भारतकोश
संग्रह पर लौटें

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०१ आयुर्बलं धनयशःप्रमदान्नसौख्यं केतौ तृतीयभवने सहजप्रणाशम् । भूक्षेत्रयानजननीसुखजन्मभूमि- नाशं सुखे परगृहस्थितिमेव दत्ते ॥२६॥ पुत्रक्षयं जठररोगपिशाचपीडां दुर्बुद्धिमात्मनि खलप्रकृतिं च पातः । औदार्यमुत्तमगुणं दृढतां प्रसिद्धं षष्ठे प्रभुत्वमरिमर्दनमिष्टसिद्धिम् ॥३०॥ द्यूनेऽवमानमसतीरतिमान्त्ररोगं पातः स्वदारवियुतिं मदधातुहानिम् । स्वल्पायुरिष्टविरहं कलहं च रन्ध्रे शस्त्रक्षतं सकलकार्यविरोधमेव ॥३१॥ पापप्रवृत्तिमशुभं पितृभाग्यहीनं दारिद्र्यमार्यजनदूषणमाह धर्मे । सत्कर्मविघ्नमशुचित्वमवद्यकृत्यं तेजस्विनं नभसि शौर्यमतिप्रसिद्धम् ॥३२॥ लाभेऽर्थसंचयमनेकगुणं सुभोगं सद्द्रव्यसोपकरणं सकलार्थसिद्धिम् । प्रच्छन्नपापमधमव्ययमर्थनाशं रिःफे विरुद्धगतिमक्षिरुजं च पातः ॥३३॥ यदि केतु लग्न में हो तो जातक कृतघ्न, सुखहीन, चुगलखोर, असज्जनों के साथ रहने वाला, विकल देह (शरीर के किसी अंग में विकलता हो), स्थानच्युत, तथा विवर्ण होता है। विवर्ण शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। वर्ण शब्द के दो अर्थ होते हैं १. जाति और २. शरीर

२०२ फलदीपिका का रंग, इसलिये विवर्ण का अर्थ हो सकता है जातिभ्रष्ट और दूसरा अर्थ हो सकता है जिसके शरीर का रंग अच्छा न हो। यदि केतु दूसरे स्थान में हो तो विद्याहीन, धनहीन, निकृष्ट बचन बोलने वाला, कुदृष्टि¹ वाला, और दूसरे के यहाँ भोजन करने में निरत होता है। परान्ननिरत होना महान् दोष है। तृतीय भवन में केतु हो तो दीर्घायु, बलवान्, धनी और यशस्वी हो, ऐसे व्यक्ति को स्त्री सुख और अन्न सुख भी हों किन्तु तृतीय में केतु भाई को नष्ट करता है। यदि चतुर्थ में केतु हो तो जातक दूसरे के घर में रहता है और उसकी अपनी भूमि, खेत, माता, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। उसे जन्म भूमि भी छोड़नी पड़ती है। पंचम में केतु पुत्र क्षय करता है। उदर रोग भी होता है। जिनके पंचम में केतु हो वे प्रायः खल प्रकृति के और दुर्बुद्धि होते हैं। उन्हें पिशाचबाधा² भी होती है। यदि षष्ठ में केतु हो तो जातक उदार, उत्तम गुण वाला, दृढ़, प्रसिद्ध, प्रभु (श्रेष्ठपद प्राप्त करने वाला) अरिमर्दक (शत्रुओं को पराजित करने वाला) होता हैं ऐसे व्यक्ति को प्रायः इष्ट सिद्धि होती है। यदि सप्तम में केतु हो तो जातक का अपमान होता है। ऐसा जातक व्यभिचारिणी स्त्रियों में रति करता है, स्वयं अपनी पत्नी से १. नेत्र विकार अथवा जिसके देखते हुए कोई भोजन करे तो ‘नज़र’ लगजावे २. जिन आत्माओं की सद्गति नहीं होती है वे भूत या पिशाच की अवस्था में रहते हैं। यह आत्माएं जब किसी स्वस्थ मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं तो ऐसा व्यक्ति रोगी हो जाता है और उसे घोर मानसिक यातना होती है; ऐसे रोगी को भूताविष्ट या पिशाचा- विष्ट कहते हैं। विशेष विवरण के लिये देखिये ज्योतिष का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ प्रश्नमार्ग ।

