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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

१२ तुला लग्न के १५-वृश्चिक के ५-धनु के ४-मकर लग्न के लिये ९ कुंभ के ८ और मीन लग्न सम्बन्धी १० योग । पृ० ३८४-३८५ २०. बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल महादशा में अन्तर्दशाओं का फल-लग्न, लग्नेश, धनस्थान धनेश आदि बारहौं भाव और उनके स्वामियों के बल के अनुसार फल- स्वोच्च, स्वगृही तथा वक्रीग्रह का फल-नीच, शत्रु राशिगत तथा अस्तग्रह का फल-यदि किसी भाव का स्वामी बिगड़ा हो तो उसका फल-वर्गोत्तम ग्रह-तीसरे, पाँचवें तथा सप्तम नक्षत्र स्वामी की दशा- मंगल, गुरु, शुक्र, शनि, राहु की अन्तर्दशा का विशेष विचार-यदि अन्तर्दशा नाथ महादशानाथ या लग्नेश का शत्रु हो-शनि, मान्दि, राहु २२वें द्रेष्काण के स्वामी या उनके नवांशों के स्वामी-महादशा या अन्तर्दशानाथ के गोचरवश विचार-दशानाथ तथा अन्तर्दशानाथ की पारस्परिक स्थिति-दशा या अन्तर्दशानाथ अपने पाक के समय उच्च या स्वगृही अथवा नीच या शत्रु राशि में गोचरवश जा रहा हो- राहु युत ग्रह-उडुदाय प्रदीपानुसार कारक, मारक, पापी, राजयोग- योगकारकवश विचार, आरोही, अवरोही विचार-नवांश के अनुसार तारतम्य-भावार्थ रत्नाकर के अनुसार योग-धनयोग ९-निर्धन योग ४- विद्यायोग १५-वाणी योग ६-तृतीय भाव के योग १२-चतुर्थ भाव योग १७-पुत्र विचार २ योग-शत्रु तथा रोग सम्बन्धी १२ योग-पत्नी विचार १४ योग-आयु-आरोग्य के १६ योग-भाग्य योग २३-राजयोग २५-महादशा योग २४-ग्रह सामान्य योग १६-ग्रह मालिका योग ७- मारक योग २१ । पृ० ३८६-४५० २१. इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशा फल अन्तर्दशा प्रत्यन्तर्दशा निकालने का प्रकार-सूर्य महादशा में नवों अन्तर्दशा-प्रत्येक अन्तर्दशा में प्रत्यन्तर-सूर्य महादशा में अन्तर और

१३ प्रत्यन्तर-चन्द्र महादशा में अन्तर और अन्तरों में प्रत्यन्तर-मंगल महादशा में नौ अन्तर्दशाएँ और उनमें प्रत्यन्तर-राहु महादशा में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-गुरु महादशा में अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-बुध महादशान्तर्गत अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर-केतु में अन्तर और प्रत्यन्तर तथा शुक्र महादशा में नवों अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा । पृ० ४५१-४८५ २२. बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा कालचक्र महादशा, अन्तर्दशा-महादशा काल-भुक्त भोग्य निकालने का प्रकार-प्रत्येक नक्षत्र चरण में जन्म होने से विविध राशियों का दशाक्रम-प्रत्येक राशि का दशा काल-प्रत्येक दशा में अन्तर्दशा काल-राशि स्वामीवश फल में तारतम्य-गोचरवश प्रभाव-विविध गतियाँ-इन सबकी पूर्ण व्याख्या उदाहरण सहित-जन्म नक्षत्र से पाँचवें तथा आठवें नक्षत्र से उत्पन्न, आधान तथा महादशा-निसर्ग दशा-अंश दशा-सत्याचार्य का मत-पिण्डायुर्दाशा-जीवशर्मा मणित्थ, चाणक्य, मय आदि का मत । पृ० ४८६-५३५ २३. तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग । अष्टकवर्ग से गोचर विचार का सिद्धान्त-सूर्य-चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि के अष्टक वर्ग बनाने की प्रक्रिया-उपचय, मित्र राशि, स्वोच्च में या अनुपचय, शत्रुराशि या नीच ग्रह से फलादेश में तारतम्य-एक या अधिक बिन्दुओं का अशुभ या शुभ फल-ग्रह को लग्न मान शुभाशुभ निर्देश-प्रत्येक राशि की ८ कक्ष्या-कक्ष्यावश शुभाशुभ काल निर्णय-सर्वाष्टकवर्ग-उदाहरण सहित । पृ० ५३६-५६१ । २४. चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग फल पिता, माता, भ्राता आदि तथा स्वयं का शुभाशुभ काल निर्णय- अष्टकवर्ग से शुभाशुभ वर्ष निकालने का प्रकार-किस राशि या दिशा,

