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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

छठा अध्याय योगाध्याय रुचकभद्रकहंसकमालवाः सशशका इति पञ्च च कीर्तिताः । स्वभवनोच्चगतेषु चतुष्टये क्षितिसुतादिषु तान् क्रमशः वदेत् ॥ १ ॥ इस अध्याय में अनेक योग बताये गये हैं। सर्वप्रथम पञ्च महापुरुष योग दिये हैं। यदि मंगल मेष, वृश्चिक या मकर राशि का होकर जन्म- कुण्डली में केन्द्र में बैठे तो 'रुचक' योग होता है। यदि मिथुन या कन्या राशि में स्थित बुध केन्द्र में हो तो 'भद्र' योग होता है। यदि कर्क, धनु या मीन राशि में स्थित होकर बृहस्पति केन्द्र में हो तो 'हंस' योग होता है। यदि वृष, तुला या मीन राशि में स्थित शुक्र हो और केन्द्र में हो तो मालव्य योग होता है। यदि तुला, मकर या कुम्भ राशि में शनि बैठा हो और जन्म लग्न चतुर्थ, सप्तम, या दशम इन चारों स्थानों में से किसी एक में हो, तो 'शश' योग होता है। अब ऊपर पांचों में से किसी एक में उत्पन्न व्यक्ति का स्वरूप या भाग्योदय कैसा होगा यह बताते हैं । ॥ १ ॥ दीर्घास्यो बहुसाहसाप्तविभवः शूरोऽरिहन्ता बली गर्विष्ठो रुचके प्रतीतगुणवान् सेनापतिर्जित्त्वरः । आयुष्मान् सकुशाग्रबुद्धिरमलो विद्वज्जनश्लाघितो भूपो भद्रकयोगजोऽतिविभवश्चास्थानकोलाहलः ॥ २ ॥

२१० फलदीपिका हंसे सद्गूरभिष्टुतः क्षितिपतिः शङ्खाब्जमत्स्याङ्कुशै- श्चिह्नैः पादकराङ्कितः शुभवपुर्मृष्टान्नभुग्धार्मिकः । पुष्टाङ्गो धृतिमान्धनी सुतवधूभाग्यान्वितो वर्धनो मालव्ये सुखभुक्सुवाहनयशा विद्वान्प्रसन्नेन्द्रियः ॥ ३ ॥ शस्तः सर्वजनैः सुभृत्यबलवान् ग्रामाधिपो वा नृपो दुर्वृत्तः शशयोगजोऽन्यवनितावित्तान्वितः सौख्यवान् । लग्नेन्द्वोरपि योगपञ्चकमिदं साम्राज्यसिद्धिप्रदं तेष्वेकादिषु भाग्यवान् नृपसमो राजा नृपेन्द्रोऽधिकः ॥४॥ जो व्यक्ति रुचक योग में पैदा होता है उसका दीर्घ चेहरा हो, बहुत साहस से धन प्राप्त करे । शूर और बली हो, शत्रुओं को मारने* वाला और अभिमानी हो । ऐसा व्यक्ति अभिमानी प्रकृति का होता है और सेनापति हो (सेनापति से तात्पर्य समझना चाहिये उच्च पदाधिकारी) अपने गुणों

छठा अध्याय : योग १११ (सुन्दर, सौम्य) हो। ऐसा व्यक्ति उत्तम भोजन करने वाला हो और सज्जन लोग उसकी प्रशंसा करें। जो व्यक्ति मालव्य योग में पैदा होता है वह धैर्यवान् और पुष्ट अंग वाला होता है। उत्तम भोजन करने वाला, विद्वान्, प्रसन्नमुख, शान्तचित्त, पुत्र और स्त्रियों के सुख से युक्त, सदैव वृद्धि को प्राप्त, यशस्वी और अच्छी सवारियों का (मोटर आदि) का भोक्ता हो। जो व्यक्ति शश योग में उत्पन्न होते हैं वे अत्यन्त प्रभावशाली होते हैं। किसी ग्राम के मालिक हों या नृप (बहुत से मनुष्यों का स्वामी) अर्थात् उच्च पदाधिकारी हो। ऐसा व्यक्ति स्वयं बलवान् होता है और उसकी मातहती में अच्छे-अच्छे लोग काम करते हैं। ऐसे लोगों की अन्य लोग तारीफ़ जरूर करेंगे। किन्तु वास्तव में शश योग में उत्पन्न लोगों का आचरण उत्तम नहीं होता। ऐसे-व्यक्ति अन्य पुरुषों की स्त्रियों में आसक्त रहते हैं। ऐसे लोग धनी और सुखी होते हैं। ऊपर पांच योग बताये गये हैं। मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि- इनमें से कोई ग्रह स्वराशि या उच्च राशि का होकर केन्द्र में हो तो क्रमशः यह पांचों योग बनते हैं। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि मन्त्रेश्वर महाराज का कथन है कि यदि चन्द्र लग्न से केन्द्र में भी उपर्युक्त पांचों ग्रहों में कोई स्वराशि या उच्च राशि का होकर चन्द्र केन्द्र में हो तो साम्राज्य और सिद्धि प्रदान करने वाला होता है। कहने का तात्पर्य है कि जैसे जन्म लग्न से केन्द्र का विचार करना वैसे ही चन्द्र लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि कोई एक ग्रह उपर्युक्त प्रकार से योग कारक हो तो मनुष्य भाग्यवान् होता है। यदि दो ग्रह योग बनावें तो राजा के समान हो। तीन ग्रह योग बनावें तो राजा हो; चार ग्रह योग बनावें तो महाराजा हो और जिसकी कुण्डली में रुचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश ये पाँचों योग हों वह इससे भी उच्च पदवी प्राप्त करता है।