वियोग हो। अंतड़ियों का रोग हो और धातु (बीयं) रोग भी हो। हमारा अनुभव है कि जिसके सप्तम में केतु हो उसकी पत्नी रोगिणी रहती है। यदि अष्टम में केतु हो तो इष्ट (प्रियजनों) का विरह हो, कलह करे और जातक स्वल्पायु हो। अष्टम में केतु वाले को प्रायः शस्त्र से चोट लगती है और उसके सब उद्योगों में विरोध होता है। यदि केतु नवम भाव में हो तो पाप प्रवृत्ति वाला, अशुभ कर्मा, पितृहीन, भाग्यहीन, दरिद्री, और सज्जनों की निन्दा करने वाला होता है। यदि दशम में केतु हो तो सत्कर्म करने में अनेक विघ्न आवें या जातक स्वयं सत्कर्म में विघ्न उपस्थित करे, ऐसा व्यक्ति अत्यन्त तेजस्वी और अपनी शूर वीरता के लिए प्रसिद्ध हो। किन्तु ऐसा व्यक्ति दुष्ट कर्मा और अशुद्ध होता है। यदि लाभ स्थान में केतु हो तो उत्तम द्रव्य वाला, द्रव्य संग्रह करने वाला, अनेक गुणान्वित, उत्तम भोगों से युक्त होता है। ऐसे व्यक्ति के पास बहुत से भोग्य पदार्थ रहते हैं और सब कार्यों में उसे सिद्धि प्राप्त होती है। द्वादश भावस्थ केतु का अनिष्ट फल है। ऐसा व्यक्ति गुप्त रूप से पाप करता है और दुष्ट कार्यों में धन व्यय करता है। ऐसे व्यक्ति प्रायः अपना धन नष्ट कर देते हैं और जो सज्जनोचित कार्य का मार्ग है, उससे विरुद्ध चलते रहते हैं। ऐसे लोगों को नेत्र रोग भी होता है। उदयर्क्षांशस्फुटतुल्यांशे निवसन् पूर्णं फलमाधत्ते । शनिवद्राहुः कुजवत्केतुः फलदाता स्यादिह संप्रोक्तः ॥३४॥ ऊपर जो विविध ग्रहों के भाव फल बताये गये हैं उनके विषय में कुछ विशेष कहते हैं। लग्न के जितने अंश गये हों उतने ही अंश का जब कोई ग्रह राशि में हो तो उस भाव का पूर्ण फल देता है। उदाहरण के लिये कुण्डली नं० (१) में लग्न का एक अंश है। और शनि भी पञ्चम में एक अंश का है, तो पंचम भाव का पूर्ण फल

२०४ फलदीपिका कुंडली नं० (१) कुंडली नं० (२) देगा किन्तु कुण्डली नं० (२) में लग्न के २९ अंश हैं और शनि का पंचम राशि में एक अंश ही है तो ऐसा शनि पंचम का पूर्ण फल नहीं देगा। मन्त्रेश्वर महाराज का तात्पर्य यह है कि जितना ग्रह भाव मध्य के समीप होगा उतना ही अधिक उस भाव का फल देगा। यहाँ पर यह सिद्धान्त माना गया है कि लग्न के जितने अंश — उतने ही अंश का प्रत्येक भाव मध्य। उदाहरण के लिये यदि मेष लग्न है और लग्न स्पष्ट ०-१ अर्थात् मेष राशि का पहला अंश है तो प्रत्येक भाव का मध्य एक ही अंश पर होगा। द्वितीय भाव मध्य वृष के एक अंश पर, तृतीय भाव मध्य मिथुन के एक अंश पर, चतुर्थ भाव मध्य कर्क के एक अंश पर इत्यादि। भाव स्पष्ट करने की प्रचलित परिपाटी उपर्युक्त रीति से भिन्न है। प्रचलित परिपाटी के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका। ज्योतिषियों का आप्त वाक्य यह है कि राहु का फल शनि के समान होता है और केतु का फल मंगल के समान।

आठवाँ अध्याय : भावाश्रय फल २०५ भावसमांशकसंस्था भावफलं पूर्णमेव कलयन्ति । न्यूनाधिकांशवशतः फलवृद्धिर्ह्रासिता वाच्या ॥३५॥ इसमें वही बात समझायी गई है जो हम ऊपर बता चुके हैं । ग्रह का भाव फल विचार करना हो तो यह देखिये कि वह भाव मध्य से कितनी दूर है । भाव मध्य के जितने समीप होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी विशेष फल करेगा । भाव मध्य से जितना दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल करेगा ।

नवाँ अध्याय राशिफल वृत्तेक्षणो दुर्बलजानुरुग्रो भीरुर्जले स्याल्लघुभुक् सुकामी । संचारशीलश्चपलोऽनृतोक्तिर्व्रणाङ्किताङ्गःक्रियभे प्रजातः ॥१॥ पृथूरुवक्त्रः कृषिकर्मकृत्स्यान्- मध्यान्तसौख्यः प्रमदाप्रियश्च । त्यागी क्षमी क्लेशसहश्च गोमान् पृष्ठास्यपार्श्वेऽङ्कयुतो वृषोत्थः ॥२॥ श्यामेक्षणः कुञ्चितमूर्द्धजः स्त्रीक्रीडानुरक्तश्च परेङ्गितज्ञः । उत्तुङ्गनासः प्रियगीतनृत्तो वसन् सदान्तः सदने च युग्मे ॥३॥ स्त्रीनिर्जितः पीनगलः समित्रो बह्वालयस्तुङ्गकटिर्धनाढ्यः । ह्रस्वश्च वक्रो द्रुतगः कुलीरे मेधान्वितस्तोयरतोऽल्पपुत्रः ॥४॥ पिङ्गेक्षणः स्थूलहनुर्विशालवक्त्रोऽभिमानी सपराक्रमः स्यात् । कुप्यत्यकार्ये वनशैलगामी मातृविधेयः स्थिरधीर्मृगेन्द्रे ॥५॥ स्रस्तांसबाहुः परवित्तगेहैः संपूज्यते सत्यरतः प्रियोक्तिः । व्रीडालसाक्षः सुरतप्रियः स्या- च्छास्त्रार्थविच्चाल्पसुतोऽङ्गनायाम् ॥६॥ चलत्कृशाङ्गोऽल्पसुतोऽतिभक्तो देवद्विजानामटनो द्विनामा ।