१४ में विवाह करने से विवाह फलप्रद होगा-त्रिकोण शोधन उत्तर भारतीय पराशर के और दक्षिण भारतीय होरा रत्नकार बलभद्र के मत में विभिन्नता-मंत्रेश्वर का मत-प्रश्न मार्ग का मत-त्रिकोण शोधन व्याख्या तथा उदाहरण सहित-एकाधिपत्य शोधन-राशि, ग्रह, गुणा कार-इन सबसे विविध फलादेश पृ० ५६२-५९९ २५. पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह । गुलिक या मान्दि स्पष्ट करने का गणित प्रकार-यम,-कण्टक, अर्द्ध प्रहर, काल, धूम, व्यतीपात, परिवेष या परिधि-इन्द्र चाप तथा केतु स्पष्ट करने की प्रक्रिया-इन सबका विविध भावगत फल । पृ० ६००-६१६ २६. छब्बीसवाँ अध्याय : गोचर फल । चन्द्र लग्न की प्रधानता, चन्द्र लग्न से सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि तथा राहु केतु के गोचर वश शुभ और अशुभ स्थान- वेध फल-प्रत्येक ग्रह का चन्द्र लग्न से विविध भावगत शुभाशुभ फल- नक्षत्र गोचर-सप्तशलाका-जन्म, आधान तथा कर्म एवं वैनाशिक वश विचार-जन्म-अनुजन्म, त्रिजन्म नक्षत्र-ग्रह युद्ध-उल्कानिपात-जन्म नक्षत्र से गिनने पर प्रत्येक नक्षत्र में विविध ग्रहों के संचार वश फल-लत्ता फल । सर्वतोभद्र चक्र निर्माण प्रकार-गोचर वश फल-पूर्ण व्याख्या सहित । पृ० ६१७-६६७ २७. सत्ताईसवाँ अध्याय : प्रव्रज्या योग । चतुर्ग्रह योग-राशि के अन्तिम भाग के उदय का फल-बलीग्रह की प्रव्रज्या-चन्द्रद्रेष्काण वश फल-जन्माधिप यदि शनि से दृष्ट हो-सूर्य, चन्द्र आदि जो ग्रह बलवान् हो उससे प्रव्रज्या प्रकार-तपस्वी योग-यदि

१५ राज योग और प्रव्रज्या दोनों प्रकार के योग जन्म कुंडली में हों— सन्याससिद्धि । पृ० ६६८-६७१ २८. अट्ठाईसवाँ अध्याय : उपसंहार । अट्ठाईस अध्यायों में से-प्रत्येक में किस विषय का फलादेश बताया है इसका विवरण-ग्रंथकार का परिचय । पृ० ६७२-६७३ २९. परिशिष्ट—विंशोत्तरी महादशा में अन्तर्दशा चक्र-कालचक्र दशा में अन्तर्दशा चक्र-चन्द्र स्पष्ट से भुक्त-भोग्य काल चक्र महादशा निकालने की सारिणी नं० १, २, ३, ४ पृ० ६७४-६७९

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॥ ॐ ॥ फलदीपिका प्रथम अध्याय राशि भेद शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ सन्दर्शनं वितनुते पितृदेवनॄणां मासाब्दवासरदलैरथ ऊर्ध्वगं यत् । सव्यं क्वचित्क्वचिदुपैत्यपसव्यमेकं ज्योतिः परं दिशतु वस्त्वमितां श्रियं नः ॥ १ ॥ वाग्देवीं कुलदेवतां मम गुरून् कालत्रयज्ञानदान् सूर्यादींश्च नवग्रहान् गणपतिं भक्त्या प्रणम्येश्वरम् । संक्षिप्यात्रपराशरादिकथितान् मन्त्रेश्वरो दैवविद् वक्ष्येऽहं फलदीपिकां सुविमलां ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥२॥ मंगलाचरण--शुक्ल (श्वेत या उज्ज्वल) अम्बर (वस्त्र या आकाश) धारण करने वाले, चन्द्रमा के वर्ण (कान्ति) वाले, प्रसन्न वदन चतुर्भुज देव (श्री भगवान्) का सब विघ्नों की शान्ति के लिये ध्यान करें। वह परम ज्योति (भगवान् सूर्यनारायण) जो ऊपर आकाश में देवताओं को आधे वर्ष (छः मास) तक, पितरों को आधे मास (एक पखवाड़े) तक और मनुष्यों को आधे दिन रात (१२ घंटे) तक एक साथ दर्शन देते हैं, जो कभी बायीं ओर चलते हैं (अर्थात् जिनकी गति कभी उत्तरायण होती है) और जो कभी दाहिनी ओर चलते हैं (अर्थात् जिनकी 7718

