भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 684 में से

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दूसरा अध्याय ग्रह भेद अब इस अध्याय के प्रारंभ में सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिये—किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है । प्रथम अध्याय में यह बता चुके हैं कि किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिये, इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिये । उदाहरण के लिये यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिये । यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई । परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है ? मान लीजिये दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है । जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें धनेश का प्रभाव दिखावेगा —यह उचित ही है परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण, धर्म क्या है ? ग्रहों के जो स्वाभाविक गुण, धर्म हैं, जिन वस्तुओं के वे कारक हैं—वह नीचे के श्लोकों में बताया जाता है । ताम्रं स्वर्णं पितृशुभफलं चात्मसौख्यप्रतापं धैर्यं शौर्यं समितिविजयं राजसेवां प्रकाशम् । शैवं कार्यं वनगिरिगतिं होमकार्यप्रवृत्ति देवस्थानं कथयतु बुधस्तैक्ष्ण्यमुत्साहमर्कात् ॥१॥ मातुः स्वस्ति मनःप्रसादमुदधिस्नानं सितं चामरं छत्रं सुव्यजनं फलानि मृदुलं पुष्पाणि सस्यं कृषिम् । कीर्तिं मौक्तिककांस्यरौप्यमधुरक्षीरादिवस्त्राम्बुगो- योषाप्ति सुखभोजनं तनुसुखं रूपं वदेच्चन्द्रतः ॥२॥

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