नवां अध्याय : राशिफल २०७ प्रांशुश्च दक्षः क्रयविक्रयेषु धीरोऽदयस्तौलिनि मध्यवादी ॥७॥ वृत्तोरुजङ्घः पृथुनेत्रवक्षा रोगी शिशुत्वे गुरुतातहोनः । क्रूरक्रियो राजकुलाभिमुख्यः कीटेऽब्जरेखाङ्कितपाणिपादः ॥८॥ दीर्घास्यकण्ठः पृथुकर्णनासः कर्मोद्यतः कुब्जतनुर्नृपेष्टः । प्रागल्भ्यवाक्त्यागयुतोऽरिहन्ता साम्नैकसाध्योऽश्वभवो बलाढ्यः ॥६॥ अधः कृशः सत्त्वयुतो गृहीत- वाक्योऽलसोऽगम्यजराङ्गनेष्टः । धर्मध्वजो भाग्ययुतोऽटनश्च वातार्दितो नक्रभवो विलज्जः ॥१०॥ प्रच्छन्नपापो घटतुल्यदेहो विघातदक्षोऽध्वसहोऽल्पवित्तः । लुब्धः परार्थो क्षयवृद्धियुक्तो घटोद्भवः स्यात्प्रियगन्धपुष्पः ॥११॥ श्रत्यम्बुपानः समचारुदेहः स्वदारगस्तोयजवित्तभोक्ता । विद्वान्कृतज्ञोऽभिभवत्यमित्रान् शुभेक्षणो भाग्ययुतोऽन्त्यराशौ ॥१२॥

२०८ फलदीपिका यदि मेष लग्न या मेष राशि हो (जन्म के समय मेष लग्न उदित हो या मेष राशि में चन्द्रमा हो) तो जातक की गोल आंखें होती हैं, उसके घुटने कमज़ोर होते हैं, वह उग्र प्रकृति का होता है, किन्तु जल से डरता है। ऐसा व्यकि चपल और घूमने का शौकीन होता है उसके शरीर में व्रण का चिन्ह होता है। ऐसे व्यक्ति कामी होते हैं किन्तु भोजन थोड़ा करते हैं। ऐसे व्यक्ति मिथ्याभाषी भी होते हैं। ॥१॥ यदि जातक का वृष लग्न हो या जन्म के समय चन्द्रमा वृष राशि में हो तो चेहरा और जांघें बड़ी होती हैं। जातक कृषि कर्म करने वाला होता है। यदि उसके जीवन को तीन भागों में बांटा जाय तो अन्तिम दो भाग सुख से व्यतीत होते हैं। ऐसा व्यक्ति प्रमदाप्रिय (स्त्रियों का शौकीन), त्यागी क्षमावान्, क्लेश सहने वाला (परिश्रमी) होता है। ऐसे व्यक्ति गोधन (गाय, बैल आदि) से युक्त होते हैं। किन्तु जातक के पीठ में, चेहरे पर, या बगल में निशान होता है— मस्से, लहसन का या व्रण का । ॥ २ ॥ यदि जन्म के समय मिथुन राशि का चन्द्रमा हो या मिथुन लग्न उदित हो तो जातक के नेत्र काले होते हैं और बाल घुंघराले। ऐसे जातक स्त्री-विलास में बहुत अनुरक्त रहते हैं परन्तु बुद्धिमान् होते हैं और दूसरे की मन्शा समझ लेते हैं। इनकी नाक ऊंची होती है, और नाच गान के शौकीन होते हैं। ऐसे लोग अपने मकान में (कमरे के अन्दर) ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं अर्थात् मकान के बाहर मेष लग्न वालों की तरह इन्हें भ्रमण पसन्द नहीं। ॥३ ॥ यदि जातक की कर्क राशि हो या जन्म के समय कर्क लग्न हो तो जातक स्त्रीनिर्जित (स्त्रियों से जीता हुआ या स्त्रियों के वशीभूत) स्थूल गले वाला और मित्रवान् होता है। ऐसे जातक के स्वयं के कई मकान होते हैं और धनाढ्य होता है। उसकी कमर मोटी होती है किन्तु कद ऊँचा नहीं होता। ऐसा जातक बुद्धिमान् और जलविहार का शौकीन होता है। वह शीघ्र चलने वाला होता है। उसके पुत्र थोड़े