१८ फलदीपिका गति कभी दक्षिणायन होती है, हमको अपरिमित (जिसकी सीमा नहीं) श्री (धन, वैभव, सौभाग्य, सौन्दर्य आदि) प्रदान करें । ध्रुव लोक में देवताओं का वास माना गया है—वहां छः महीने का दिन, छः महीने की रात्रि होती है । पितरों का वास चन्द्रलोक में माना गया है—चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश आधे मास तक (शुक्ल पक्ष में) रहता है, कृष्ण पक्ष पितरों का माना गया है । मनुष्यों की निवास भूमि— पृथ्वी में, दिन रात के आधे समय (१२ घंटे) सूर्य का प्रकाश रहता है—यह तीनों बातें ऊपर की स्तुति में प्रदर्शित की गई हैं । ॥ १ ॥ वाग्देवी (वाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती), कुल देवता तथा तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) का ज्ञान प्रदान करने वाले मेरे गुरुओं को, तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु इन नवग्रहों को, श्री गणेशजी तथा ईश्वर (भगवान् शंकर) को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके महर्षि अत्रि, महर्षि पराशर आदि कथित शास्त्र (फलित ज्योतिष) को संक्षिप्त करके मैं म

प्रथम अध्याय : राशि भेद १९ ज्ञात कर, भाव स्पष्ट करके और ग्रहों तथा भावों के बल निकालकर फल कहे। ॥ ३ *॥ शिरोवक्त्रोरोहृज्जठरकटिवस्तिप्रजनन- स्थलान्यूरूबान्वोर्युगलमिति जंघे पदयुगम् । विलग्नात्कालाङ्गान्यलिक्षषकूलीरान्तिममिदं भसन्धिविख्याता सकलभवनान्तानपि परे ॥ ४ ॥ समस्त जन्मकुंडली को 'कालपुरुष, का स्वरूप मानकर प्रथम भाव¹ से सिर का, दूसरे भाव से चेहरे का, तीसरे से छाती का, चौथे से हृदय का, पांचवें से पेट का, छठे से कमर का, सातवें से वस्ति² का, आठवें से गुप्त इन्द्रियों का, नवें से जांघों का, दसवें से दोनो घुटनों का, ग्यारहवें से पिंडलियों का, बारहवें से दोनों पैरों का विचार करना चाहिये। जिस भाव में शुभ ग्रह हों, जिस भाव को शुभ ग्रह देखते हों, जिस भाव का स्वामी बलवान् हो—उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग पुष्ट और सुन्दर होता है। भावेश निर्बल होने से या भाव के क्रूर दृष्ट, क्रूर युत होने से, उस भाव से सम्बन्धित शरीर का भाग कृश या रोगयुक्त होता है। कर्क, वृश्चिक तथा मीन राशियों के अन्तिम भाग (अंश) को राशि- संधि कहते हैं। अन्य मत से किसी भी राशि का अंतिम भाग—जहां अग्रिम राशि शुरू होती हो—राशिसन्धि कहलाता है ॥ ४ ॥ अरण्ये केदारे शयनभवने श्वभ्रसलिले गिरौ पाथः सस्यान्वितभुवि विशां धाम्नि सुषिरे । १. भाव, स्थान, घर सब का एक ही अर्थ है। २. नाभि से लिंग मूल तक एक रेखा खींची जावे और उसे दो भागों में विभाजित किया जावे तो नीचे का आधा हिस्सा वस्ति कहलाता है।