११२ फलदीपिका इस कुण्डली में रुचक, मालव तथा शश योग हैं। जन्मलग्न से केन्द्र में स्वराशि का मंगल है इसलिये रुचक योग हुआ। जन्मलग्न से चतुर्थ (केन्द्र में) स्वराशि का शुक्र हुआ अतः मालव योग हुआ। और जन्म लग्न से सप्तम (केन्द्र) में स्वराशि का शनि होने से शश योग हुआ। यदि कन्या में बुध हो तो मिथुन में चन्द्रमा है, उससे केन्द्र में उच्च बुध होने के कारण भद्र योग हो जावेगा। यदि मीन में बृहस्पति हो तो चन्द्रमा से दशम में स्वराशि का बृहस्पति हो जाने से चन्द्र लग्न से हंस योग भी बन जावेगा। प्रायः ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथों में यह पंच महापुरुष योग बताये गये हैं। परन्तु मानसागरी नामक पुस्तक में इस महापुरुष योग का भंग कैसे हो जाता है यह भी लिखा है। मानसागरी कर्त्ता लिखते हैं कि यद्यपि मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र या शनि के केन्द्र में, अपनी उच्च या राशि में स्थित होने से महापुरुष योग बताया गया है किन्तु यदि जो ग्रह महापुरुष योग बना रहा है वह सूर्य या चन्द्रमा के साथ हो तो-ऐसे महापुरुष योग के प्रभाव से जातक 'राजा' (या राजतुल्य) नहीं होता है परन्तु उसकी दशा में (या अन्तर्दशा में) केवल सत्फल (शुभ फल) होता है। विधोस्तु सुनफानफाधुरुधुराः स्वरैः फोभय- स्थितैर्विरविभिर्ग्रहैरितरथा तु केमद्रुमः। हिमत्विषि चतुष्टये ग्रहयुतेऽथ केमद्रुमो न हीति कथितोऽथवा हिमकराद्ग्रहैः केन्द्रगैः ॥५॥ स्वयमधिगतवित्तः पार्थिवस्तत्समो वा भवति हि सुनफायां धीधनख्यातिमांश्च।

छठा अध्याय : योग ११३ प्रभुरगदशरीरः शीलवान् ख्यातकीर्ति- र्विषयसुखसुवेशो निर्वृतश्चानफायाम् ॥ ६ ॥ उत्पन्नभोगसुखभाग्धनवाहनाढ्य- स्त्यागान्वितो धुरुधुराप्रभवः सभृत्यः । केमद्रुमे मलिनदुःखितनोचनिःस्वाः प्रेष्याः खलाश्च नृपतेरपि वंशजाताः ॥ ७ ॥ अब चार योग बताते हैं । इन चारों योगों का विचार चन्द्र राशि से किया जाता है । इन चारों योगों में जहां ग्रह का उल्लेख किया जावे वहां मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि केवल इन पांच ग्रहों को समझना चाहिये । सूर्य की गणना इनमें नहीं करनी चाहिये :—यदि चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह हो और द्वितीय में कोई ग्रह नहीं हो तो अनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वादश में कोई ग्रह न हो और केवल द्वितीय में हो तो सुनफा योग होता है । यदि चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों में ग्रह हों तो दुरुधरा योग होता है। यदि चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में—दोनों स्थानों से किसी में भी कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग होता है । कुछ लोगों का मत है कि निम्नलिखित योगों में से कोई हो तो केमद्रुम योग नहीं होता । (१) यदि चन्द्रमा के साथ कोई ग्रह हो । (२) यदि लग्न से केन्द्र में कोई ग्रह हो । (३) यदि चन्द्रमा से केन्द्र में कोई ग्रह हो । मन्त्रेश्वर महाराज ने यह लिखकर कि कुछ अन्य लोगों का मत

  • जन्म कुंडली में जिस राशि में चन्द्रमा हो उसे चन्द्र राशि या चन्द्र लग्न कहते हैं ।

११४ फलदीपिका ऐसा है, यही पुष्ट किया कि उनके विचार से तो चन्द्रमा से द्वितीय और द्वादश में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम* योग होता है। केमद्रुम योग का फल अच्छा नहीं। केमद्रुम योग होने से मनुष्य मलिन, दुःखित, निर्धन, दूसरे की मातहती में काम करने वाला, नगण्य होता है। केमद्रुम योग की इतनी निन्दा की गई है कि यदि राजवंश में पैदा हो तो भी उपर्युक्त बातें उसमें लागू हों। किन्तु पाठकों का विशेष ध्यान इस ओर दिलाया जाता है कि केवल किसी एक योग से नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिये। अब ऊपर जो अनफा, सुनफा और दुरुधरा यह जो तीन योग पृथक्-पृथक् बताये गये हैं, उनका फल बताते हैं। जो सुनफा योग में पैदा होता है वह पार्थिव (राजा) हो या उसके समान हो। सुनफा योग वाला बुद्धिमान्, धनवान् होता है और उसको ख्याति प्राप्त होती है। जो अनफा योग में पैदा होता है वह देखने में उत्तम होगा, शीलवान् हो, उसको सांसारिक भोग के साधन उपलब्ध हों, सन्तोषी और प्रसन्न हो, उत्तम वस्त्र धारण करें और उसका शरीर स्वस्थ रहे। अनफा योग वाला शीलवान् होता है और समाज में प्रतिष्ठित होता है। जो व्यक्ति दुरुधरा योग में उत्पन्न हो वह त्यागशील हो, सुखी हो; धनी हो, उसको सवारियों की कमी न रहे और सांसारिक सुखों के अनेक साधन जैसे-जैसे उसे उपलब्ध हों वैसे वैसे उनका भोग करता रहे। हित्वेन्दुं शुभसिवैवास्युभयचर्याख्याः स्वरिःफोभय- स्थानस्थैः सवितुः शुभैः स्युरशुभैस्ते पापसंज्ञाः स्मृताः । सत्पार्श्वे शुभकर्तरीत्युदयभे पापैस्तु पापाह्वयो लग्नाद्वित्तगतैः शुभैस्तु सुशुभो योगो न पापेक्षितैः ॥ ८ ॥