होते हैं। मूल श्लोक में शब्द आया है कि वह वक्र (टेढ़ा) भी होता है। यहां हम वक्र का कुटिल अर्थ करें तो विशेष उपयुक्त होगा। ॥४॥ यदि जातक का सिंह लग्न हो या सिंह राशि में चन्द्रमा हो तो जातक का स्वरूप निम्नलिखित होता है :- पीले नेत्र, मोटी ठोढ़ी, बड़ा चेहरा। ऐसे व्यक्ति अभिमानी, पराक्रमी, स्थिर बुद्धि वाले और अपनी माता के विशेष प्यारे होते हैं। ऐसे जातक वनों में और पहाड़ों में भ्रमण करने के शौकीन होते हैं। सिंह लग्न या सिंह राशि वाले जातक छोटी-सी बात पर, जिस में क्रोध नहीं करना चाहिये उसमें भी, क्रोध करते हैं। ॥ ५ ॥ यदि जन्म के समय कन्या लग्न हो या चन्द्रमा कन्या राशि में हो तो जातक सत्य में रत (सत्य का पालन करने वाला), प्रिय वचन बोलने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के नेत्रों में लज्जा रहती है,और सुरत प्रिय होता है। कन्या लग्न या राशि के जातक शास्त्रों को जानने वाले (विद्वान्) होते हैं। दूसरे के द्रव्य और दूसरों के मकान का लाभ उठाते हैं। इनके कन्धे और बाहु ढीले होते हैं और पुत्र सन्तति भी थोड़ी होती है। ॥ ६ ॥ यदि तुला लग्न हो या तुला राशि का चन्द्रमा हो तो देवताओं और ब्राह्मणों का भक्त किन्तु चंचल और कृश शरीर वाला होता है। ऐसा व्यक्ति लम्बा, खरीद फरोख्त में होशियार, धैर्यवान्, इन्साफ़ पसन्द होता (ऐसे आदमी को अन्य लोग पंच मुकर्रर करते हैं)। तुला लग्न या तुला राशि के जातकों के प्रायः दो नाम होते हैं। सन्तान थोड़ी होती है, और जातक घूमने का शौकीन होता है। ऐसे व्यक्तियों का भाग्योदय विलम्ब से होता है। यदि जन्म के समय वृश्चिक लग्न हो या चन्द्रमा वृश्चिक राशि में हो तो छाती और नेत्र विशाल होते हैं। जांघ और पिडलियाँ गोल होती हैं। हाथ पैर में पद्म रेखा होती है। ऐसे जातक बचपन में बीमार रहते हैं और उन्हें पिता तथा गुरु का सुख पूर्ण नहीं होता। ऐसे व्यक्ति क्रूर क्रिया करने वाले और राजकुल में बहुत ऊँची पदवी

२१० फलदीपिका धारण करने वाले अर्थात् उच्चाधिकारी होते हैं । ॥ ८ ॥ जिनके जन्म के समय धनु लग्न हो या धनु राशि में चन्द्रमा हो उनकी नाक, कान, चेहरे और कण्ठ बड़े होते है। ऐसे व्यक्ति किसी न किसी कार्य में लगे रहते हैं अर्थात् निठल्ले नहीं बैठते। बोलने में बहुत प्रगल्भ और त्यागी होते हैं। इनका कद बहुत ऊंचा नही होता। या कुछ झुक कर चलते हैं। ये लोग साहसी होते हैं और अपने शत्रुओं को पछाड़ देते हैं। ये लोग बलाढ्य और राजा के प्यारे भी होते हैं। ऐसे व्यक्ति को समझा कर ही अपने वश में किया जा सकता है। उनसे कोई काम कराना हो तो वश करने के जो चार साधन* हैं उनमें से केवल "साम" से, उनसे कार्य कराया जा सकता है। जिनका मकर लग्न हो या जन्म के समय चन्द्रमा मकर राशि में हो उनके शरीर के नीचे का भाग अर्थात् (कमर से पैर तक) कृश होता है। किन्तु ऐसे व्यक्ति में सत्व (शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक शक्ति) काफी होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की वातमानते हैं किन्तु स्वभाव से आलसी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का सम्बन्ध किसी अधिक वयवाली अगम्या स्त्री से होता है। ऐसा व्यक्ति धर्मध्वज होता है अर्थात् उसका बाहरी आवरण बहुत धार्मिकता का होता है। वह घूमने का शौकीन और भाग्यवान् किन्तु लज्जाहीन होता है। मकर लग्न या मकर-चन्द्र के जातक वात रोग से पीड़ित होते हैं। ॥ १० ॥ अब कुंभ लग्न वाले या जिनके जन्म के समय चन्द्रमा कुंभ राशि में हो उनका फल बताते हैं। ऐसे व्यक्ति छिपकर पाप करने वाले, थोड़े द्रव्य वाले, लोभी, दूसरे के धन के इच्छुक, मार्ग चलने का परिश्रम सहन करने वाले और दूसरों को चोट पहुंचाने मे दक्ष होते हैं। इनका शरीर भी घड़े के आकार का होता है। पुष्पों के और सुगन्धित द्रव्यों के ये शौकीन होते हैं। कभी यह क्षय को प्राप्त साम, दान, दण्ड, भेद ।