२० फलदीपिका जनाधीशस्थाने सजलविपिने धाम्नि विचरत् कुलाले कीलाले वसतिरुदिता मेषभवनात् ॥ ५ ॥ मेष आदि १२ राशियों के रहने के स्थान क्रमशः बताते हैं (१) जंगल, (२) जलपूर्ण खेत, (३) शयन (सोने) का कमरा, (४) जलपूर्ण दरार, (५) पर्वत, (६) जल और अन्न से पूर्ण भूमि, (७) वैश्य का घर, (८) छिद्र, (९) जनाधीश (राजा या अधिकारी का स्थान, (१०) जलपूर्ण जंगल, (११) कुम्हारों की जगह, (१२) जल । जन्मकुंडली या प्रश्न में जिस राशि से निर्णय किया जावे—उस राशि के उपर्युक्त वर्णित स्थान से फलादेश में सहायता लेनी चाहिये ॥ ५ ॥ भौमः शुक्रबुधेन्दुसूर्यशशिजाः शुक्रारजीवार्कजाः मन्दौ देवगुरुः क्रमेण कथिता मेषादिराशीश्वराः । सूर्यादुच्चगृहाः क्रियो वृषमृगस्त्रीकर्कमोनास्तुला दिक्त्र्यंशैर्मनुयुक्तितिथीषुभनखांशैस्तेऽस्तनीचाः क्रमात् ॥६॥ मेष और वृश्चिक इन दो राशियों का स्वामी मंगल होता है, वृष और तुला का शुक्र, मिथुन और कन्या का बुध, धनु और मीन का वृहस्पति, मकर और कुंभ राशियों का शनि । सिंह का सूर्य तथा कर्क का चन्द्रमा स्वामी है । अब नीचे के चक्र में किस ग्रह की कौन-सी उच्च राशि है और उस समस्त उच्च राशि में भी, किस अंश पर परम उच्च होता है यह बताया जाता है । इसी प्रकार ग्रहों की नीच राशि तथा उस नीच राशि में भी परम नीच अंश बताया जाता है । | ग्रह | उच्च राशि | परमोच्च अंश | नीच राशि | परम नीच अंश | | सूर्य | मेष | १० | तुला | १० | | चन्द्र | वृष | ३ | वृश्चिक | ३ | | मंगल | मकर | २८ | कर्क | २८ |

प्रथम अध्याय : राशि भेद २१ ग्रह उच्चराशि परमोच्चअंश नीच राशि परम नीच अंश बुध कन्या १५' मीन १५ बृहस्पति कर्क ५ मकर ५ शुक्र मीन २७ कन्या २७ शनि तुला २० मेष २० उदाहरण के लिये बृहस्पति कर्क राशि के ५वें अंश पर परमोच्च कहलाता है और ऊपर से ऊपर के शिखर पर पहुंचकर नीचे चलना शुरू करता है; जब मकर के ५ अंश पर रहता है तो परम नीच (नीचा) हो जाता है। फिर ऊंचा जाना शुरू करता है ॥ ६ ॥ सिंहोक्षाजवधूहयाङ्गवणिनः कुंभस्त्रिकोणा रवेः ज्ञेन्दोस्तूच्चलवान्खषोड्वनशरैर्दिग्भूतकृत्यंशकैः । चापाद्यर्धवधूनृयुग्घटतुला मत्स्याश्च कीटोऽलिभं त्वाप्याः कर्किमृगापरार्द्धशफराः शेषाश्चतुष्पादकाः ॥७॥ कुछ ग्रहों की जो स्वराशि या उच्च राशि बताई गई हैं वे उनकी मूल त्रिकोण राशि भी होती है। फिर यह कैसे मालूम पड़े कि उस राशि में स्वराशि या अपनी राशि कितने अंशों तक है और मूल त्रिकोण कहां से कहां तक ? या उच्च राशि कौन-सा भाग है ? मूल त्रिकोण कौन-सा भाग ? यह नीचे चक्र में स्पष्ट किया जाता है। ग्रह राशि मूल त्रिकोण अपनी राशि सूर्य सिंह ०°—२०° शेष स्वराशि चन्द्रमा वृष ३°—३०° प्रथम ३ अंश-उच्च मंगल मेष ०°—१२° शेष स्वराशि 'टिप्पणी—कन्या में ०° से १५° तक बुध का उच्च भाग १६°–२०° तक मूल त्रिकोण और २०°—३०° तक स्वराशि होती है।

२२ फलदापका ग्रह राशि मूलत्रिकोण अपनीराशि बुध कन्या १५°-२०° २०°-३०° स्वराशि वृहस्पति धनु ०-१०° शेष स्वराशि शुक्र तुला ०-५° शेष स्वराशि शनि कुंभ ०°-२०° शेष स्वराशि अब राशियों को मनुष्य, कीट (कीड़ा) जल, तथा चतुष्पाद इन चार भागों में विभाजित करते हैं । मनुष्य चतुष्पाद कीट जलचर मिथुन मेष वृश्चिक कर्क कन्या वृष मकर (उत्तरार्द्ध) तुला मीन धनु (पूर्वार्ध) सिंह धनु (उत्तरार्द्ध) कुंभ मकर (पूर्वार्द्ध) गोकर्क्यश्व्यजनक्रभान्यथ नृयुङ्मीनौ परे राशय- स्ते पृष्ठोभयकोदयाः समिथुनः पृष्ठोदयाश्चैन्दवाः । सौराः शेषगृहाः क्रमेण कथिता रात्रिद्युसंज्ञाः क्रमा- दूर्ध्वाधःसमवक्रभानि तु पुनस्तीक्ष्णांशुमुक्ताद् गृहात् ॥८॥ अब कौन-सी राशि अपने आगे की ओर से उदय होती है, कौन-सी पीछे की ओर से और कौन-सी दोनों ओर से यह बताते हैं । मेष पृष्ठोदय कर्क पृष्ठोदय वृष पृष्ठोदय सिंह शीर्षोदय *मिथुन उभयोदय कन्या शीर्षोदय शीर्षोदय—सिर या आगे की ओर से उदय होने वाली । *१. बृहज्जातक के मतानुसार मिथुन शीर्षोदय है ।

