फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय : राशि भेद २७ (४) घर, खेत, मामा, भान्जा, बन्धु, मित्र, सवारी, मां, गाय-भैंस, सुगन्धि, वस्त्र, जेवर, तथा सुख का विचार चौथे घर से करें। इसी घर से पानी, नदी, पुल, आदि का विचार करना चाहिये । चौथे घर को ‘हिबुक’ भी कहते हैं । (५) राजशासन की मोहर, मंत्री, कर (टैक्स), आत्मा, बुद्धि, भविष्य ज्ञान, प्राण, सन्तान, पेट, श्रुति (वेद) स्मृति (मनुस्मृति आदि) का विचार पंचम से करे । श्रुति-स्मृति से तात्पर्य है शास्त्र ज्ञान का। अतः समस्त शास्त्र ज्ञान का विचार पंचम स्थान से करना चाहिये । (६) कर्ज़, अस्त्र, चोर, घाव (चोट), रोग, शत्रु, जाति (भाई बन्धु जो शत्रुता का भाव रखते हों) युद्ध, दुष्ट कर्म, पाप, भय, अपमान आदि का विचार छठे घर से करे । (७) हृदय की इच्छाएँ (काम वासना), मद, मार्ग, लोक (जनता), पति, पत्नी आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिये । इस सातवें स्थान को ‘द्यूत’ तथा ‘जामित्र’ भी कहते हैं । सूर्य अस्त के समय, पूर्व क्षितिज लग्न राशि से सातवें घर में रहता है इस कारण सप्तम स्थान की ‘अस्त’ संज्ञा भी है। (८) मांगल्य (स्त्री का सौभाग्य—पति का जीवित रहना), रंध्र (छिद्र), आधि (मानसिक बीमारी-चिन्ता) अपमान या हार, आयु (कितने वर्ष मनुष्य ज़िन्दा रहेगा) क्लेश, बदनामी, मृत्यु, विघ्न, अशुचि (अपवित्रता या मरने के कारण सूतक) दास (गुलामों) का विचार अष्टम स्थान से करना चाहिये । गुदा का विचार भी अष्टम से किया जाता है। अष्टम में मंगल प्रायः बवासीर का रोग करता है । (९) आचार्य (गुरु), देवता (आराध्य देव), पिता, पूजा, पूर्वभाग्य (तप, सत्कर्म) पौत्र, उत्तम वंश आदि का विचार नवम भाव से करना चाहिये । इस को शुभ स्थान भी कहते हैं। दक्षिण भारत में नवें घर से पिता का विचार किया जाता है किंतु उत्तर भारत में दसवें घर से पिता का विचार करते हैं ।