नवाँ अध्याय : राशिफल २११ होते हैं और कभी वृद्धि को अर्थात् इनकी आर्थिक स्थिति में उतार चढ़ाव आता रहता है। ॥१॥ जिनकी मीन राशि होती है या जन्म के समय मीन लग्न होता है उनके शरीर के अंग बराबर (जितने बड़े होने चाहिएँ) और सुन्दर होते हैं। ऐसे व्यक्ति की दृष्टि बहुत सुन्दर होती है। ये लोग विद्वान्, कृतज्ञ, अपनी स्त्री में सन्तुष्ट रहने वाले (अर्थात् अन्य स्त्री प्रसंग से रहित) भाग्यवान् होते हैं। जल से उत्पन्न पदार्थों द्वारा इन्हें धन प्राप्त होता है। आजकल के समय में समुद्र पार से आने जाने वाले पदार्थों को भी हम लोग जल से उत्पन्न या सम्बन्धित मान सकते हैं। ऐसे जातक अपने अमित्रों (शत्रुओं) को परास्त कर उन पर विजय प्राप्त करते हैं। राशेः स्वभावाश्रयरूपवर्णान् ज्ञात्वानुरूपाणि फलानि तस्य । युक्त्या वदेदत्र फलं विलग्ने यच्चन्द्रलग्नेऽपि तदेव वाच्यम् ॥१३॥ ग्रहे सति निजोच्चगे भवति रत्नगर्भाधिपो महीपतिकृतस्तुतिर्महितसंपदामालयः । उदारगुणसंयुतो जयति विक्रमार्को यथा नये यशसि विक्रमे वितरणे धृतौ कौशले ॥१४॥ स्वमन्दिरगते ग्रहे प्रभुपरिग्रहादार्यतं प्रभुत्वमपि वा गृहस्थितिमचञ्चलां प्राप्नुयात् । नवं भुवनमुर्वराक्षितिमुपैति काले स्वके जने बहुमतिं पुनः सकलनष्टवस्तून्यपि ॥१५॥ ग्रहः सुहृत्क्षेत्रगतः सुहृद्भिः कार्यस्य सिद्धिं नवसौहृदं च ।

२१२ फलदीपिका सत्पुत्रजायाधनधान्यभाग्यं ददात्ययं सर्वजनानुकूल्यम् ॥१६॥ गते ग्रहे शत्रुगृहं निकृष्टतां परान्नवृत्तिं परमन्दिरस्थितिम् । अकिंचनत्वं रिपुपीडनं सदा स्निग्धोऽपि तस्यातिरिपुत्वमाप्नुयात् ॥१७॥ नीचे ग्रहेऽधः पतनं स्ववृत्तेर्दैन्यं दुराचारमृणाप्तिमाहुः । नीचाश्रयं कीकटदेशवासं भृत्यत्वमध्वानमनर्थकार्यम् ॥१८॥ ग्रहो मौढ्यं प्राप्तो मरणमचिरात् स्त्रीसुतधनैः प्रहीणत्वं व्यर्थे कलहमपवादं परिभवम् । समर्क्षस्थः खेटो न कलयति वैशेषिकफलं सुखं वा दुःखं वा जनयति यथापूर्वमचलम् ॥१९॥ वक्रं गतः स्वोच्चफलं विदध्या त्सपत्ननीचर्क्षगतोऽपि खेटः । वर्गोत्तमांशस्थितखेचरोऽपि स्वक्षेत्रगस्योक्तफलानि तद्वत् ॥२०॥ जिस राशि का विचार करना हो उस राशि का जो आश्रय स्वभाव, रूप वर्ण आदि बताया गया हो उसका पूर्ण विचार रखना चाहिये। राशीश (राशि का स्वामी) पूर्ण बलवान् है या नहीं—कहां बैठा है, किसके साथ बैठा है, राशीश पर किस-किस की दृष्टि है तथा उस राशि में कौन-कौन से ग्रह बैठे हैं तथा कौन-कौन से ग्रह उस राशि को देखते हैं इन सबका विचार करके युक्तिपूर्वक (अर्थात् उपर्युक्त सभी बातों को मद्देनज़र रखते हुए—किस व्यक्ति की जन्मकुण्डली का विचार कर रहे हैं इस सम्बन्ध में भी देश-काल पात्र का विचार करके) फलादेश करना चाहिये। लग्न और चन्द्रराशि का फल प्रायः एक सा होता है। उदाहरण के लिये जैसा मेष लग्न

का फल उस से मिलता जुलता फल मेष राशि (मेष में चन्द्रमा हो) का भी कहना चाहिये । इसी कारण ऊपर के बारहों श्लोकों का भावार्थ देते हुए हमने लग्न और राशि दोनों का एक साथ फल दे दिया है। ॥१३॥ अब ग्रहों का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी उच्चराशि में हो तो जातक रत्नगर्भा* (पृथ्वी) का स्वामी होता है; राजा लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और उसके पास बहुत सी कीमती सम्पत्ति रहती है। जातक में बहुत से विशिष्ट गुण होंगे और नीति, यश, विक्रम, दानशीलता, धैर्य तथा चतुरता में वह महाराज विक्रमादित्य की तरह तेजस्वी होगा।** अब स्वराशि गत ग्रह का फलादेश कहते हैं। यदि ग्रह अपनी राशि में हो तो उसकी दशा में प्रभु (विशिष्ट पुरुष) के अनुग्रह से शक्ति, उच्च स्थिति और गृह का दृढ़ सुख होता है अर्थात् ऐसा जातक आराम से अपने घर में बैठा रहता है। पहले के समय में घर में आराम से बैठना सबसे बड़ा सुख समझा जाता था। इसके अतिरिक्त स्वगृही ग्रह का फल यही होना चाहिए कि स्वगृह में बैठावे अर्थात् अपने घर में आराम से रक्खे, परदेश में न घुमावे । नवीन मकान प्राप्त हो और ऐसी नवीन भूमि प्राप्त हो जिसमें सब प्रकार की फसलें पैदा होती हों। स्वगृही ग्रह की दशा में मनुष्य लोकसम्मान प्राप्त करता है और यदि पहले की अनिष्ट महादशा में कोई वस्तु नष्ट हो गई हो तो वह भी उसे पुनः प्राप्त हो जाती है। ॥ १५ ॥

