृदात्मजं क्षितिपलब्धभाग्यं शुभे नभस्यतियशःसुहृत्सुखितवृत्तियुक्तं प्रभुम् । धनाढ्यमितराङ्गनारतमनेकसौख्यं भवे । भृगुर्जनयति व्यये सरतिसौख्यवित्तद्युतिम् ॥१९॥ यदि लग्न में शुक्र हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला, नेत्रों को प्यारा लगने वाला, सुखी और दीर्घायु होता है। यदि द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो अनेक प्रकार के धन से युक्त, जातक स्वयं कवि भी होता है। शुक्र यदि तृतीय स्थान में हो तो निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कृपण, अप्रिय, सुख और सम्पत्ति से हीन, बिना स्त्री के रहता है। यदि चतुर्थ में शुक्र हो तो अच्छी सवारी, अच्छा मकान, आभूषण, वस्त्र, सुगन्धित पदार्थों से सम्पन्न हो । ॥ १७ ॥ यदि शुक्र पंचम भाव में हो तो मनुष्य पूर्ण धनयुक्त राजा के समान वैभव वाला, पुत्र सौख्य से युत स्वयं बहुत बुद्धिमान् होता है। यदि शुक्र छठे घर में हो तो उसके कोई शत्रु नहीं होंगे किन्तु धन हीन होगा। अनेक युवतियों से उसका सम्बन्ध हो और वह स्वयं दुःखी हो। सप्तम में शुक्र हो तो मनुष्य को अच्छी पत्नी प्राप्त होगी लेकिन हो सकता है पत्नी शान्त (मृत) हो जाय। ऐसा व्यक्ति धनी होता है और असती स्त्रियों में आसक्त रहता है। अष्टम में शुक्र हो तो धनी, दीर्घायु, और भूमिपति हो ॥ १८ ॥ यदि नवम में शुक्र हो तो राजा (सरकार) की कृपा से भाग्योदय होता है। ऐसे व्यक्ति को स्त्री, पुत्र, तथा मित्रों का सुख प्राप्त रहता है। यदि शुक्र दशम भाव में हो तो जातक को अच्छा कार्य करने
१९४ फलदीपिका को मिले। उसे मित्रों का सुख हो, अत्यन्त सम्मान, यश और ऊंची पदवी प्राप्त हो। यदि एकादश में शुक्र हो तो धनी हो, दूसरों की स्त्रियों में रत रहे और अनेक प्रकार के सुख प्राप्त हों। यदि शुक्र बारहवें घर में हो तो ऐसे व्यक्ति को रति (स्त्रयों के साथ संयोग का सुख) धन और वैभव प्राप्त हो ।। । १९ ॥ अब शनि का विविध भावगत फल बताते हैं । स्वोच्चे स्वकीयभवने क्षितिपालतुल्यो लग्नेऽर्कजे भवति देशपुराधिनाथः । शेषेषु दुःखपरिपीडित एव बाल्ये दारिद्र्यदुःखवशगो मलिनोऽलसश्च ॥२०॥ विमुखमधनमर्थेऽन्यायवन्तं च पश्चा- दितरजनपदस्थं यानभोगार्थयुक्तम् । विपुलमतिमुदारं दारसौख्यं च शौर्ये जनयति रविपुत्रश्चालसं विह्वलं च ॥२१॥ दुःखी स्याद्गृहयानमातृवियुतो बाल्ये सरुग्बन्धुभे भ्रान्तो ज्ञानसुतार्थहर्षरहितो धीस्थे शठो दुर्मतिः । बह्वाशी द्रविणान्वितो रिपुहतो धृष्टश्च मानी रिपौ कामस्थे रविजे कुदारनिरतो निःस्वोऽध्वगो विह्वलः ॥२२॥ शनैश्चरे मृतिस्थिते मलीमसोऽशंसोऽवसुः । करालधीर्बुभुक्षितः सुहृज्जनवमानितः ॥२३॥
