भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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१९२ फलदीपिका वाला), पुत्रवान्, सुन्दर, अपने पिता से अधिक उदार होता है। कुछ अन्य पुस्तकों में यह भी लिखा है कि जिसके सप्तम में बृहस्पति हो वह अपने पिता से श्रेष्ठ पदवी को प्राप्त हो। अष्टम में बृहस्पति का निकृष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति दीन होता है और नौकरी से धनोपार्जन करता है। अष्टम में बृहस्पति वाला जघन्यकर्म (निकृष्ट कर्म करने वाला) किन्तु दीर्घायु होता है ॥ १५ ॥ यदि नवम में बृहस्पति हो तो जातक धनवान्, पुत्रवान्, विख्यात, धर्म कार्य के लिए उत्सुक और राजा का मन्त्री होता है। ऐसे व्यक्ति की धार्मिक कार्यों में प्रवृत्ति रहती है और शुभ कर्म करने में तत्पर रहता है। इसी कारण उसे धर्म कार्य में उत्सुक कहा। यदि वृहस्पति दशम भाव में हो तो जातक अत्यन्त धनी और राजा का प्यारा होता है। ऐसा व्यक्ति उत्तम आचरण करने वाला और यशस्वी भी होता है। यदि ग्यारहवें घर में वृहस्पति हो तो मनुष्य धनिक, निर्भय और दीर्घायु होता है। ऐसे व्यक्ति के पास सवारियां भी होती हैं किन्तु सन्तान थोड़ी होती है। यदि वृहस्पति बारहवें वर में हो तो ऐसे व्यक्ति से अन्य लोग द्वेष करते हैं और जातक स्वयं बुरे शब्द बोलने वाला, सन्तान हीन, पापकर्मा, आलसी, और सेवक (सेवा करने वाला) होता है ॥ १६ ॥ तनौ सुतनुदृक्प्रियं सुखिनमेव दीर्घायुषं करोति कविरर्थगः कविमनेकवित्तान्वितम् । विदारसुखसम्पदं कृपणमप्रियं विक्रमे सुवाहनसुमन्दिराभरणवस्त्रगन्धं सुखे ॥१७॥ अखण्डितधनं नृपं सुमतिमात्मजे सात्मजं विशत्रुमधनं क्षते युवतिदूषितं विक्लवम् ।