भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०१ आयुर्बलं धनयशःप्रमदान्नसौख्यं केतौ तृतीयभवने सहजप्रणाशम् । भूक्षेत्रयानजननीसुखजन्मभूमि- नाशं सुखे परगृहस्थितिमेव दत्ते ॥२६॥ पुत्रक्षयं जठररोगपिशाचपीडां दुर्बुद्धिमात्मनि खलप्रकृतिं च पातः । औदार्यमुत्तमगुणं दृढतां प्रसिद्धं षष्ठे प्रभुत्वमरिमर्दनमिष्टसिद्धिम् ॥३०॥ द्यूनेऽवमानमसतीरतिमान्त्ररोगं पातः स्वदारवियुतिं मदधातुहानिम् । स्वल्पायुरिष्टविरहं कलहं च रन्ध्रे शस्त्रक्षतं सकलकार्यविरोधमेव ॥३१॥ पापप्रवृत्तिमशुभं पितृभाग्यहीनं दारिद्र्यमार्यजनदूषणमाह धर्मे । सत्कर्मविघ्नमशुचित्वमवद्यकृत्यं तेजस्विनं नभसि शौर्यमतिप्रसिद्धम् ॥३२॥ लाभेऽर्थसंचयमनेकगुणं सुभोगं सद्द्रव्यसोपकरणं सकलार्थसिद्धिम् । प्रच्छन्नपापमधमव्ययमर्थनाशं रिःफे विरुद्धगतिमक्षिरुजं च पातः ॥३३॥ यदि केतु लग्न में हो तो जातक कृतघ्न, सुखहीन, चुगलखोर, असज्जनों के साथ रहने वाला, विकल देह (शरीर के किसी अंग में विकलता हो), स्थानच्युत, तथा विवर्ण होता है। विवर्ण शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। वर्ण शब्द के दो अर्थ होते हैं १. जाति और २. शरीर

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