फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय : योग १४५ है। अधियोग* में उत्पन्न मनुष्य लक्ष्मीवान्, दीर्घायु और मनस्वी होते हैं। अधियोग में उत्पन्न होने वाले मनुष्य स्थिर सम्पत्ति वाले, बहुत से बन्धुओं का पोषण करने में तत्पर और अनेक व्यक्तियों पर हुकूमत करने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति शत्रुओं को पराजित करने में सफल होते हैं और प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।।४२-४३।। भावैः सौम्ययुतेक्षितैस्तदधिपैः सुस्थानगैर्भास्वरैः स्वोच्चस्वर्क्षगतैर्विलग्नभवनाद्योगाः क्रमाद्द्वादश। संज्ञाश्चामरधेनुशौर्यजलधिच्छत्रास्त्रक मासुरा- भाग्यख्यातिसुपारिजातमसुलास्तज्ज्ञैर्यथा कीर्तिताः ॥४४॥ प्रत्यहं व्रजति वृद्धिमुदग्रां शुक्लचन्द्र इव शोभनशीलः। कीर्तिमान् जनपतिश्चिरजीवी श्रीनिधिर्भवति चामरजातः ॥४५॥ सान्नपान्नविभवोऽखिलविद्यापुष्कलोऽधिककुटुम्बविभूतिः। हेमरत्नधनधान्यसमृद्धो राजराज इव राजति धेनौ ॥४६॥
- बहुत से लोगों के विचार से चन्द्रमा से छठे, सातवें, आठवें तीनों घरों में बुध, गुरु, शुक्र हों-अर्थात् ६, ७, ८ इन तीनों में कोई घर खाली न हो तभी अधियोग होता है किन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि श्रुतकीर्ति का वाक्य है कि व्यास तथा अन्य प्राचीन ज्योतिषियों के अनुसार चाहे ६, ७, ८ इन तीनों घरों में कोई ख़ाली भी हो-यदि बुध, बृहस्पति, शुक्र एक साथ या अलग-अलग या दो एक साथ, एक अलग, किसी भी प्रकार से स्थित हों तो अधि- योग होता है।