आठवां अध्याय : भावाश्रय फल १९५ भाग्यार्थात्मजतातधर्मरहितो मन्दे शुभे दुर्जनो मन्त्री वा नृपतिर्धनी कृषिपरः शूरः प्रसिद्धोऽम्बरे । बह्वायुः स्थिरसंपदायसहितः शूरो विरोगो धनी निर्लज्जार्थसुतो व्ययेऽङ्गविकलो मूर्खो रिपूत्सारितः ॥२४॥ यदि शनि अपनी उच्चराशि (तुला) या स्वराशि (मकर या कुंभ) में स्थित होकर लग्न में हो तो राजा के समान किसी देश या नगर का स्वामी हो । ऊपर जो तीन राशियां बताई गई हैं इनके अलावा यदि किसी राशि में स्थित शनि यदि लग्न में हो तो बचपन में दुःख परिपीडित हो और बाद में भी दरिद्री, दुःखी, मलिन और आलसी हो*। यदि शनि दूसरे घर में हो तो उसका चेहरा देखने में अच्छा न होगा । ऐसा व्यक्ति अन्याय मार्ग पर चलेगा और धनहीन होगा । किन्तु बाद में (जीवन के उत्तरार्द्ध में) वह अपना निवास स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चला जावेगा और वहां धन, सवारी तथा भोग (सुख के साधन) प्राप्त करेगा । यदि तृतीय में शनि हो तो जातक, बहुत बुद्धिमान् और उदार हो तथा उसे स्त्री सुख भी प्राप्त हो । किन्तु वह आलसी और दुःखी होता है । ॥ २१ ॥ यदि जन्म कुण्डली में शनि चौथे घर में हो तो मनुष्य गृहहीन, यानहीन और मातृहीन होता है । ऐसा व्यक्ति बचपन में रोगी भी रहता है । चतुर्थ सुख स्थान है । शनि यहां बैठकर सुख को नष्ट
- कुछ अन्य ग्रन्थों के मत से यदि धनु या मीन राशि में स्थित होकर शनि लग्न में हो तो बहुत उत्तम फल दिखाता है । तुला कोदण्ड मीनानां लग्नस्थोऽपि शनिश्चरः करोति भूपतेर्जन्म वंशे च नृपति र्भवेत् । यह मान सागरी का वचन है ।
१९६ फलदीपिका कर देता है इसलिये ऐसा मनुष्य सदैव दुःखी रहता है। चौथे घर से माता, मकान, यान (सवारी) आदि का विचार किया जाता है इसलिये इनके सूख में भी कमी करे । यदि पंचम में शनि हो तो मनुष्य शठ (शैतान) और दुष्ट बुद्धि वाला होता है और ज्ञान, सुत, धन तथा हर्ष इन चारों से रहित होता है—अर्थात् इन चीजों के सुख में कमी करता है। ऐसा मनुष्य भ्रमण करता है अथवा उसकी बुद्धि भ्रान्त रहती है। यदि छठे घर में शनि हो तो जातक बहुत भोजन करने वाला, धनी, अपने शत्रुओं का नाश करने वाला (अर्थात् जातक के शत्रु को जातक ही हानि पहुंचावें), धृष्ट (ढीठ) अभिमानी होता है। यदि सप्तम में शनि हो तो कुदार निरत (कुत्सित स्त्री में रत) दरिद्री, मार्ग चलने वाला और दुःखी होता है। पहले मार्ग चलना या यात्रा करना भी कष्ट का लक्षण समझा जाता था। ॥ २२ ॥ यदि अष्टम भाव में शनि हो तो जातक मलिन, बवासीर के रोग से पीड़ित धनहीन, क्रूर बुद्धि वाला, बुभुक्षित (भूखा) हो और उसके मित्र उसकी अवहेलना करें। ॥ २३ ॥ यदि नवम में शनि हो तो भाग्यहीन, धनहीन, सन्तानहीन, पितृ- हीन, धर्महीन होता है। नवम भाव से जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करता है। ऐसा व्यक्ति दुर्जन भी होता है। हमारे विचार से नवम धर्म स्थान होने के कारण, यदि उच्चस्थ
- पहले समय में घर पर आराम से बैठना सुख का लक्षण समझा जाता था और देश विदेश घूमना या बाहर भ्रमण करना कष्ट का लक्षण समझते थे। मूल संस्कृत श्लोक में भ्रान्त शब्द आया है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं एक तो यह कि जिसकी बुद्धि भ्रान्त हो—उचित निर्णय न कर सके और दूसरा अर्थ जो ऊपर दिया गया है अर्थात् घर से बाहर भ्रमण करने वाला।