  • रत्नगर्भा का यह भी अर्थ हो सकता है कि जिसके गर्भ में अर्थात् तहखानों में रत्न भरे हों और उच्चराशि का ग्रह मनुष्य को धनिक बनाता है। ** उच्चग्रह की जो इतनी प्रशंसा लिखी है वह वास्तव में तभी फलीभूत होती है जब वह उत्तम घर का स्वामी हो और उत्तम स्थान पर बैठा भी हो, साथ ही नवांश आदि वर्गों में भी बलवान् हो ।

२१४ फलदीपिका अब मित्र राशि में स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह अपने मित्र की राशि में हो तो मित्रों द्वारा कार्य सिद्धि होती है और नवीन मित्र भी पैदा होते हैं। इसके कारण उत्तम पुत्र, स्त्री सुख, धन सुख, धान्य सुख तथा भाग्योदय होता है और सब जनों की अनुकूलता रहती है। ।। १६ ।। अब शत्रु राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह शत्रु राशि में हो तो मनुष्य दूसरे के अन्न पर (दूसरे की सेवा पर) निर्भर रहता है; उसे दूसरे के मकान में पड़ा रहना पड़े। अकिंचनता(दरिद्रता) हो और ऐसा जातक शत्रुओं से पीड़ा पाता रहे। जो उसके प्रिय मित्र भी हों वह भी शत्रु हो जायें अर्थात् मित्रों से लाभ कुछ न हो बल्कि उनके व्यवहार से कष्ट हो। शत्रुओं से पीड़ा हो। ।। १७ ।। *अब नीच राशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। यदि ग्रह नीच हो तो उसकी दशा में अधःपतन होता है अर्थात् स्थिति में गिरावट होती है। इसका फल दीनता, दुराचार और कर्जदारी भी है। अर्थात् नीच ग्रह की दशा में बुद्धिविपर्यय होने के कारण मनुष्य कुत्सित आचरण करता है, धन की कमी के कारण ऋण भार से दबना पड़ता है। नीच ग्रह की दशा में नीच जनों की मातहती करनी पड़ती है। कुत्सित देश में रहना पड़ता है। कष्टपूर्ण यात्रायें करनी पड़ती है; दूसरे का भृत्यत्व (नौकरी का कष्ट—प्रायः मातहती) उठानी पड़ती है और अनर्थ परम्परा उपस्थित होती है। ।।१८ ।।

  • यहां जो मित्र राशि शब्द आया है उससे नैसर्गिक मित्र राशि समझना चाहिए। यदि तात्कालिक मित्र भी हो तो और भी उत्तम, यदि मित्र की राशि में होकर नीच राशि में हो जैसे शुक्र कन्या में। बुध शुक्र का मित्र है और बुध की राशि कन्या में शुक्र मित्र गृही किन्तु नीच हुए तो श्लोक १६ में वर्णित फल नहीं होगा। नीच राशि स्थित ग्रह के लिए देखिये श्लोक १८।

नवाँ अध्याय : राशिफल २१५ अब मूढ़* ग्रह और समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। (क) यदि कोई ग्रह अस्त हो तो उस ग्रह की दशा लगते ही शीघ्र ही मृत्यु (या मृत्यु समान कष्ट) हो। स्त्री, सुत, धन तीनों से हीनता हो अर्थात् इन सबके कारण भी दुःख उठाना पड़े। व्यर्थ कलह हो, अपवाद लगे और जातक की हार या अपमान हो। (ख) अब समराशि स्थित ग्रह का फल बताते हैं। जो ग्रह न मित्र हो न शत्रु हो वह सम कहलाता है। समराशि स्थित ग्रह की दशा में कोई विशेष भला या विशेष बुरा फल नहीं होता। न वह विशेष सुख उत्पन्न करने में समर्थ होता और न विशेष दुःख ही उत्पन्न करता है। जैसी स्थिति ग्रह की दशा लगने के पहले रहती है वैसी ही कायम रहती है। ॥ १९ ॥ अब वक्रीग्रह तथा वर्गोत्तम ग्रह का फल बताते हैं। (क) चाहे ग्रह शत्रु राशि में हो, चाहे ग्रह नीच राशि में हो, चाहे ग्रह शत्रु राशि, नीच राशि दोनों में हो यदि वह वक्री है तो उच्च ग्रह (उच्चराशि स्थित ग्रह) के समान उत्तम फल करेगा। (ख) यदि ग्रह वर्गोत्तम* में हो—अर्थात् जिस राशि में हो उसी नवांश में भी हो तो वह स्वगृही ग्रह के समान जोरदार शुभ फल करता है। ॥ २० ॥ नीचे लिखे अंशों में ग्रह वर्गोत्तम होता है। अंश कला अंश कला मेष राशि ०- ० से ३-२० तक वृषभ ,, १३-२० से १६-४० मिथुन ,, २६-४० से ३०- ० कर्क ,, ०- ० से ३-२०