  • इस सम्बन्ध में देखिये बृहज्जातक के अध्याय तेरह श्लोक २ की टीका।

छठा अध्याय : योग ११५ ऊपर के श्लोकों में सूर्य के अतिरिक्त कोई ग्रह चन्द्रमा से द्वितीय, द्वादश या दोनों घरों में हो या न हो ऐसे योग बताये हैं। अब सूर्य से द्वितीय, द्वादश या इन दोनों घरों में कोई ग्रह (चन्द्रमा के अतिरिक्त) हो तो क्या योग होते हैं यह बताते हैं। (१) सूर्य से द्वितीय, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, इनमें से एक या अधिक ग्रह हों तो शुभवेसि योग होता हैं। (२) यदि सूर्य से द्वादश मंगल, बुध, बृहस्पति शुक्र, शनि कोई ग्रह हो तो शुभवासि योग होता है। (३) यदि इन पांचों ग्रहों में से एक या अधिक सूर्य से द्वादश में हो और एक या अधिक सूर्य से द्वितीय में हो तो उभयचरी योग होता है। उभयचरी का अर्थ है दोनों ओर। किसके ? सूर्य जिस राशि में में है उस राशि के दोनों ओर चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रह होने से यह शुभ योग बनता है। ऊपर जो तीन योग दिये गये हैं वे प्रायः सब ज्योतिष की पुस्तकों में उपलब्ध होते हैं परन्तु इस सम्बन्ध में मन्त्रेश्वर महाराज कुछ विशेष निर्देश करते हैं। यदि शुभ ग्रह सूर्य के एक या दोनों ओर योग बनावें तो उनके मत से शुभवेसि, शुभवासि तथा शुभ उभयचरी योग हुआ। किन्तु यदि शुभ ग्रह के बजाय पाप ग्रह योग बनावें तो क्रमशः पापवेसि पापवासि तथा पाप उभयचरी योग हुए। जैसे सूर्य के एक ओर या दोनों ओर ग्रह होने से योग बताये हैं वैसे ही लग्न से भी विचार करना चाहिये। यदि लग्न के दोनों ओर (द्वितीय और द्वादश में) पाप ग्रह हों तो पाप कर्त्री योग हुआ। किन्तु यदि लग्न के दोनों ओर अर्थात् द्वितीय स्थान तथा द्वादश स्थान में शुभ ग्रह बैठे हों तो शुभ कर्त्री हुआ। यदि द्वितीय में (लग्न से दूसरे) शुभ ग्रह बैठा हो और इस शुभ ग्रह को कोई पाप ग्रह नहीं देखता हो तो सुशुभ नामक योग होता है। स्मरण रहे कि लग्न से द्वितीय में अच्छा योग बताया गया है। लग्न

११६ फलदीपिका से द्वितीय में कोई शुभ ग्रह नहीं हो और लग्न से द्वादश में हो तो कोई योग नहीं होता। इसका कारण यह है कि द्वादश अनिष्ट स्थान माना गया है। ॥ ८ ॥ जातः स्यात् सुभगः सुखी गुणनिधिर्धीरो नृपो धार्मिको विख्यातः सकलप्रियोऽतिसुभगो दाता महीशप्रियः । चार्वङ्गः प्रियवाक्प्रपञ्चरसिको वाग्मी यशस्वी धनी विद्यादत्र सुवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥ ९ ॥ जो व्यक्ति शुभवेसि योग में उत्पन्न हो वह देखने में सुन्दर, सुखी, गुणनिधि, धीर, धार्मिक और अनेक व्यक्तियों पर हुकूमत करने वाला होता है। जो व्यक्ति सुवासि योग में उत्पन्न हो वह अति सुन्दर, दाता, राजा का प्रिय (अच्छे ओहदे वाला) और विख्यात हो; उसको सब लोग चाहें। जो व्यक्ति शुभ उभयचरी योग में उत्पन्न हो वह वाग्मी (अच्छा बोलने वाला-वक्ता) प्रिय वचन बोलने वाला यशस्वी और धनी होता है। उसके सब अंग मनोहर होते हैं और सबको प्रसन्न करने वाला होता है ॥ ९ ॥ अन्यायाज्जननिन्दको हतरुचिर्हीनप्रियो दुर्जनो मायावी परनिन्दकः खलयुतो दुर्वृत्तशास्त्राधिकः । लोके स्यादपकीर्तिदुःखितमना विद्यार्थभाग्यैश्च्युतो जातश्चाशुभवेसिवास्युभयचर्याख्येषु पादक्रमात् ॥१०॥ जो व्यक्ति पापवेसि में पैदा हो वह अन्याय से दूसरों की निन्दा करे। कान्तिहीन हो, छोटे आदमी की सोहबत करे और स्वयं दुर्जन हो पापवेसि या अशुभवेसि एक ही बात है।

