फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ फलदीपिका का रंग, इसलिये विवर्ण का अर्थ हो सकता है जातिभ्रष्ट और दूसरा अर्थ हो सकता है जिसके शरीर का रंग अच्छा न हो। यदि केतु दूसरे स्थान में हो तो विद्याहीन, धनहीन, निकृष्ट बचन बोलने वाला, कुदृष्टि¹ वाला, और दूसरे के यहाँ भोजन करने में निरत होता है। परान्ननिरत होना महान् दोष है। तृतीय भवन में केतु हो तो दीर्घायु, बलवान्, धनी और यशस्वी हो, ऐसे व्यक्ति को स्त्री सुख और अन्न सुख भी हों किन्तु तृतीय में केतु भाई को नष्ट करता है। यदि चतुर्थ में केतु हो तो जातक दूसरे के घर में रहता है और उसकी अपनी भूमि, खेत, माता, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। उसे जन्म भूमि भी छोड़नी पड़ती है। पंचम में केतु पुत्र क्षय करता है। उदर रोग भी होता है। जिनके पंचम में केतु हो वे प्रायः खल प्रकृति के और दुर्बुद्धि होते हैं। उन्हें पिशाचबाधा² भी होती है। यदि षष्ठ में केतु हो तो जातक उदार, उत्तम गुण वाला, दृढ़, प्रसिद्ध, प्रभु (श्रेष्ठपद प्राप्त करने वाला) अरिमर्दक (शत्रुओं को पराजित करने वाला) होता हैं ऐसे व्यक्ति को प्रायः इष्ट सिद्धि होती है। यदि सप्तम में केतु हो तो जातक का अपमान होता है। ऐसा जातक व्यभिचारिणी स्त्रियों में रति करता है, स्वयं अपनी पत्नी से १. नेत्र विकार अथवा जिसके देखते हुए कोई भोजन करे तो ‘नज़र’ लगजावे २. जिन आत्माओं की सद्गति नहीं होती है वे भूत या पिशाच की अवस्था में रहते हैं। यह आत्माएं जब किसी स्वस्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं तो ऐसा व्यक्ति रोगी हो जाता है और उसे घोर मानसिक यातना होती है; ऐसे रोगी को भूताविष्ट या पिशाचा- विष्ट कहते हैं। विशेष विवरण के लिये देखिये ज्योतिष का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ प्रश्नमार्ग ।