भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२०४ फलदीपिका कुंडली नं० (१) कुंडली नं० (२) देगा किन्तु कुण्डली नं० (२) में लग्न के २९ अंश हैं और शनि का पंचम राशि में एक अंश ही है तो ऐसा शनि पंचम का पूर्ण फल नहीं देगा। मन्त्रेश्वर महाराज का तात्पर्य यह है कि जितना ग्रह भाव मध्य के समीप होगा उतना ही अधिक उस भाव का फल देगा। यहाँ पर यह सिद्धान्त माना गया है कि लग्न के जितने अंश — उतने ही अंश का प्रत्येक भाव मध्य। उदाहरण के लिये यदि मेष लग्न है और लग्न स्पष्ट ०-१ अर्थात् मेष राशि का पहला अंश है तो प्रत्येक भाव का मध्य एक ही अंश पर होगा। द्वितीय भाव मध्य वृष के एक अंश पर, तृतीय भाव मध्य मिथुन के एक अंश पर, चतुर्थ भाव मध्य कर्क के एक अंश पर इत्यादि। भाव स्पष्ट करने की प्रचलित परिपाटी उपर्युक्त रीति से भिन्न है। प्रचलित परिपाटी के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका। ज्योतिषियों का आप्त वाक्य यह है कि राहु का फल शनि के समान होता है और केतु का फल मंगल के समान।