छठा अध्याय : योग ११७ जो* अशुभवासि में उत्पन्न होता है वह भी दूसरों की निन्दा करने वाला, मायावी, दुष्टों का मित्र, स्वयं दुराचरण करने वाला लेकिन शास्त्रों की दुहाई देने वाला हो । जो अशुभ उभयचरी योग में उत्पन्न होते हैं वे विद्याहीन, भाग्यहीन, धनहीन रहते हैं। उनका चित्त सदैव दुःखित रहता है और उन्हें अपकीर्ति (निन्दा) प्राप्त होती है। जैवातृको विभयरोगरिपुः सुखी स्या- दाढ्यः श्रिया च शुभकर्तरियोगजातः । निःस्वोऽशुचिर्विसुखदारसुतोऽङ्गहीनः स्यात्पापकर्तरिभवोऽचिरमायुरेति ॥ ११ ॥ जो व्यक्ति शुभ कर्त्री योग में उत्पन्न होता है वह दीर्घायु, सुखी लक्ष्मीवान् और वैभव से युक्त होता है। उसे शत्रुओं तथा रोगों से भय नहीं होता अर्थात् न तो उसके शत्रु होते हैं न रोग होते हैं। किन्तु जो पाप कर्त्री में पैदा होते हैं वह दरिद्र, अपवित्र, दुःखी अंगहीन, अल्पायु, भार्यारहित, पुत्ररहित होते हैं; संक्षेप में यह है कि शुभ कर्त्री का शुभ फल है और पाप कर्त्री का पापफल है। यह आवश्यक नहीं कि सब लक्षण अक्षरशः मिलें, भावार्थ लेना चाहिये ॥ १ ॥ आचारवान् धर्ममतिः प्रसन्नः सौभाग्यवान् पार्थिवमाननीयः । मृदुस्वभावः स्मितभाषणश्च धनी भवेच्चामलयोगजातः ॥ १२ ॥

  • अशुभवासि और पापवासि एक ही बात है।

११८ फलदीपिका जो अमला योग में पैदा होता है, वह आचारवान् धर्म में मति रखने वाला, प्रसन्न, सौभाग्यवान्, राजा द्वारा सम्मानित, मृदु स्वभाव का, मुस्कराकर बोलने वाला और धनी होता है। ॥ १२ ॥ सुशुभे शुभकर्तर्यां वेस्यादौ सुनभादिवत् । शुभैः क्रमात्फलं ज्ञेयं विपरीतमसद्ग्रहैः ॥ १३ ॥ सुशुभ, शुभकर्त्री और शुभवेसि का फल, सुनफा आदि योगों के ही समान समझना चाहिये अर्थात् सुवेसि और सुशुभ का वही फल समझे जो सुनफा का और शुभवासि का वही फल समझना चाहिये जो अनफा का। शुभ उभयचरी का फल दुरुधरा के समान समझना चाहिये। सूर्य के (१) आगे की राशि में (२) पीछे की राशि में (३) तथा दोनो ओर की राशियों में शुभ ग्रह होने से ही शुभ फल बताया है। यदि पाप ग्रह यह योग करें तो अशुभ फल समझना चाहिये। अर्थात् शुभवेसि आदि का जो फल बताया है उससे बिल्कुल उलटा । ॥ १३ ॥ ओजेष्वर्केन्दुलग्नान्यजनि दिवि पुमांश्चेन्महाभाग्ययोगः स्त्रीणान्तद्व्यत्ययेस्याच्छशिनि सुरगुरोः केन्द्रगे केसरीति । जीवान्त्याष्टारिसंस्थे शशिनि तु शकटः केन्द्रगे नास्ति लग्ना- च्चन्द्रे केन्द्रादिगेऽर्कादधमसमवरिष्ठाख्ययोगाः प्रसिद्धाः ॥१४॥

  • ऊपर सुनफा, अनफा, दुरुधरा, केमद्रुम, सुवेसि, सुवासि, शुभ उभयचरी, पापवेसि, पापवासि, शुभ कर्त्री, पापकर्त्री और सुशुभ केवल इन योगों के लक्षण बताये गये हैं, अमला योग का लक्षण अभी तक मूल में नहीं आया है ।