१. अध्याय १-७: संज्ञा, ग्रह-गुण, राशि-भेद, कारकत्व एवं विविध योग विचार

प्रथम अध्याय : राशि भेद २३ तुला शीर्षोदय मकर पृष्ठोदय वृश्चिक शीर्षोदय कुंभ शीर्षोदय धनु पृष्ठोदय मीन उभयोदय बहुत से विचारों में शीर्षोदय राशियां उत्तम मानी गई हैं; पृष्ठोदय क्रूर। शीर्षोदय राशि में स्थित ग्रह प्रारंभ में ही अपना फल दिखाता है। पृष्ठोदय में स्थित अंत में । उभयोदय में स्थित मध्य में । अब राशियों को (१) दिन में बली तथा (२) रात्रि में बली इन भागों में बांटते हैं।* दिवा बली—५, ६, ७, ८, ११, १२ रात्रि बली—१, २, ३, ४, ९, १० दिवा बली राशियों पर सूर्य का विशेष अधिकार है । रात्रि बली राशियों पर चन्द्रमा का । सूर्य जिस राशि को पार कर चुका है उससे गिनना प्रारंभ कीजिये— इनकी क्रमशः ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र, यह संज्ञा है। उदाहरण के लिये सूर्य कन्या को पारकर तुला में आया तो कन्या से सिंह तक क्रमशः गिनिये। ऊर्ध्व, अधः, सम, वक्र, ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र, ऊर्ध्व, अधः सम, वक्र । यह भिन्न-भिन्न राशियों की क्रमशः संज्ञा हुई ।। ८ ।। मेषादाह चरं स्थिराख्यमुभयं द्वारं बहिर्गर्भभं धातुर्मूलमितीह जीव उदितं क्रूरं च सौम्यं विदुः । मेषाद्याः कथितास्त्रिकोणसहिताः प्रागादिनाथाः क्रमा- दोजर्क्षं समभं पुमांश्च युवतिर्वामाङ्गमस्तादिकम् ॥ ९ ॥ पृष्ठोदय—पीछे की ओर से उदय होने वाली । उभयोदय—दोनों ओर से उदय होने वाली । *५ का अर्थ सिंह, ६ का कन्या इस प्रकार समझना चाहिये ।

२४ फलदीपिका अब राशियों के कुछ अन्य लक्षण बतलाते हैं-- मेष चर द्वार धातु क्रूर विषम पूर्व वृष स्थिर बहिः मूल सौम्य सम दक्षिण मिथुन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पश्चिम कर्क चर द्वार धातु सौम्य सम उत्तर सिंह स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पूर्व कन्या उभय गर्भ जीव सौम्य सम दक्षिण तुला चर द्वार धातु क्रूर विषम पश्चिम वृश्चिक स्थिर बहिः मूल सौम्य सम उत्तर धन उभय गर्भ जीव क्रूर विषम पूर्व मकर चर द्वार धातु सौम्य सम दक्षिण कुंभ स्थिर बहिः मूल क्रूर विषम पश्चिम मीन उभय गर्भ जीव सौम्य सम उत्तर चर का अर्थ है जिसमें कार्य जल्दी हो। यात्रा करे तो जल्दी वापिस आवे। स्थिर लग्न में कार्य करने से स्थायी होता है। स्थिर लग्न में मकान में प्रवेश करे तो बहुत वर्षों तक रहे। 'उभय' का पहिला आधा भाग 'स्थिर' का प्रभाव दिखाता है; अन्तिम आधा भाग 'चर' का प्रभाव दिखाता है। मिला-जुला प्रभाव दिखाने के कारण इसे उभय (दोनों) कहते हैं। 'द्वार' का अर्थ है दरवाजे पर। 'बहिः' का अर्थ है बाहर। 'गर्भ' का अर्थ है अन्दर। 'धातु' का अर्थ है सोना, चांदी, लोहा आदि। 'मूल' का वृक्ष, फल, अन्न, खेती आदि। 'जीव' का अर्थ है प्राणी—पुत्र, पौत्र आदि। मान लीजिये ग्रह के लक्षण से प्रतीत होता है कि 'लाभ' होगा? किसका लाभ? जिस राशि में ग्रह है उसके लक्षण से बतलाइये कि किस प्रकार के लाभ या हानि की संभावना है। धातु की, या मूल की या मनुष्य की। क्रूर राशि में क्रूर ग्रह और भी क्रूर हो जाता है। सौम्य राशि में क्रूर ग्रह कम क्रूरता दिखाता है। इस प्रकार ग्रह की तथा राशि की क्रूरता तथा सौम्यता निश्चय कर परिणामतः कितनी क्रूरता या सौम्यता होगी यह