आठवां अध्याय : भावाश्रय फल १९७ शनि नवम में हो तो धार्मिक विचारों में क्रान्ति लावेगा। बलवान् शनि यदि धर्म स्थान पर बैठे और उसपर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो मनुष्य धार्मिक तथा तपस्वी होता है। नवम तपस्या का स्थान है— यहां शनि वैराग्य उत्पन्न करता है। (१) आनन्दमयी 'मां' उच्च कोटि की तपस्विनी हैं। उनके तुला का शनि नवम में है। (२) स्वामी करपात्री जी के मीन का शनि नवम में तथा सूर्य बृहस्पति, शुक्र, बुध, कर्क राशि के लग्न में है। बलवान् बृहस्पति पूर्ण दृष्टि से नवम भाव में बैठे शनि को देखता है। (३) महाराजा साहिब डूंगरपुर की कुण्डली में भी कर्क राशि स्थित बृहस्पति लग्न में बैठा है और नवमस्थ मीन राशि के बृहस्पति को देखता है। यह तीनों ही नवम शनि वाले हैं । परन्तु शुभ राशि में स्थित होने से तथा शुभ ग्रह की दृष्टि होने से धार्मिक हैं। दो तो संन्यासावस्था में ही हैं। स्वामी करपात्री जी की कुण्डली में चार ग्रह एकत्रित होने से संन्यास योग हुआ। शनि को सदैव ख़राब नहीं समझना चाहिए। अच्छे शनि तथा खराब शनि में वही अन्तर है जो कोयले और हीरे में। दोनों में कार्बन (तत्व विशेष) होता है किन्तु कहाँ हीरा और कहाँ कोयला ? रुद्र ने लिखा है कि रात्रि शेष में (जब रात समाप्त होने में चार घड़ी बाकी रहें) तब, जिस जातक की जन्म कुंडली में शनि निर्बल होता है वह जातक निद्रा, आलस्य में अपना समय बिताता है किन्तु जिसकी कुंडली में शनि बलवान् होता है वह उस समय आध्यात्मिक चिन्तन, देवार्चन आदि में समय व्यतीत करता है। शनि “स्पर्श” (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इनमें से वायु प्रधान होने के कारण) का अधिष्ठाता है। बलवान् शनि दर्शनीय स्पर्श सुखप्रद पट्ट वस्त्र आदि दिलावेगा किन्तु निर्बल शनि यदि वस्त्र दिलावेगा तो मोटा, खुरदरा कम्बल प्राप्ति करावेगा।
१९८ फलदीपिका कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ग्रह अच्छा ही फल करेगा या निकृष्ट ही फल करेगा यह किसी एक बात से निश्चय नहीं कर लेना चाहिये। २४ प्रकार के बल होते हैं। उन सब का तथा अष्टक वर्ग में शुभ रेखा, सर्वाष्टक वर्ग की रेखा, ग्रह आरोही है या अवरोही, उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि है या पाप ग्रहों की, किस भाव में है-- भाव मध्य से कितनी दूर है—किस नक्षत्र में है—उस नक्षत्र का स्वामी कौन सा ग्रह है—वह ग्रह किन राशियों और किन भावों का स्वामी है—कहाँ बैठा है—उस पर किन ग्रहों की दृष्टि है आदि अनेक बातों का तारतम्य कर बुद्धिमान् ज्योतिषी को ग्रह का प्रभाव निश्चित करना चाहिये । यदि दशम में शनि हो तो उत्कृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति राजा हो या शाजा का मन्त्री हो, अत्यन्त धनी, प्रसिद्ध और शूर हो और कृषि कार्य में तत्पर हो। पहले कृषि कार्य सबसे उत्तम व्यवसाय माना जाता था इसीलिये ऐसा लिखा है। आधुनिक समय में इसका अर्थ करना चाहिये कि उत्तम व्यवसाय करे। यदि ग्यारहवें घर में शनि हो तो आय सहित, शूर, निरोगी (स्वस्थ), धनी, दीर्घायु और स्थिर सम्पत्ति वाला हो। बारहवें भाव में शनि हो तो अनिष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति निर्लज्ज, धन हीन, पुत्र से वंचित, विकलांग (शरीर के किसी भाग में विकलता) और मूर्ख होता है। उसके शत्रु उसे उत्सारित (दूर फेंकना) कर देते हैं। हमारा अनुभव है कि द्वादश में शनि दाँतों को भी खराब करता और नेत्रों को भी हानि पहुंचाता है। अब राहु का विविध भाव फल बताते हैं लग्नेऽह्नावचिरायुर्थबलावानूर्ध्वाङ्गरोगान्वित- श्छन्नोक्तिर्मु खरूघृणी नृपधनी वित्ते सरोषः सुखी । मानी भ्रातृविरोधको दृढमतिः शौर्ये चिरायुर्धनी मूर्खो वेश्मनि दुःखकृत्सुहृदल्पायुः कदाचित्सुखी ॥२५॥
in line 8: Wait, in line 8:तthenश्thenचwithि: श्चि! Look at line 3: मांthenश्thenचwithि: श्चि! Yes, exactly the same glyph! It's श्चि! Wait, why did I think श्रि? Because the चinश्चis attached to the right ofश्below the loop. That's standardश्च. So it is श्चिरायुः! Wait, then what is the whole word? सगुदरुक्छोमांश्चिरायुः! Wait, क्छोorक्छ्रो? Wait, "सगुदरुक्" (with rectal/anal disease, gudā-ruk), then "क्षोमांश्चिरायुः" or "कृच्छ्रांश्चिरायुः"? Wait! Could it be कृच्छ्रांश्चिरायुः? No, the letters are: स - गु - द - रु - क् - छो - मां - श्चि - रा - युः! Wait, let's look at छो: Does it have an o-matra? Yes, a vertical line with slant on top: ो. So it is indeed क्छोमांश्चिरायुःorक्तोमांश्चिरायुः`?
Wait,
.२०० फलदीपिका यदि पंचम में राहु हो तो पुत्रहीन, कठोर हृदय, और कुक्षि में रोग वाला हो । पेट का नीचे का बग़ली भाग कुक्षि कहलाता है । ऐसा व्यक्ति नाक से बोलता है—अर्थात् उसके बोलने में अनुनासिकता विशेष रहती है । यदि छठे स्थान में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु हो, किन्तु छठे में राहु गुदा रोग उत्पन्न करता है । ऐसा व्यक्ति शत्रु द्वारा या क्रूर ग्रह द्वारा पीड़ित भी होता है । यदि सप्तम में राहु हो तो जातक स्वतन्त्र, किन्तु अल्पवुद्धि वाला हो, स्त्री संग से धन नष्ट हो जाय, ऐसा व्यक्ति विधुर और अवीर्य (कम पुंस्त्व वाला) हो जाता है । पत्नी रहित हो जाने को विधुर कहते हैं । यदि अष्टम में राहु हो तो जातक विकल, वात रोग से पीड़ित, अल्प सुत वाला, अल्पायु और अशुद्ध कर्म करने वाला होता है ॥ २६ ॥ यदि नवम में राहु हो तो जातक प्रतिकूल वचन बोलने वाला और अपुण्यवान् होता है (अर्थात् पुण्य कर्म न करने वाला) किन्तु किसी समुदाय, नगर या ग्राम का नेता होता है। यदि दशम में राहु हो तो थोड़े पुत्र वाला, दूसरे के कार्य में निरत, सत्कर्महीन, निर्भय, किन्तु विख्यात हो । यदि एकादश में राहु हो तो लक्ष्मीवान् और दीर्घायु होता है किन्तु पुत्र थोड़े होते हैं और कान में कोई रोग होता है । द्वादश में राहु का निकृष्ट फल है । ऐसा व्यक्ति किसी जल रोग से पीड़ित और बहुत अधिक व्यय करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति प्रच्छन्न पाप भी करता है । अब केतु का विविध भावगतफल बताते हैं । लग्ने कृतघ्नमसुखंपिशुनं विवर्णं स्थानच्युतं विकलदेहमसत्समाजम् । विद्यार्थहीनमधमोक्तियुतं कुदृष्टि पातः परान्ननिरतं कुरुते धनस्थः ॥ २८ ॥
आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०१ आयुर्बलं धनयशःप्रमदान्नसौख्यं केतौ तृतीयभवने सहजप्रणाशम् । भूक्षेत्रयानजननीसुखजन्मभूमि- नाशं सुखे परगृहस्थितिमेव दत्ते ॥२६॥ पुत्रक्षयं जठररोगपिशाचपीडां दुर्बुद्धिमात्मनि खलप्रकृतिं च पातः । औदार्यमुत्तमगुणं दृढतां प्रसिद्धं षष्ठे प्रभुत्वमरिमर्दनमिष्टसिद्धिम् ॥३०॥ द्यूनेऽवमानमसतीरतिमान्त्ररोगं पातः स्वदारवियुतिं मदधातुहानिम् । स्वल्पायुरिष्टविरहं कलहं च रन्ध्रे शस्त्रक्षतं सकलकार्यविरोधमेव ॥३१॥ पापप्रवृत्तिमशुभं पितृभाग्यहीनं दारिद्र्यमार्यजनदूषणमाह धर्मे । सत्कर्मविघ्नमशुचित्वमवद्यकृत्यं तेजस्विनं नभसि शौर्यमतिप्रसिद्धम् ॥३२॥ लाभेऽर्थसंचयमनेकगुणं सुभोगं सद्द्रव्यसोपकरणं सकलार्थसिद्धिम् । प्रच्छन्नपापमधमव्ययमर्थनाशं रिःफे विरुद्धगतिमक्षिरुजं च पातः ॥३३॥ यदि केतु लग्न में हो तो जातक कृतघ्न, सुखहीन, चुगलखोर, असज्जनों के साथ रहने वाला, विकल देह (शरीर के किसी अंग में विकलता हो), स्थानच्युत, तथा विवर्ण होता है। विवर्ण शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। वर्ण शब्द के दो अर्थ होते हैं १. जाति और २. शरीर
२०२ फलदीपिका का रंग, इसलिये विवर्ण का अर्थ हो सकता है जातिभ्रष्ट और दूसरा अर्थ हो सकता है जिसके शरीर का रंग अच्छा न हो। यदि केतु दूसरे स्थान में हो तो विद्याहीन, धनहीन, निकृष्ट बचन बोलने वाला, कुदृष्टि¹ वाला, और दूसरे के यहाँ भोजन करने में निरत होता है। परान्ननिरत होना महान् दोष है। तृतीय भवन में केतु हो तो दीर्घायु, बलवान्, धनी और यशस्वी हो, ऐसे व्यक्ति को स्त्री सुख और अन्न सुख भी हों किन्तु तृतीय में केतु भाई को नष्ट करता है। यदि चतुर्थ में केतु हो तो जातक दूसरे के घर में रहता है और उसकी अपनी भूमि, खेत, माता, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। उसे जन्म भूमि भी छोड़नी पड़ती है। पंचम में केतु पुत्र क्षय करता है। उदर रोग भी होता है। जिनके पंचम में केतु हो वे प्रायः खल प्रकृति के और दुर्बुद्धि होते हैं। उन्हें पिशाचबाधा² भी होती है। यदि षष्ठ में केतु हो तो जातक उदार, उत्तम गुण वाला, दृढ़, प्रसिद्ध, प्रभु (श्रेष्ठपद प्राप्त करने वाला) अरिमर्दक (शत्रुओं को पराजित करने वाला) होता हैं ऐसे व्यक्ति को प्रायः इष्ट सिद्धि होती है। यदि सप्तम में केतु हो तो जातक का अपमान होता है। ऐसा जातक व्यभिचारिणी स्त्रियों में रति करता है, स्वयं अपनी पत्नी से १. नेत्र विकार अथवा जिसके देखते हुए कोई भोजन करे तो ‘नज़र’ लगजावे २. जिन आत्माओं की सद्गति नहीं होती है वे भूत या पिशाच की अवस्था में रहते हैं। यह आत्माएं जब किसी स्वस्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं तो ऐसा व्यक्ति रोगी हो जाता है और उसे घोर मानसिक यातना होती है; ऐसे रोगी को भूताविष्ट या पिशाचा- विष्ट कहते हैं। विशेष विवरण के लिये देखिये ज्योतिष का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ प्रश्नमार्ग ।
