भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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२८ फलदीपिका (१०) व्यापार उच्च स्थान (पोजीशन) इज्जत, कर्म, जय, यश, यज्ञ, जीविका का उपाय, कार्य में अभिरुचि, आचार (सदाचार या दुराचार) गमन, हुकूमत, गुण, आकाश आदि का विचार दसवें घर से करे। इसे ‘मेषूरण’ या आज्ञा स्थान भी कहते हैं। -(११) लाभ, आमदनी, प्राप्ति, आगमन, सिद्धि, वैभव (धन, ऐश्वर्य) कल्याण, श्लाघ्यता—प्रशंसा, बड़ा भाई या बड़ी बहन, बायाँ कान, सरसता, अच्छी खबर आदि का विचार ग्यारहवें घर से करे। (१२) दुःख, पैर, बायाँ नेत्र, ह्रास, चुगलखोर, अन्त (किसी का आखिरी परिणाम), दरिद्रता, पाप, शयन (पलंग पर शयन करना— इसके अतिरिक्त पुरुष स्त्री गुप्त संबंध भी समझना चाहिये), खर्चा, बन्धन (जेल जाना) आदि का विचार बारहवें स्थान से करें। बारहवें घर को 'व्यय' स्थान या “रिःफ" भी कहते हैं। तीसरे, छठे, आठवें तथा बारहवें घर को 'लीन' स्थान कहते हैं। 'लीन' का अर्थ है छिपा हुआ। आठवां सब से निकृष्ट समझा जाता है। ६ठे, ८वें तथा १२वें स्थान को 'त्रिक' भी कहते हैं ॥ १०-१६ ॥ दुःस्थानमष्टमरिपुव्ययभावमाहुः सुस्थानमन्यभवनं शुभदं प्रदिष्टम् । प्राहुर्विलग्नदशसप्तचतुर्थभानि केन्द्रं हि कण्टकचतुष्टयनामयुक्तम् ॥ छठे, आठवें तथा बारहवें घरों को 'दुःस्थान' कहते हैं। दुःस्थान का अर्थ है खराब स्थान। अन्य स्थान १, २, ३, ४, ५, ७, ९, १०, ११ शुभ स्थान हैं। वे शुभ फल करते हैं। जन्मकुंडली में लग्न, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम स्थानों को ‘केन्द्र’ कहते हैं। केन्द्र को ‘कंटक’ या ‘चतुष्टय’ भी कहते हैं ॥ १७ ॥ पणफरमिति केन्द्रादूर्ध्वमापोक्लिमन्तत्- परमथ चतुरस्रं नैधनं बन्धुभं च ।