फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआठवां अध्याय : भावाश्रय फल १९५ भाग्यार्थात्मजतातधर्मरहितो मन्दे शुभे दुर्जनो मन्त्री वा नृपतिर्धनी कृषिपरः शूरः प्रसिद्धोऽम्बरे । बह्वायुः स्थिरसंपदायसहितः शूरो विरोगो धनी निर्लज्जार्थसुतो व्ययेऽङ्गविकलो मूर्खो रिपूत्सारितः ॥२४॥ यदि शनि अपनी उच्चराशि (तुला) या स्वराशि (मकर या कुंभ) में स्थित होकर लग्न में हो तो राजा के समान किसी देश या नगर का स्वामी हो । ऊपर जो तीन राशियां बताई गई हैं इनके अलावा यदि किसी राशि में स्थित शनि यदि लग्न में हो तो बचपन में दुःख परिपीडित हो और बाद में भी दरिद्री, दुःखी, मलिन और आलसी हो*। यदि शनि दूसरे घर में हो तो उसका चेहरा देखने में अच्छा न होगा । ऐसा व्यक्ति अन्याय मार्ग पर चलेगा और धनहीन होगा । किन्तु बाद में (जीवन के उत्तरार्द्ध में) वह अपना निवास स्थान छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर चला जावेगा और वहां धन, सवारी तथा भोग (सुख के साधन) प्राप्त करेगा । यदि तृतीय में शनि हो तो जातक, बहुत बुद्धिमान् और उदार हो तथा उसे स्त्री सुख भी प्राप्त हो । किन्तु वह आलसी और दुःखी होता है । ॥ २१ ॥ यदि जन्म कुण्डली में शनि चौथे घर में हो तो मनुष्य गृहहीन, यानहीन और मातृहीन होता है । ऐसा व्यक्ति बचपन में रोगी भी रहता है । चतुर्थ सुख स्थान है । शनि यहां बैठकर सुख को नष्ट
- कुछ अन्य ग्रन्थों के मत से यदि धनु या मीन राशि में स्थित होकर शनि लग्न में हो तो बहुत उत्तम फल दिखाता है । तुला कोदण्ड मीनानां लग्नस्थोऽपि शनिश्चरः करोति भूपतेर्जन्म वंशे च नृपति र्भवेत् । यह मान सागरी का वचन है ।