छठा अध्याय : योग १११ (क) यदि पुरुष की कुंडली हो और निम्नलिखित चारों योग उस कुण्डली में हों तो महाभाग्य योग होता है । (१) दिन में जन्म हो अर्थात् सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त के पहले । (२) लग्न ऊनी*—विषम राशि का हो (३) सूर्य विषम राशि का हो (४) चन्द्रमा भी विषम राशि में हो । स्मरण रहे पुरुष की कुण्डली में चारों योग होंगे तभी महाभाग्य होगा । यदि एक भी बात की कमी हुई तो योग नहीं होगा । अब यह बताते हैं कि स्त्री की कुण्डली में महाभाग्य योग के लिये क्या-क्या बातें जरूरी हैं:— (१) रात्रि में जन्म हो अर्थात् सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय के पहले । (२) सम लग्न हो (३) सम राशि में चन्द्रमा हो (४) सम राशि में सूर्य हो । इन चारों बातों का रहना आवश्यक है तभी कन्या की कुण्डली महाभाग्य योगवाली कहलावेगी । (ख) अब दूसरे योग बताते हैं चाहे स्त्री की कुण्डली हो चाहे पुरुष की कुण्डली हो निम्नलिखित योग दोनो में एक ही प्रकार से लागू होंगे । यदि चन्द्रमा बृहस्पति से केन्द्र में हो तो इसको केसरी योग कहते हैं । बहुत से ज्योतिष ग्रन्थों में इस योग का नाम गज केसरी योग भी है । (ग) यदि चन्द्रमा से छठे, आठवें या बारहवें स्थान में बृहस्पति हो तो शकट योग होता है किन्तु यदि चन्द्रमा लग्न से केन्द्र में हो तो शकट योग नहीं होता । (घ) यदि सूर्य से केन्द्र में चन्द्रमा हो तो अधम योग होता है ।

  • १, ३, ५, ७, ९, ११, यह ऊनी राशियां हैं, २, ४, ६, ८, १०, १२ यह पूरी (सम) राशियां हैं । १ से मेष, २ से वृष, ३ से मिथुन, ४ से कर्क इसी प्रकार समझना चाहिये ।

१२० फलदीपिका (ङ) यदि सूर्य से पणफर स्थान में चन्द्रमा हो तो सम योग होता है। (च) यदि सूर्य से तृतीय, षष्ठ, नवम या द्वादश स्थान में चन्द्रमा हो तो वरिष्ठ योग होता है। अब आगे के श्लोकों में उपर्युक्त छः योगों का पृथक्-पृथक् फल बताते हैं। महाभाग्ये जातः सकलनयनानन्दजनको वदान्यो विख्यातः क्षितिपतिरशीत्यायुरमलः। वधूनां योगेऽस्मिन् सति धनसुमाङ्गल्यसहिता चिरं पुत्रैः पौत्रैः शुभमुपगता सा सुचरिता ॥ १५ ॥ जो व्यक्ति महाभाग्य योग में उत्पन्न होता है वह सबके नेत्रों को आनन्द देने वाला, उदार, विख्यात, निर्मल चरित्र का, भूमि का स्वामी, राजा के समान ऐश्वर्य शाली होता है। जिन स्त्रियों की कुण्डलियों में यह योग हो वह उत्तम चरित्र की, सौभाग्य शालिनी, धनवती होती हैं। पति, पुत्र, पौत्रों का सुख उन्हें चिरकाल तक प्राप्त होता है और सदैव सौभाग्यवती रहती हैं। ॥ १५ ॥ केसरीव रिपुवर्गनिहन्ता प्रौढवाक् सदसि राजसवृत्तिः । दीर्घजीव्यतियशाः पटुबुद्धिस्तेजसा जयति केसरियोगे ॥ १६ ॥ अब केसरी योग का फल बताते हैं। जो व्यक्ति केसरी योग में उत्पन्न होता है वह केसरी (शेर) की तरह अपने शत्रुवर्गों को नष्ट कर देता है। ऐसा व्यक्ति सभाओं में प्रौढ़ (जिसका वाणी पर आधिपत्य हो, किसी विषय पर गम्भीरतापूर्वक और अधिकार से बोलना

छठा अध्याय : योग १२१ प्रौढ़ भाषण कहलाता है) भाषण करने वाला, राजसवृत्ति* का होता है। ऐसा व्यक्ति दीर्घायु हो। बहुत उसकी तीव्र बुद्धि हो, महान् यश प्राप्त करे और अपने स्वाभाविक तेज से ही ओरों को जीत ले । ।। १६ ।। क्वचित्क्वचिद्भाग्यपरिच्युतः सन् पुनः पुनः सर्वमुपैति भाग्यम्। लोकेऽप्रसिद्धोऽपरिहार्यमन्तः शल्यं प्रपन्नः शकटेऽतिःदुखी ॥१७॥ अब शकट योग का फल बताते हैं। शकट योग में उत्पन्न व्यक्ति अत्यन्त दुःखी होता है, इसके हृदय मे ऐसा दुःख का काँटा लगा हुआ होता है कि उससे छुटकारा पाना कठिन है। ऐसा व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता और साधारण जीवन व्यतीत करेगा। कभी-कभी ऐसे व्यक्ति का सितारा बहुत तेज हो जाता है और कभी सितारा बिलकुल गिर जाता है। इसी कारण कहा है कि कभी-कभी भाग्य से हीन हो जाय और फिर भाग्य को प्राप्त हो। साथ ही कुण्डली में चन्द्रमा से छठे बृहस्पति होने के कारण शकट योग होना चाहिये था परन्तु केन्द्र में चन्द्र होने से नहीं हुआ। माननीय स्वर्गवासी पंडित जवाहरलाल जी की जन्म कुण्डली। प्रयाग में १४ नवम्बर सन् १८८९ को सूर्योदय से ४१ घड़ी ३८ पल पर जन्म हुआ।

जन्म कुण्डली विवरण:

  • लग्न (प्रथम भाव - ४ कर्क): चं. (चन्द्र)

  • द्वितीय भाव (५ सिंह): श. (शनि)