  • जो ग्रह सूर्य के इतने समीप होता है कि २४ घंटे में कभी भी दिखाई न दे वह अस्त कहलाता है। अस्त ग्रह का प्रभाव प्रायः अच्छा नहीं होता। इसी अस्त ग्रह को कोई मूढ़, कोई विकल कहते हैं।
  • मेषराशि, मेष नवांश; वृष राशि वृष नवांश; मिथुन राशि मिथुन नवांश; कर्क राशि कर्क नवांश; इस प्रकार ग्रह जिस राशि में हो उसी नवांश में भी हो तो वर्गोत्तम कहलाता है।

२१६ फलदीपिका सिंह ,, १३-२० से १६-४० ,, कन्या ,, २६-४० से ३०- ० ,, तुला ,, ०- ० से ३-२० ,, वृश्चिक ,, १३-२० से १६-४० ,, धनु ,, २६-४० से ३०- ० ,, मकर ,, ०- ० से ३-२० ,, कुंभ ,, १३-२० से १६-४० ,, मीन ,, २६-४० से ३०- ० ,, जिनको ज्योतिष का अभ्यास है उनको तो अपने आप ही वर्गोत्तम अंश किस राशि में किस अंश किस कला से किस अंश किस कला तक होता है, यह याद ही रहता है किन्तु जो नवीन ज्योतिष प्रेमी हैं उनको वर्गोत्तम किन अंशों में रहता है यह याद रखने के लिये यह सुन्दर नियम है कि चर राशि (मेष, कर्क, तुला, मकर) का प्रथम नवांश, स्थिर राशि (वृष, सिंह, वृश्चिक तथा कुंभ) का मध्य नवांश और द्विस्वभाव राशि का अंतिस नवांश वर्गोत्तम होता है। एक राशि के ९ हिस्से किये जावें तो एक हिस्से का नाम नवांश (नव — ९, अंश = भाग या हिस्सा) होता है। इसलिये चर राशि का पहला हिस्सा, स्थिर राशि का बीच का हिस्सा, द्विस्वभाव का आखिरी हिस्सा वर्गोत्तम हुआ। एक हिस्से में ३ अंश २० कला होते हैं। ३० अंश कुल एक राशि में होते हैं। इसको यदि ९ से विभक्त किया जावे (भाग दिया जावे) तो ३ अंश २० कला होते हैं। इसी कारण एक नवांश ३ अंश २० कला का होता है। मूल में 'तद्वत्' शब्द आया है—जिसका अर्थ है—इसी प्रकार। किस प्रकार ? अर्थात् शत्रु राशि या नीच राशि में भी वर्गोत्तम हो तो अच्छा फल करेगा। उच्च राशि में वर्गोत्तम सबसे उत्तम फल करेगा। उसके बाद स्वराशि में वर्गोत्तम। इसके बाद अधिमित्र राशि, मित्र राशि, सम राशि, शत्रु, अधिशत्रु, नीच राशि में वर्गोत्तम में क्रमशः शुभ फल कम होता जावेगा।

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और शुद्ध देवनागरी लिप्यन्तरण (लाइन-दर-लाइन) प्रस्तुत है:

दसवाँ अध्याय कलत्र भाव शुभाधिपयुतेक्षिते सुतकलत्रभे लग्नतो विधोरपि तयोः शुभं त्वितरथा न सिद्धिस्तयोः। सिताद्व्ययसुखाष्टगैः खरखगैरसन्मध्यगे सितेऽप्यथ शुभेतरेक्षितयुते च जायावधः ॥१॥ दारेशे सुतगे प्रणष्टवनितोऽपुत्रोऽथवा धीश्वरो द्यूने वा निधनेश्वरोऽपि कुरुते पत्नीविनाशं ध्रुवम्। क्षीणेन्दौ सुतगे व्ययास्ततनुगैः पापैर्दारात्मजः स्त्रीसङ्गाद्धननाशनं मदगयाः स्वर्भानुभान्वोर्वदेत् ॥२॥ शुक्रे वृश्चिकगे मदे मृतवधूः कामे वृषस्थे बुधे स्त्रीनाशस्त्वथ नीचगे सुरगुरौ द्यूनाधिरूढे तथा। जामित्रे झषगे शनौ सति तथा भौमेऽथवा स्त्रीमृति-

२१८ फलदीपिका द्वन्द्वर्क्षांशे मदपतिसितौ तस्य जायाद्वयं स्यात् ताभ्यां युक्तैर्गगननिलयैर्दारसंख्यां वदन्तु ॥५॥ स्त्रीसंख्यां मदगैर्ग्रहैमृतिमसत्खेटैश्च सद्भिः स्थितिं द्यूनेशे सबले शुभे सति वधूः साध्वी सुपुत्रान्विता । पापोऽपि स्वगृहं गतः शुभकरः पत्न्याश्च कामस्थिता हित्वा षड्व्ययरन्ध्रपान्मदनगाः सौम्यास्तु सौख्यावहाः ॥६॥ भार्यानाशस्त्वशुभसहितौ वीक्षितौ वार्थकामौ तत्र प्राहुस्त्वशुभफलदां क्रूरदृष्टिं विशेषात् । एवं पत्न्या अपि सति मदे चाष्टमे वास्ति दोषः

