फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १९३ सुभार्यमसतीरतं मृतकलत्रमाढ्यं मदे चिरायुषमिलाधिपं धनिनमष्टमे संस्थितः ॥१८॥ सदारसुहृदात्मजं क्षितिपलब्धभाग्यं शुभे नभस्यतियशःसुहृत्सुखितवृत्तियुक्तं प्रभुम् । धनाढ्यमितराङ्गनारतमनेकसौख्यं भवे । भृगुर्जनयति व्यये सरतिसौख्यवित्तद्युतिम् ॥१९॥ यदि लग्न में शुक्र हो तो जातक सुन्दर शरीर वाला, नेत्रों को प्यारा लगने वाला, सुखी और दीर्घायु होता है। यदि द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो अनेक प्रकार के धन से युक्त, जातक स्वयं कवि भी होता है। शुक्र यदि तृतीय स्थान में हो तो निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति कृपण, अप्रिय, सुख और सम्पत्ति से हीन, बिना स्त्री के रहता है। यदि चतुर्थ में शुक्र हो तो अच्छी सवारी, अच्छा मकान, आभूषण, वस्त्र, सुगन्धित पदार्थों से सम्पन्न हो । ॥ १७ ॥ यदि शुक्र पंचम भाव में हो तो मनुष्य पूर्ण धनयुक्त राजा के समान वैभव वाला, पुत्र सौख्य से युत स्वयं बहुत बुद्धिमान् होता है। यदि शुक्र छठे घर में हो तो उसके कोई शत्रु नहीं होंगे किन्तु धन हीन होगा। अनेक युवतियों से उसका सम्बन्ध हो और वह स्वयं दुःखी हो। सप्तम में शुक्र हो तो मनुष्य को अच्छी पत्नी प्राप्त होगी लेकिन हो सकता है पत्नी शान्त (मृत) हो जाय। ऐसा व्यक्ति धनी होता है और असती स्त्रियों में आसक्त रहता है। अष्टम में शुक्र हो तो धनी, दीर्घायु, और भूमिपति हो ॥ १८ ॥ यदि नवम में शुक्र हो तो राजा (सरकार) की कृपा से भाग्योदय होता है। ऐसे व्यक्ति को स्त्री, पुत्र, तथा मित्रों का सुख प्राप्त रहता है। यदि शुक्र दशम भाव में हो तो जातक को अच्छा कार्य करने