  • तृतीय भाव (६ कन्या): मं. (मंगल)

  • चतुर्थ भाव (७ तुला): शु. बु. (शुक्र, बुध)

  • पंचम भाव (८ वृश्चिक): सू. (सूर्य)

  • षष्ठ भाव (९ धनु): बृ. के. ह. (बृहस्पति, केतु, हर्षल)

  • सप्तम भाव (१० मकर): रिक्त

  • अष्टम भाव (११ कुम्भ): रिक्त

  • नवम भाव (१२ मीन): रिक्त

  • दशम भाव (१ मेष): रिक्त

  • एकादश भाव (२ वृष): रिक्त

  • द्वादश भाव (३ मिथुन): रा. (राहु)

  • रजोगुण प्रधान कार्य, शान, शौकत आदि।

१२२ फलदीपिका एक अन्य स्थान पर यह भी लिखा है कि चन्द्रमा से ३, ६, १०, ११, में शुभ ग्रह हो तो वसुमान् योग होता है। लग्न से ३, ६, १०, ११ में शुभ ग्रह होने से अतिवसुमान योग होता* है, इसी प्रकार लिखा है कि यदि चन्द्रमा से ६, ७, ८ में सौम्य ग्रह हों तो बहुत उत्तम योग होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी-किसी योग में गुण और अवगुण दोनों होते हैं। साथ की कुण्डली में चन्द्रमा और बृहस्पति दोनों ग्रह बलवान् हैं और अपने-अपने घर के हैं। इस कारण शुभ फल करेंगे ही। ॥ १७ ॥ अब अधम, सय और वरिष्ठ योग का फल बताते हैं:— (क) यदि अधम योग में उत्पन्न हो तो द्रव्य, सवारी, यश, सुख, सम्पत्ति, ज्ञान, बुद्धि, विनय, निपुणता, विद्या, उदारता और सुख योग, इनका बहुत कम फल प्राप्त हो। स्व० जयनारायण जी व्यास (जो कभी जोधपुर के चीफ मिनिस्टर रहे और पदच्युत हो गये, कभी राजस्थान के चीफ मिनिस्टर रहे और पदच्युत हो गये) की जन्मकुण्डली में शकट योग है। इस कारण जीवन में अनेक चढ़ाव-उतार देखने पड़े। श्री जयनारायण जी व्यास का जन्म विक्रम संवत् १९५५ में माघ कृष्ण नवमी शनिवार को सूर्योदय के १२ घड़ी ४८ पल पर हुआ।

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|       २ चं.   |      १२       |      ११       |               |
|               |               |      सू.      |               |
+---------------+---------------+---------------+   १० बु.      |
|               |                               |               |
|   मं. के.     |               १               +---------------+
|     ३         |                               |               |
+---------------+                               |    ९ शु. रा.  |
|               +---------------+---------------+               |
|       ४       |               |                               |
+---------------+      ७ बृ.    |             श. ८              |
|   ५   |   ६   |               |                               |
+-------+-------+---------------+---------------+---------------+

(कुण्डली विवरण: लग्न १; द्वितीय भाव २ चं.; तृतीय भाव ३ मं. के.; चतुर्थ भाव ४; पञ्चम भाव ५; षष्ठ भाव ६; सप्तम भाव ७ बृ.; अष्टम भाव श. ८; नवम भाव ९ शु. रा.; दशम भाव १० बु.; एकादश भाव ११ सू.; द्वादश भाव १२)

  • बृहज्जातक अध्याय १३, श्लोक ९। तथा बृहज्जातक अध्याय १३, श्लोक २।

छठा अध्याय : योग १२३ कष्टमध्यमवराह्वययोगे द्रव्यवाहनयशः सुखसंपत् । ज्ञानधीविनयनैपुणविद्यात्यागभोगजफलान्यपि तद्वत् ॥ १८ ॥ (ख) यदि सम योग में जन्म हो तो ऊपर जो बातें बतायी गई हैं उनका मध्यम सुख प्राप्त हो। (ग) यदि वरिष्ठ योग में जन्म हो तो ऊपर बतायी गई सब बातों का श्रेष्ठ फल प्राप्त हो अर्थात् द्रव्य, सुख आदि प्रचुर मात्रा में मिलें। चन्द्राद्वा वसुमांस्तथोपचयगैर्लग्नात्समस्तैः शुभै- श्चन्द्राद्व्योम्यमलाह्वयः शुभखगैर्योगो विलग्नादपि । जन्मेशे सहिते विलग्नपतिना केन्द्रेऽधिमित्रर्क्षगे लग्नं पश्यति कश्चिदत्र बलवान्योगो भवेत्पुष्कलः ॥ १९ ॥ तिष्ठेयुः स्वगृहे सदा वसुमति द्रव्याण्यनल्पान्यपि क्ष्मेशः स्यादा मले धनी सुतयशः संपद्युतो नीतिमान् । श्रीमान् पुष्कलयोगजो नृपवरैः सम्मानितो विश्रुतः स्वाकल्पाम्बरभूषितः शुभवचाः सर्वोत्तमः स्यात्प्रभुः ॥२०॥ इस श्लोक में चार योग बताये गये हैं, वसुमान्, अमला और पुष्कल। इन्हीं की क्रमशः व्याख्या करते हैं— (१) यदि समस्त शुभग्रह लग्न से गिनने पर ३, ६, १०, ११ इन स्थानों में हों (यह लाज़मी नहीं कि एक तीसरे में, एक छठे, एक दसवें में एक ग्यारहवें में हो—सब ग्रह उपचय* स्थान में हों यह आवश्यक है) तो वसुमान् योग होता है।