वियोग हो। अंतड़ियों का रोग हो और धातु (बीयं) रोग भी हो। हमारा अनुभव है कि जिसके सप्तम में केतु हो उसकी पत्नी रोगिणी रहती है। यदि अष्टम में केतु हो तो इष्ट (प्रियजनों) का विरह हो, कलह करे और जातक स्वल्पायु हो। अष्टम में केतु वाले को प्रायः शस्त्र से चोट लगती है और उसके सब उद्योगों में विरोध होता है। यदि केतु नवम भाव में हो तो पाप प्रवृत्ति वाला, अशुभ कर्मा, पितृहीन, भाग्यहीन, दरिद्री, और सज्जनों की निन्दा करने वाला होता है। यदि दशम में केतु हो तो सत्कर्म करने में अनेक विघ्न आवें या जातक स्वयं सत्कर्म में विघ्न उपस्थित करे, ऐसा व्यक्ति अत्यन्त तेजस्वी और अपनी शूर वीरता के लिए प्रसिद्ध हो। किन्तु ऐसा व्यक्ति दुष्ट कर्मा और अशुद्ध होता है। यदि लाभ स्थान में केतु हो तो उत्तम द्रव्य वाला, द्रव्य संग्रह करने वाला, अनेक गुणान्वित, उत्तम भोगों से युक्त होता है। ऐसे व्यक्ति के पास बहुत से भोग्य पदार्थ रहते हैं और सब कार्यों में उसे सिद्धि प्राप्त होती है। द्वादश भावस्थ केतु का अनिष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप से पाप करता है और दुष्ट कार्यों में धन व्यय करता है। ऐसे व्यक्ति प्रायः अपना धन नष्ट कर देते हैं और जो सज्जनोचित कार्य का मार्ग है, उससे विरुद्ध चलते रहते हैं। ऐसे लोगों को नेत्र रोग भी होता है। उदयर्क्षांशस्फुटतुल्यांशे निवसन् पूर्णं फलमाधत्ते । शनिवद्राहुः कुजवत्केतुः फलदाता स्यादिह संप्रोक्तः ॥३४॥ ऊपर जो विविध ग्रहों के भाव फल बताये गये हैं उनके विषय में कुछ विशेष कहते हैं। लग्न के जितने अंश गये हों उतने ही अंश का जब कोई ग्रह राशि में हो तो उस भाव का पूर्ण फल देता है। उदाहरण के लिये कुण्डली नं० (१) में लग्न का एक अंश है। और शनि भी पञ्चम में एक अंश का है, तो पंचम भाव का पूर्ण फल
२०४ फलदीपिका कुंडली नं० (१) कुंडली नं० (२) देगा किन्तु कुण्डली नं० (२) में लग्न के २९ अंश हैं और शनि का पंचम राशि में एक अंश ही है तो ऐसा शनि पंचम का पूर्ण फल नहीं देगा। मन्त्रेश्वर महाराज का तात्पर्य यह है कि जितना ग्रह भाव मध्य के समीप होगा उतना ही अधिक उस भाव का फल देगा। यहाँ पर यह सिद्धान्त माना गया है कि लग्न के जितने अंश — उतने ही अंश का प्रत्येक भाव मध्य। उदाहरण के लिये यदि मेष लग्न है और लग्न स्पष्ट ०-१ अर्थात् मेष राशि का पहला अंश है तो प्रत्येक भाव का मध्य एक ही अंश पर होगा। द्वितीय भाव मध्य वृष के एक अंश पर, तृतीय भाव मध्य मिथुन के एक अंश पर, चतुर्थ भाव मध्य कर्क के एक अंश पर इत्यादि। भाव स्पष्ट करने की प्रचलित परिपाटी उपर्युक्त रीति से भिन्न है। प्रचलित परिपाटी के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका। ज्योतिषियों का आप्त वाक्य यह है कि राहु का फल शनि के समान होता है और केतु का फल मंगल के समान।
आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०५ भावसमांशकसंस्था भावफलं पूर्णमेव कलयन्ति । न्यूनाधिकांशवशतः फलवृद्धिर्ह्रासिता वाच्या ॥३५॥ इसमें वही बात समझायी गई है जो हम ऊपर बता चुके हैं । ग्रह का भाव फल विचार करना हो तो यह देखिये कि वह भाव मध्य से कितनी दूर है । भाव मध्य के जितने समीप होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी विशेष फल करेगा । भाव मध्य से जितना दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल करेगा ।
नवाँ अध्याय राशिफल वृत्तेक्षणो दुर्बलजानुरुग्रो भीरुर्जले स्याल्लघुभुक् सुकामी । संचारशीलश्चपलोऽनृतोक्तिर्व्रणाङ्किताङ्गःक्रियभे प्रजातः ॥१॥ पृथूरुवक्त्रः कृषिकर्मकृत्स्यान्- मध्यान्तसौख्यः प्रमदाप्रियश्च । त्यागी क्षमी क्लेशसहश्च गोमान् पृष्ठास्यपार्श्वेऽङ्कयुतो वृषोत्थः ॥२॥ श्यामेक्षणः कुञ्चितमूर्द्धजः स्त्रीक्रीडानुरक्तश्च परेङ्गितज्ञः । उत्तुङ्गनासः प्रियगीतनृत्तो वसन् सदान्तः सदने च युग्मे ॥३॥ स्त्रीनिर्जितः पीनगलः समित्रो बह्वालयस्तुङ्गकटिर्धनाढ्यः । ह्रस्वश्च वक्रो द्रुतगः कुलीरे मेधान्वितस्तोयरतोऽल्पपुत्रः ॥४॥ पिङ्गेक्षणः स्थूलहनुर्विशालवक्त्रोऽभिमानी सपराक्रमः स्यात् । कुप्यत्यकार्ये वनशैलगामी मातृविधेयः स्थिरधीर्मृगेन्द्रे ॥५॥ स्रस्तांसबाहुः परवित्तगेहैः संपूज्यते सत्यरतः प्रियोक्तिः । व्रीडालसाक्षः सुरतप्रियः स्या- च्छास्त्रार्थविच्चाल्पसुतोऽङ्गनायाम् ॥६॥ चलत्कृशाङ्गोऽल्पसुतोऽतिभक्तो देवद्विजानामटनो द्विनामा ।
नवां अध्याय : राशिफल २०७ प्रांशुश्च दक्षः क्रयविक्रयेषु धीरोऽदयस्तौलिनि मध्यवादी ॥७॥ वृत्तोरुजङ्घः पृथुनेत्रवक्षा रोगी शिशुत्वे गुरुतातहोनः । क्रूरक्रियो राजकुलाभिमुख्यः कीटेऽब्जरेखाङ्कितपाणिपादः ॥८॥ दीर्घास्यकण्ठः पृथुकर्णनासः कर्मोद्यतः कुब्जतनुर्नृपेष्टः । प्रागल्भ्यवाक्त्यागयुतोऽरिहन्ता साम्नैकसाध्योऽश्वभवो बलाढ्यः ॥६॥ अधः कृशः सत्त्वयुतो गृहीत- वाक्योऽलसोऽगम्यजराङ्गनेष्टः । धर्मध्वजो भाग्ययुतोऽटनश्च वातार्दितो नक्रभवो विलज्जः ॥१०॥ प्रच्छन्नपापो घटतुल्यदेहो विघातदक्षोऽध्वसहोऽल्पवित्तः । लुब्धः परार्थो क्षयवृद्धियुक्तो घटोद्भवः स्यात्प्रियगन्धपुष्पः ॥११॥ श्रत्यम्बुपानः समचारुदेहः स्वदारगस्तोयजवित्तभोक्ता । विद्वान्कृतज्ञोऽभिभवत्यमित्रान् शुभेक्षणो भाग्ययुतोऽन्त्यराशौ ॥१२॥
२०८ फलदीपिका यदि मेष लग्न या मेष राशि हो (जन्म के समय मेष लग्न उदित हो या मेष राशि में चन्द्रमा हो) तो जातक की गोल आंखें होती हैं, उसके घुटने कमज़ोर होते हैं, वह उग्र प्रकृति का होता है, किन्तु जल से डरता है। ऐसा व्यकि चपल और घूमने का शौकीन होता है उसके शरीर में व्रण का चिन्ह होता है। ऐसे व्यक्ति कामी होते हैं किन्तु भोजन थोड़ा करते हैं। ऐसे व्यक्ति मिथ्याभाषी भी होते हैं। ॥१॥ यदि जातक का वृष लग्न हो या जन्म के समय चन्द्रमा वृष राशि में हो तो चेहरा और जांघें बड़ी होती हैं। जातक कृषि कर्म करने वाला होता है। यदि उसके जीवन को तीन भागों में बांटा जाय तो अन्तिम दो भाग सुख से व्यतीत होते हैं। ऐसा व्यक्ति प्रमदाप्रिय (स्त्रियों का शौकीन), त्यागी क्षमावान्, क्लेश सहने वाला (परिश्रमी) होता है। ऐसे व्यक्ति गोधन (गाय, बैल आदि) से युक्त होते हैं। किन्तु जातक के पीठ में, चेहरे पर, या बगल में निशान होता है— मस्से, लहसन का या व्रण का । ॥ २ ॥ यदि जन्म के समय मिथुन राशि का चन्द्रमा हो या मिथुन लग्न उदित हो तो जातक के नेत्र काले होते हैं और बाल घुंघराले। ऐसे जातक स्त्री-विलास में बहुत अनुरक्त रहते हैं परन्तु बुद्धिमान् होते हैं और दूसरे की मन्शा समझ लेते हैं। इनकी नाक ऊंची होती है, और नाच गान के शौकीन होते हैं। ऐसे लोग अपने मकान में (कमरे के अन्दर) ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं अर्थात् मकान के बाहर मेष लग्न वालों की तरह इन्हें भ्रमण पसन्द नहीं। ॥३ ॥ यदि जातक की कर्क राशि हो या जन्म के समय कर्क लग्न हो तो जातक स्त्रीनिर्जित (स्त्रियों से जीता हुआ या स्त्रियों के वशीभूत) स्थूल गले वाला और मित्रवान् होता है। ऐसे जातक के स्वयं के कई मकान होते हैं और धनाढ्य होता है। उसकी कमर मोटी होती है किन्तु कद ऊँचा नहीं होता। ऐसा जातक बुद्धिमान् और जलविहार का शौकीन होता है। वह शीघ्र चलने वाला होता है। उसके पुत्र थोड़े
होते हैं। मूल श्लोक में शब्द आया है कि वह वक्र (टेढ़ा) भी होता है। यहां हम वक्र का कुटिल अर्थ करें तो विशेष उपयुक्त होगा। ॥४॥ यदि जातक का सिंह लग्न हो या सिंह राशि में चन्द्रमा हो तो जातक का स्वरूप निम्नलिखित होता है :- पीले नेत्र, मोटी ठोढ़ी, बड़ा चेहरा। ऐसे व्यक्ति अभिमानी, पराक्रमी, स्थिर बुद्धि वाले और अपनी माता के विशेष प्यारे होते हैं। ऐसे जातक वनों में और पहाड़ों में भ्रमण करने के शौकीन होते हैं। सिंह लग्न या सिंह राशि वाले जातक छोटी-सी बात पर, जिस में क्रोध नहीं करना चाहिये उसमें भी, क्रोध करते हैं। ॥ ५ ॥ यदि जन्म के समय कन्या लग्न हो या चन्द्रमा कन्या राशि में हो तो जातक सत्य में रत (सत्य का पालन करने वाला), प्रिय वचन बोलने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के नेत्रों में लज्जा रहती है,और सुरत प्रिय होता है। कन्या लग्न या राशि के जातक शास्त्रों को जानने वाले (विद्वान्) होते हैं। दूसरे के द्रव्य और दूसरों के मकान का लाभ उठाते हैं। इनके कन्धे और बाहु ढीले होते हैं और पुत्र सन्तति भी थोड़ी होती है। ॥ ६ ॥ यदि तुला लग्न हो या तुला राशि का चन्द्रमा हो तो देवताओं और ब्राह्मणों का भक्त किन्तु चंचल और कृश शरीर वाला होता है। ऐसा व्यक्ति लम्बा, खरीद फरोख्त में होशियार, धैर्यवान्, इन्साफ़ पसन्द होता (ऐसे आदमी को अन्य लोग पंच मुकर्रर करते हैं)। तुला लग्न या तुला राशि के जातकों के प्रायः दो नाम होते हैं। सन्तान थोड़ी होती है, और जातक घूमने का शौकीन होता है। ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय विलम्ब से होता है। यदि जन्म के समय वृश्चिक लग्न हो या चन्द्रमा वृश्चिक राशि में हो तो छाती और नेत्र विशाल होते हैं। जांघ और पिडलियाँ गोल होती हैं। हाथ पैर में पद्म रेखा होती है। ऐसे जातक बचपन में बीमार रहते हैं और उन्हें पिता तथा गुरु का सुख पूर्ण नहीं होता। ऐसे व्यक्ति क्रूर क्रिया करने वाले और राजकुल में बहुत ऊँची पदवी