'शुचि'! श with u-matra: शु! च with i-matra: चि! मरणारुचि or मरणाशुचि? Look at the letter after ण: It has a tall loop like श: 'शु' with an 'i-matra' over the next letter 'चि'! Wait: अशौच/शुचि? "अशुचि" (impurity)! मरण + अशुचि = मरणाशुचि! Death and impurity/mourning (aśauci/sūtaka)! 8th house represents death (मरण) and impurity from death (अशुचि)! YES! "मरणाशुचिविघ्नदासान्"!! Look at the letters: म-र-णा-शु-चि-वि-घ्न-दा-सा-न् । It is definitely 'मरणाशुचिविघ्नदासान्'!! What an incredible catch!

Wait, let's re-examine line 23: माङ्गल्यरन्ध्रमलिनाधिपराभवायुः Wait, between 'मलिना' and 'पराभवायुः': What is that letter? ध with i-matra: धि! Is it 'मलिनाधिपराभवायुः' or 'मलिनाधिपराभवायुः'? Let's read: मा (mā) ङ्गल्य (ṅgalya) रन्ध्र (randhra)

२६ फलदीपिका आचार्यदैवतपितॄन् शुभपूर्वभाग्य- पूजातपःसुकृतपौत्रजपार्यवंशान् ॥१४॥ व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्कीर्तिं क्रतुं जीवनं व्योमाचारगुणप्रवृत्तिमनन्याज्ञां च मेषूरणम् । लाभायागमनाप्तिसिद्धिविभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां ज्येष्ठभ्रातरमन्यकर्णसरसान् सन्तोषमाकर्णनम् ॥१५॥ दुःखांघ्रिवामनयनक्षयसूचकान्त्य- दारिद्र्यपापशयनव्ययरिःफबन्धान् । भावाह्वया निगदिताः क्रमशोऽथ लीन- स्थानं त्रिषड्व्ययपराभवराशिनाम ॥१६॥ जन्मकुंडली में १२ भाव होते हैं । एक-एक भाव को अनेक नाम से पुकारते हैं । किस-किस भाव के कितने और क्या-क्या नाम हैं, यह नीचे बताया जाता है । इसका प्रयोजन यह है कि एक ही भाव के भिन्न-भिन्न नामों से यह पता चलता है कि उस एक ही भाव से किन-किन भिन्न-भिन्न चीज़ों का विचार करना । (१) लग्न, होरा, कल्प (प्रभात, सूर्योदय अर्थात् प्रारंभ) देह, उदय (प्रारंभ होना), रूप, सिर, वर्तमान काल (मौजूदा हालत), जन्म इन सब का विचार पहले घर (भाव) से करें । (२) धन, विद्या, अपनी वस्तु (धन पर अधिकार), खाना पीना, भोजन, दाहिना नेत्र, चेहरा, पत्रिका (चिट्ठी), वाणी (बोलने की शक्ति), कुटुम्ब—यह द्वितीय घर के नाम हैं अर्थात् इन सब का विचार द्वितीय भाव से करें । (३) दुश्चिक्य, छाती, दाहिना कान, सेना, हिम्मत, वीरता, शक्ति तथा भाई (बहिनों) का विचार तृतीय से करें । इसको दुश्चिक्य स्थान भी कहते हैं ।