  • लग्न से ३, ६, १०, ११—इन स्थानों को उपचय स्थान कहते हैं ।

१२४ फलदीपिका (२) यदि, चन्द्रमा जिस राशि में है, उस राशि से उपचय राशि में—(अर्थात् तीसरे, छठे, दसवें, ग्यारहवें इन राशियों में सब शुभग्रह हों—चाहें किसी राशि में एक या अधिक शुभग्रह हों—परन्तु ३, ६, १०, ११ इन्हीं चारों राशियों में सब शुभग्रह—बुध, बृहस्पति, शुक्र हों तो भी वसुमान् योग होता है। (३) यदि लग्न या चन्द्रमा से दशम में शुभ ग्रह हो तो अमला योग होता है। (४) यदि लग्न का स्वामी और चन्द्रमा जिस राशि में हैं उनके स्वामी एक साथ केन्द्र में हों और किसी अधिमित्र के घर में हों और कोई बलवान् ग्रह लग्न को देखे तो पुष्कल योग होता है। ऊपर जो चार योग बताये हैं उनका क्रमशः फल बताते हैं। (१) जो वसुमान् योग में पैदा होता है वह सदैव अपने घर में रहेगा और उसके पास बहुत द्रव्य होगा। पहले समय में परदेश में रहना कष्ट का लक्षण और अपने घर में रहना सुख का लक्षण समझा जाता था। (२) जो अमला योग में उत्पन्न हो वह भूमि का स्वामी, धनी, नीतिज्ञ, पुत्र और सम्पत्ति से युक्त, यशस्वी हो। (३) जो पुष्कल योग में उत्पन्न हो वह राजाओं द्वारा सम्मानित किया जावे, धनी और प्रसिद्ध हो, उत्तम वस्त्र और आभूषण धारण करे। शुभ वाणी बोले, बहुतों का मालिक हो और श्रेष्ठ पदवी को प्राप्त हो। सर्वे पञ्चसु षट्सु सप्तसु शुभा मालाश्च पङ्क्त्या स्थिता यद्येवं मृतिषड्व्ययादिषु गृहेष्वत्राशुभाख्याः स्मृताः। स्वक्षोच्चे यदि कोणकण्टकयुतौ भाग्येशशुक्रावुभौ लक्ष्म्याख्योऽथ तथाविधे हिमकरे गौरीति जीवेक्षिते ॥२१॥

छठा अध्याय : योग १२५ जनाधिकारी क्षितिपालशस्तो भोगी प्रदाता परकार्यकर्ता । बन्धुप्रियः सत्सुतदारयुक्तो धीरः सुमालाह्वययोगजातः ॥२२॥ कुमार्गयुक्तोऽशुभमालिकाख्ये दुःखी परेषां वधकृत् कृतघ्नः । स्यात्कातरो भूसुरभक्तिहीनो लोकाभिशप्तः कलहप्रियः स्यात् ॥२३॥ नित्यं मङ्गलशीलया वनितया क्रीडत्यरोगी धनी तेजस्वी स्वजनान् सुरक्षति महालक्ष्मीप्रसाहालयः । श्रेष्ठान्दोलिकया प्रयाति तुरगस्तम्बेरमध्यासितो लोकानन्दकरो महोपतिवरो दाता च लक्ष्मीभवः ॥२४॥ सुन्दरगात्रः इलाघितगोत्रः पार्थिवमित्रः सद्गुणपुत्रः । पङ्कजवक्त्रः संस्तुतनेत्रो राजति गौरीयोगसमुत्थः ॥ २५ ॥ इन श्लोकों में चार योग बताये हैं । शुभ माला, अशुभ माला, लक्ष्मी और गौरी । इन चारों योगों को क्रमशः बताते हैं । (१) यदि सब ग्रह पंक्ति से पांचवें, छठे, सातवें घरों में हों तो शुभ माला योग होता है । (२) यदि समस्त ग्रह छठे, आठवें, बारहवें इन स्थानों में क्रम से हों तो अशुभ माला योग होता है । (३) यदि नवें स्थान का स्वामी और शुक्र दोनों अपने घर में या उच्चराशि में स्थित होकर लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हों तो लक्ष्मी योग होता है । (४) यदि चन्द्रमा स्वराशि या उच्चराशि का होकर लग्न से केन्द्र

