फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ फलदीपिका कर देता है इसलिये ऐसा मनुष्य सदैव दुःखी रहता है। चौथे घर से माता, मकान, यान (सवारी) आदि का विचार किया जाता है इसलिये इनके सूख में भी कमी करे । यदि पंचम में शनि हो तो मनुष्य शठ (शैतान) और दुष्ट बुद्धि वाला होता है और ज्ञान, सुत, धन तथा हर्ष इन चारों से रहित होता है—अर्थात् इन चीजों के सुख में कमी करता है। ऐसा मनुष्य भ्रमण करता है अथवा उसकी बुद्धि भ्रान्त रहती है। यदि छठे घर में शनि हो तो जातक बहुत भोजन करने वाला, धनी, अपने शत्रुओं का नाश करने वाला (अर्थात् जातक के शत्रु को जातक ही हानि पहुंचावें), धृष्ट (ढीठ) अभिमानी होता है। यदि सप्तम में शनि हो तो कुदार निरत (कुत्सित स्त्री में रत) दरिद्री, मार्ग चलने वाला और दुःखी होता है। पहले मार्ग चलना या यात्रा करना भी कष्ट का लक्षण समझा जाता था। ॥ २२ ॥ यदि अष्टम भाव में शनि हो तो जातक मलिन, बवासीर के रोग से पीड़ित धनहीन, क्रूर बुद्धि वाला, बुभुक्षित (भूखा) हो और उसके मित्र उसकी अवहेलना करें। ॥ २३ ॥ यदि नवम में शनि हो तो भाग्यहीन, धनहीन, सन्तानहीन, पितृ- हीन, धर्महीन होता है। नवम भाव से जिन बातों का विचार किया जाता है उन सबके सुख में कमी करता है। ऐसा व्यक्ति दुर्जन भी होता है। हमारे विचार से नवम धर्म स्थान होने के कारण, यदि उच्चस्थ
- पहले समय में घर पर आराम से बैठना सुख का लक्षण समझा जाता था और देश विदेश घूमना या बाहर भ्रमण करना कष्ट का लक्षण समझते थे। मूल संस्कृत श्लोक में भ्रान्त शब्द आया है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं एक तो यह कि जिसकी बुद्धि भ्रान्त हो—उचित निर्णय न कर सके और दूसरा अर्थ जो ऊपर दिया गया है अर्थात् घर से बाहर भ्रमण करने वाला।