फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
DevanagariHindipublished684 पृष्ठ
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प्रथम अध्याय : राशि भेद २९ अथ समुपचयानि व्योमशौर्यारिलाभा नवमसुतभयुग्मं स्यात् त्रिकोणं प्रशस्तम् ॥१८॥ जन्म लग्न से द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एकादश स्थानों को 'पणफर' कहते हैं तथा तृतीय, षष्ठ, नवम और द्वादश स्थानों को 'आपोक्लिम' । चौथे तथा आठवें घर को 'चतुरस्र' कहते हैं । तृतीय, छठे, दसवें तथा ग्यारहवें घर का 'उपचय' नाम है । पाँचवें तथा नवें घर को 'त्रिकोण' कहते हैं । त्रिकोण स्थान बहुत उत्तम माने गये हैं । त्रिकोण में शुभ ग्रह बैठे तो और भी शुभ फल दिखलाता है । त्रिकोण का स्वामी भी अपनी दशा, अन्तर्दशा में शुभ फल दिखाता है ॥ १८ ॥