१२६ फलदीपिका या त्रिकोण में हो और बृहस्पति उसे देखता हो तो गौरी योग होता है। जो व्यक्ति सुमाला या शुभमाला योग में उत्पन्न होता है वह अनेक व्यक्तियों पर अधिकार रखने वाला भोगी, दाता, बन्धुप्रिय, उत्तम स्त्री पुत्रों से युक्त और धीर हो। और राजा द्वारा प्रशंसित या सम्मानित हो। ऐसा व्यक्ति 'परकार्यकर्ता' हो। 'परकार्यकर्ता' शब्द के दो अर्थ हैं। दूसरे का कार्य करने वाला अर्थात् नौकरी पेशा हो। इस शब्द का दूसरा अर्थ हो सकता है दूसरे का उपकार करने वाला। जो अशुभ मालिका योग में उत्पन्न होते हैं वे दूसरों का वध करने वाले, कृतघ्न, कलहप्रिय (झगड़ालू) और कुमार्गगामी होते हैं। ऐसे लोग कायर होते हैं और लोग उनकी निन्दा करते हैं। ऐसे व्यक्ति ब्राह्मणों का (या बड़ों का) सम्मान नहीं करते और दुःख उठाते हैं। जो लक्ष्मी योग में उत्पन्न होता है वह अच्छे स्वभाव वाली स्त्री के साथ नित्य क्रीड़ा करता है। ऐसा व्यक्ति तेजस्वी होता है। अपने आदमियों की अच्छी प्रकार रक्षा करने में समर्थ होता है और लक्ष्मी का कृपा पात्र बनता है। लक्ष्मी की कृपा पात्र होने का अर्थ है धनी होना। ऐसा व्यक्ति नीरोग रहे। घोड़ा, हाथी, पालकी की सवारी उसे प्राप्त हो। सब लोगों के लिये आनन्द कारक हो। उसकी दानवीरता की प्रशंसा हो और पृथ्वी का श्रेष्ठ स्वामी हो। संक्षेप में लक्ष्मी योग उत्तम राज योग माना गया है। जो गौरी योग में उत्पन्न हो वह सुन्दर शरीर वाला, राजा का मित्र, सद्गुणों और पुत्रों से युक्त, शत्रुओं को जीतने वाला, प्रशंसित हो। उसकी वंश की सब लोग प्रशंसा करें और उसका मुख कमल के समान हो। संक्षेप में, इसे भी बहुत शुभ योग माना गया है। शुक्रवाक्पतिसुधाकरात्मजैः केन्द्रकोणसहितैर्द्वितीयगैः । स्वोच्चमित्रभवनेषु वाक्पतौ वीर्यगे सति सरस्वतीरिता ॥ २६ ॥

छठा अध्याय : योग १२७ धीमन्नाटकगद्यपद्यगणनालङ्कारशास्त्रेष्वयं निष्णातः कविताप्रबन्धरचनाशास्त्रार्थपारंगतः । कीर्त्याक्रान्तजगत्तत्रयोऽतिधनिको दारात्मजैरन्वितः स्यात् सारस्वतयोगजो नृपवरैः संपूजितो भाग्यवान् ॥२७॥ इन श्लोकों में "सरस्वती" योग तथा उसका फल बताते हैं । यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) कोण (५, ९) या द्वितीय स्थान में हों और बृहस्पति स्वराशि मित्र राशि या उच्च राशि में बलवान् हो तो 'सरस्वती' योग होता है । साथ में पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज की जन्मकुण्डली दी जाती है। इनका जन्म उत्तरप्रदेश में प्रतापगढ़ में ११ अगस्त सन् १९०७ को हुआ । इसमें बुध, वृहस्पति, शुक्र लग्न से केन्द्र में हैं और वृहस्पति उच्च राशि का बलवान् है। बृहस्पति के ५ अंश हैं और वह परमोच्च है उसे केन्द्र

[कुण्डली विवरण]:

  • भाव १ (मेष): लग्न
  • भाव २ (वृष)
  • भाव ३ (मिथुन): रा.
  • भाव ४ (कर्क): शु, सू. ४, बु, बृ.
  • भाव ५ (सिंह): ५ चं.
  • भाव ६ (कन्या): ६
  • भाव ७ (तुला): ७
  • भाव ८ (वृश्चिक): ८
  • भाव ९ (धनु): ९ मं के
  • भाव १० (मकर): १०
  • भाव ११ (कुम्भ): ११
  • भाव १२ (मीन): श १२

बल प्राप्त है तथा पूर्ण दिक्बल भी प्राप्त है। इस प्रकार बृहस्पति के पूर्ण बलवान् होने से बहुत उत्तम रूप से 'सरस्वती' योग घटित होता है । अब सरस्वती योग का फल बताते हैं । जिस व्यक्ति की जन्म- कुण्डली में सरस्वती योग हो वह बहुत बुद्धिमान्, नाटक, गद्य, पद्य (काव्य) अलंकार शास्त्र तथा गणित शास्त्र में महान् पटु और विद्वान् होता है। काव्य रचना, प्रबन्ध (सुन्दर लेख या सुन्दर पुस्तक लेखन) तथा शास्त्रार्थ में भी ऐसा व्यक्ति पारंगत (पूर्ण पंडित) होता है। तीनों लोकों में उसकी कीर्ति फैलती है। अति धनी होता है । स्त्री

=भार्गव! And before भार्गवis:तद्वद्! So it is: तद्वद्+भार्गव! Wait, look at how तद्वद्is written: द्व द्ThenभाThenर्गThen! Wait, but let's count the syllables: (1)द्वद्(2) - 'द्' is a consonant coda of 'द्वद्'! It is NOT a syllable!भा(3)र्ग(4)(5) YES!तद्वद्is TWO syllables:(short, but followed by conjunct so heavy),द्वद्(heavy)! Thenभार्(heavy),(short),व` (short)! Let's check the meter: Shardulavikridita begins with Ma-gana: - - -

  1. तद् (-)
  2. वद् (-)
  3. भार् (-) Three heavy syllables! That is EXACTLY Ma-gana (-- -)! Then Sa-gana: . . -
  4. (.)
  5. (.)
  6. भाग् (-) Two light, one heavy! That is EXACTLY Sa-gana (. . -)! Then Ja-gana: . -