फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल १९१ आयस्थे धनिकोऽभयोऽल्पतनयो जैवातृको यानगो द्वेष्यो धिक्कृतवाग्व्यये वितनयः साघोऽलसः सेवकः ॥१६॥ अब बृहस्पति का द्वादश भाव फल बताते हैं। यदि लग्न में बृहस्पति हो तो शोभावान्, सत्कर्म करने वाला, दीर्घायु और निर्भय हो; उसे पुत्र सुख भी प्राप्त हो। यदि द्वितीय में बृहस्पति हो तो बुद्धिमान्, सुन्दर मुख वाला और वाग्मी (बोलने में कुशल) होता है। ऐसे मनुष्य को उत्तम भोजन प्राप्त होते हैं। अर्थात् द्वितीय भाव से जो-जो बातें देखी जाती हैं उन सबका सुख प्राप्त होता है। यदि तृतीय में बृहस्पति हो तो पापकर्मा, दुष्ट बुद्धि वाला, कृपण और अवज्ञा (अनादर) सहित हो। किन्तु उसका भाई किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुंचे या विख्यात हो। मूल में प्रतीतसहज शब्द आया है। इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि जिसका भाई में विश्वास हो। यदि चतुर्थ में बृहस्पति हो तो माता मित्र, भृत्य, पुत्र स्त्री, धान्य आदि का सुख प्राप्त हो और सुखी हो। ॥१४॥ यदि पंचम में बृहस्पति हो तो मिश्रित फल है। जातक बुद्धिमान् और राजा का मन्त्री होता है; किन्तु पुत्रों के कारण क्लेशयुक्त भी होता है। पुत्र उत्पन्न न होना भी क्लेश है, पुत्र का अभाव भी पुत्र- क्लेश है। पुत्र उत्पन्न होने पर नष्ट हो जावें यह भी पुत्रों से क्लेश है, तथा पुत्रों के आचरण से, व्यवहार से क्लेश उठाना पड़े या मन को क्लेश हो यह भी पुत्रों से क्लेश हुआ। छठे में बृहस्पति हो तो शत्रुओं का नाश करने वाला, आलसी, स्वयं अपमान को प्राप्त होने वाला, किन्तु मन्त्राभिचार (मन्त्रों का अनुष्ठान) करने वाला तथा चतुर होता है। यदि सप्तम में बृहस्पति हो तो सत्पत्नीवान् (उत्तम स्त्री *वाग्मी—जिसकी वाक् (बोलने की) शक्ति अच्छी हो उसे वाग्मी कहते हैं।