भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 15

१२ तुला लग्न के १५-वृश्चिक के ५-धनु के ४-मकर लग्न के लिये ९ कुंभ के ८ और मीन लग्न सम्बन्धी १० योग । पृ० ३८४-३८५ २०. बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल महादशा में अन्तर्दशाओं का फल-लग्न, लग्नेश, धनस्थान धनेश आदि बारहौं भाव और उनके स्वामियों के बल के अनुसार फल- स्वोच्च, स्वगृही तथा वक्रीग्रह का फल-नीच, शत्रु राशिगत तथा अस्तग्रह का फल-यदि किसी भाव का स्वामी बिगड़ा हो तो उसका फल-वर्गोत्तम ग्रह-तीसरे, पाँचवें तथा सप्तम नक्षत्र स्वामी की दशा- मंगल, गुरु, शुक्र, शनि, राहु की अन्तर्दशा का विशेष विचार-यदि अन्तर्दशा नाथ महादशानाथ या लग्नेश का शत्रु हो-शनि, मान्दि, राहु २२वें द्रेष्काण के स्वामी या उनके नवांशों के स्वामी-महादशा या अन्तर्दशानाथ के गोचरवश विचार-दशानाथ तथा अन्तर्दशानाथ की पारस्परिक स्थिति-दशा या अन्तर्दशानाथ अपने पाक के समय उच्च या स्वगृही अथवा नीच या शत्रु राशि में गोचरवश जा रहा हो- राहु युत ग्रह-उडुदाय प्रदीपानुसार कारक, मारक, पापी, राजयोग- योगकारकवश विचार, आरोही, अवरोही विचार-नवांश के अनुसार तारतम्य-भावार्थ रत्नाकर के अनुसार योग-धनयोग ९-निर्धन योग ४- विद्यायोग १५-वाणी योग ६-तृतीय भाव के योग १२-चतुर्थ भाव योग १७-पुत्र विचार २ योग-शत्रु तथा रोग सम्बन्धी १२ योग-पत्नी विचार १४ योग-आयु-आरोग्य के १६ योग-भाग्य योग २३-राजयोग २५-महादशा योग २४-ग्रह सामान्य योग १६-ग्रह मालिका योग ७- मारक योग २१ । पृ० ३८६-४५० २१. इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशा फल अन्तर्दशा प्रत्यन्तर्दशा निकालने का प्रकार-सूर्य महादशा में नवों अन्तर्दशा-प्रत्येक अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर-सूर्य महादशा में अन्तर और