प्रथम अध्याय : राशि भेद २७ (४) घर, खेत, मामा, भान्जा, बन्धु, मित्र, सवारी, मां, गाय-भैंस, सुगन्धि, वस्त्र, जेवर, तथा सुख का विचार चौथे घर से करें। इसी घर से पानी, नदी, पुल, आदि का विचार करना चाहिये । चौथे घर को ‘हिबुक’ भी कहते हैं । (५) राजशासन की मोहर, मंत्री, कर (टैक्स), आत्मा, बुद्धि, भविष्य ज्ञान, प्राण, सन्तान, पेट, श्रुति (वेद) स्मृति (मनुस्मृति आदि) का विचार पंचम से करे । श्रुति-स्मृति से तात्पर्य है शास्त्र ज्ञान का। अतः समस्त शास्त्र ज्ञान का विचार पंचम स्थान से करना चाहिये । (६) कर्ज़, अस्त्र, चोर, घाव (चोट), रोग, शत्रु, जाति (भाई बन्धु जो शत्रुता का भाव रखते हों) युद्ध, दुष्ट कर्म, पाप, भय, अपमान आदि का विचार छठे घर से करे । (७) हृदय की इच्छाएँ (काम वासना), मद, मार्ग, लोक (जनता), पति, पत्नी आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिये । इस सातवें स्थान को ‘द्यूत’ तथा ‘जामित्र’ भी कहते हैं । सूर्य अस्त के समय, पूर्व क्षितिज लग्न राशि से सातवें घर में रहता है इस कारण सप्तम स्थान की ‘अस्त’ संज्ञा भी है। (८) मांगल्य (स्त्री का सौभाग्य—पति का जीवित रहना), रंध्र (छिद्र), आधि (मानसिक बीमारी-चिन्ता) अपमान या हार, आयु (कितने वर्ष मनुष्य ज़िन्दा रहेगा) क्लेश, बदनामी, मृत्यु, विघ्न, अशुचि (अपवित्रता या मरने के कारण सूतक) दास (गुलामों) का विचार अष्टम स्थान से करना चाहिये । गुदा का विचार भी अष्टम से किया जाता है। अष्टम में मंगल प्रायः बवासीर का रोग करता है । (९) आचार्य (गुरु), देवता (आराध्य देव), पिता, पूजा, पूर्वभाग्य (तप, सत्कर्म) पौत्र, उत्तम वंश आदि का विचार नवम भाव से करना चाहिये । इस को शुभ स्थान भी कहते हैं। दक्षिण भारत में नवें घर से पिता का विचार किया जाता है किंतु उत्तर भारत में दसवें घर से पिता का विचार करते हैं ।

२८ फलदीपिका (१०) व्यापार उच्च स्थान (पोजीशन) इज्जत, कर्म, जय, यश, यज्ञ, जीविका का उपाय, कार्य में अभिरुचि, आचार (सदाचार या दुराचार) गमन, हुकूमत, गुण, आकाश आदि का विचार दसवें घर से करे। इसे ‘मेषूरण’ या आज्ञा स्थान भी कहते हैं। -(११) लाभ, आमदनी, प्राप्ति, आगमन, सिद्धि, वैभव (धन, ऐश्वर्य) कल्याण, श्लाघ्यता—प्रशंसा, बड़ा भाई या बड़ी बहन, बायाँ कान, सरसता, अच्छी खबर आदि का विचार ग्यारहवें घर से करे। (१२) दुःख, पैर, बायाँ नेत्र, ह्रास, चुगलखोर, अन्त (किसी का आखिरी परिणाम), दरिद्रता, पाप, शयन (पलंग पर शयन करना— इसके अतिरिक्त पुरुष स्त्री गुप्त संबंध भी समझना चाहिये), खर्चा, बन्धन (जेल जाना) आदि का विचार बारहवें स्थान से करें। बारहवें घर को 'व्यय' स्थान या “रिःफ" भी कहते हैं। तीसरे, छठे, आठवें तथा बारहवें घर को 'लीन' स्थान कहते हैं। 'लीन' का अर्थ है छिपा हुआ। आठवां सब से निकृष्ट समझा जाता है। ६ठे, ८वें तथा १२वें स्थान को 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ दुःस्थानमष्टमरिपुव्ययभावमाहुः सुस्थानमन्यभवनं शुभदं प्रदिष्टम् । प्राहुर्विलग्नदशसप्तचतुर्थभानि केन्द्रं हि कण्टकचतुष्टयनामयुक्तम् ॥ छठे, आठवें तथा बारहवें घरों को 'दुःस्थान' कहते हैं। दुःस्थान का अर्थ है खराब स्थान। अन्य स्थान १, २, ३, ४, ५, ७, ९, १०, ११ शुभ स्थान हैं। वे शुभ फल करते हैं। जन्मकुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम स्थानों को ‘केन्द्र’ कहते हैं। केन्द्र को ‘कंटक’ या ‘चतुष्टय’ भी कहते हैं ॥ १७ ॥ पणफरमिति केन्द्रादूर्ध्वमापोक्लिमन्तत्- परमथ चतुरस्रं नैधनं बन्धुभं च ।