  • सौम्यैर्दृष्टे सति शुभयुते दंपती भाग्यवन्तौ ॥७॥ चन्द्रे समन्दे मदगे पुनर्भूः पतिर्भवेद्वाप्यसुतो विदारः । नीचारिभस्थैरशुभैर्मदे स्त्री- पुंसोर्मृतिः स्यान्निधने धने वा ॥८॥ लग्नात्कलत्रभवने समराशिसंज्ञे भावाधिपेऽपि च तथैव गतेऽसुरेज्ये । सूर्याभितप्तरहते सुतदारनाथे वीर्यान्विते तु जननं ससुतं कलत्रम् ॥६॥ कुटुम्बदारव्ययराशिनाथा जीवेक्षिताः कोणचतुष्टयस्थाः । दारेश्वराद्वित्तकलत्रलाभे सौम्याः कलत्रं ससुतं सुखाढ्यम् ॥१०॥

दसवां अध्याय : कलत्र भाव २१९ लग्नास्तनाथस्थितभांशकोणे नीचोच्चभे स्त्रीजननं च पत्युः । चन्द्राष्टवर्गेधिकबिन्दुराशौ कलत्रजन्मेति तथा धवस्य ॥११॥ कामस्थकामाधिपभार्गवानां मृक्षं दिशं शंसति तस्य पत्न्याः । शुक्रोऽस्तपो वा तनुनाथभांश- त्रिकोणमायाति तदा विवाहः ॥१२॥ कलत्रसंस्थस्य कलत्रदृष्टे र्दशागमेवाथ कलत्रपस्य । यदा विलग्नाधिपतिः प्रयाति कलत्रभं तत्र कलत्रलाभः ॥१३॥ कलत्रनाथस्थितभांशकेशयोः सितक्षपानायकयोर्बलीयसः । दशागमे द्यूनपयुक्तभांशक- त्रिकोणगे देवगुरौ करग्रहः ॥१४॥ कलत्रनाथे रिपुनीचसंस्थे मूढेऽथवा पापनिरोक्षिते वा कलत्रभे पापयुतेऽथ दृष्टे कलत्रहानिं प्रवदन्ति सन्तः ॥१५॥ यदि लग्न से पांचवां और सातवां स्थान शुभ ग्रह या अपने स्वामी से युत या दृष्ट हो और चन्द्रमा से पंचम तथा सप्तम स्थान अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युत या वीक्षित (देखा जाता) हो तो पांचवें तथा

२२० फलदीपिका। सातवें भाव सम्बन्धी सिद्धि (उत्तम फल प्राप्ति) होती है। यदि ऐसा न हो तो विपरीत फल समझना। (क) शुक्र यदि पाप ग्रहों के बीच में हो या (ख) शुक्र से चतुर्थ, अष्टम, द्वादश पापग्रह हों या (ग) शुक्र यदि पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो—इन तीनों योगों का फल यह है कि जिस पुरुष की कुँडली में यह योग हो उसकी स्त्री की मृत्यु हो जाती है। जितने ही दुर्योग अधिक होंगे उतना ही दुष्प्रभाव अधिक होगा। ॥ १ ॥ सप्तम भाव का स्वामी पंचम में हो तो उसकी स्त्री की मृत्यु हो जावे या अपुत्र हो। यदि पंचमेश या अष्टमेश सप्तम में हो तो भी पत्नी का विनाश हो जाता है। यदि क्षीण चन्द्रमा पांचवें घर में हो और पाप ग्रह लग्न, सप्तम और बारहवें घरों में हो तो जातक पत्नी हीन, पुत्रहीन होता है। यदि सूर्य और राहु सप्तम में हों तो स्त्री संग से धन नाश होता है। ॥ २ ॥ (क) यदि वृश्चिक राशि का शुक्र सप्तम में हो या (ख) वृष राशि का बुध सप्तम में हो या (ग) मकर राशि का बृहस्पति सप्तम में हो या (घ) मीन राशि का शनि सप्तम में हो या (ङ) मीन राशि का मंगल सप्तम में हो; इन योगों में से कोई भी योग हो तो पत्नी की मृत्यु हो जाती है। यदि कर्क राशि सप्तम में हो और उसमें मंगल तथा शनि हों तो उस मनुष्य की सुन्दर और सच्चरित्र पत्नी होगी। ॥ ३ ॥ यदि सातवें घर का स्वामी या सातवाँ घर, पाप ग्रह से युत या दृष्ट हो या पाप ग्रहों के बीच में हो या सप्तमेश नीच राशि या शत्रु राशि में हो या अस्त हो (सूर्य के समीप होने के कारण) तो स्त्री नष्ट हो जाती है। ये सब स्त्रीनाशक योग है। यदि शुक्र पापग्रह के साथ पांचवे या सातवें या नवम भाव में हो तो उसकी स्त्री रोगिणी (जिसके शरीर का कोई अवयव ठीक काम न करता हो) होती है या स्त्री सुख के अभाव के कारण विकल रहता है। शुक्र, मंगल या