भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०५ भावसमांशकसंस्था भावफलं पूर्णमेव कलयन्ति । न्यूनाधिकांशवशतः फलवृद्धिर्ह्रासिता वाच्या ॥३५॥ इसमें वही बात समझायी गई है जो हम ऊपर बता चुके हैं । ग्रह का भाव फल विचार करना हो तो यह देखिये कि वह भाव मध्य से कितनी दूर है । भाव मध्य के जितने समीप होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी विशेष फल करेगा । भाव मध्य से जितना दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल करेगा ।