प्रथम अध्याय : राशि भेद २९ अथ समुपचयानि व्योमशौर्यारिलाभा नवमसुतभयुग्मं स्यात् त्रिकोणं प्रशस्तम् ॥१८॥ जन्म लग्न से द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एकादश स्थानों को 'पणफर' कहते हैं तथा तृतीय, षष्ठ, नवम और द्वादश स्थानों को 'आपोक्लिम' । चौथे तथा आठवें घर को 'चतुरस्र' कहते हैं । तृतीय, छठे, दसवें तथा ग्यारहवें घर का 'उपचय' नाम है । पाँचवें तथा नवें घर को 'त्रिकोण' कहते हैं । त्रिकोण स्थान बहुत उत्तम माने गये हैं । त्रिकोण में शुभ ग्रह बैठे तो और भी शुभ फल दिखलाता है । त्रिकोण का स्वामी भी अपनी दशा, अन्तर्दशा में शुभ फल दिखाता है ॥ १८ ॥

दूसरा अध्याय ग्रह भेद अब इस अध्याय के प्रारंभ में सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिये—किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है । प्रथम अध्याय में यह बता चुके हैं कि किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिये, इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिये । उदाहरण के लिये यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिये । यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई । परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है ? मान लीजिये दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है । जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें धनेश का प्रभाव दिखावेगा —यह उचित ही है परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण, धर्म क्या है ? ग्रहों के जो स्वाभाविक गुण, धर्म हैं, जिन वस्तुओं के वे कारक हैं—वह नीचे के श्लोकों में बताया जाता है । ताम्रं स्वर्णं पितृशुभफलं चात्मसौख्यप्रतापं धैर्यं शौर्यं समितिविजयं राजसेवां प्रकाशम् । शैवं कार्यं वनगिरिगतिं होमकार्यप्रवृत्ति देवस्थानं कथयतु बुधस्तैक्ष्ण्यमुत्साहमर्कात् ॥१॥ मातुः स्वस्ति मनःप्रसादमुदधिस्नानं सितं चामरं छत्रं सुव्यजनं फलानि मृदुलं पुष्पाणि सस्यं कृषिम् । कीर्तिं मौक्तिककांस्यरौप्यमधुरक्षीरादिवस्त्राम्बुगो- योषाप्ति सुखभोजनं तनुसुखं रूपं वदेच्चन्द्रतः ॥२॥

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३१ सत्त्वं भूफलितं सहोदरगुणं शौर्यं रणं साहसं विद्वेषं च महानसाग्निकनकज्ञात्यस्त्रचोरान्रिपून् । उत्साहं परकामिनीरतिमसत्योक्तिं महीजाद्वदे- द्वैर्यं चित्तसमुन्नतिं च कलुषं सेनाधिपत्यं क्षतम् ॥३॥ पाण्डित्यं सुवचः कलानिपुणतां विद्वत्स्तुतिं मातुलं वाक्चातुर्यमुपासनादिपटुतां विद्यासु युक्तिं मतिम् । यज्ञं वैष्णवकर्म सत्यवचनं शुक्तिं विहारस्थलं शिल्पं बान्धवयौवराज्यसुहृदस्तद्भागिनेयं बुधात् ॥४॥ ज्ञानं सद्गुणमात्मजं च सचिवं स्वाचारमाचार्यकं • माहात्म्यं श्रुतिशास्त्रधीस्मृतिमतिं सर्वोन्नतिं सद्गतिम् । देवब्राह्मणभक्तिमध्वरतपःश्रद्धाश्च कोशस्थलं वैदुष्यं विजितेन्द्रियं धवसुखं संमानमीड्याद्वदेत् ॥५॥ संपद्वाहनवस्त्रभूषणनिधिद्रव्याणि तौर्यत्रिकं भार्यासौख्यसुगन्धपुष्पमदनव्यापारशय्यालयान् । श्रीमत्त्वं कवितासुखं बहुवधूसङ्गं विलासं मदं साचिव्यं सरसोक्तिमाह भृगुजादुद्वाहकर्मोत्सवम् ॥६॥ आयुष्यं मरणं भयं पतिततां दुःखावमानामयान् दारिद्र्यं भृतकापवादकलुषाण्याशौचनिन्द्यापदः । स्थैर्यं नीचजनाश्रयं च महिषं तन्द्रीमृणं चायसं दासत्वं कृषिसाधनं रविसुतात्कारागृहं बन्धनम् ॥७॥ तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य,