भारतकोश
संग्रह पर लौटें

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

दूसरा अध्याय ग्रह भेद अब इस अध्याय के प्रारंभ में सबसे पहले यह बताते हैं कि किस ग्रह से क्या विचार करना चाहिये—किस वस्तु का कौन-सा ग्रह कारक है । प्रथम अध्याय में यह बता चुके हैं कि किस भाव से क्या-क्या विचार करना चाहिये, इससे यह भी सिद्ध होता है कि जो बात भाव से विचार की जावे वह भाव के स्वामी से भी विचार करना चाहिये । उदाहरण के लिये यदि छठे भाव से शत्रु का विचार किया जाता है तो छठे भाव के स्वामी से भी शत्रु का विचार करना चाहिये । यह तो भाव का मालिक होने के कारण उस ग्रह में विशेषता आई । परन्तु उसका अपना साधारण गुण क्या है ? मान लीजिये दस आदमियों की कुण्डली में सूर्य अलग-अलग दस भावों का स्वामी है । जिसमें लग्न का स्वामी है उसमें लग्नेश का प्रभाव दिखावेगा, जिसमें धन स्थान का स्वामी है उसमें धनेश का प्रभाव दिखावेगा —यह उचित ही है परन्तु सूर्य का अपना स्वाभाविक गुण, धर्म क्या है ? ग्रहों के जो स्वाभाविक गुण, धर्म हैं, जिन वस्तुओं के वे कारक हैं—वह नीचे के श्लोकों में बताया जाता है । ताम्रं स्वर्णं पितृशुभफलं चात्मसौख्यप्रतापं धैर्यं शौर्यं समितिविजयं राजसेवां प्रकाशम् । शैवं कार्यं वनगिरिगतिं होमकार्यप्रवृत्ति देवस्थानं कथयतु बुधस्तैक्ष्ण्यमुत्साहमर्कात् ॥१॥ मातुः स्वस्ति मनःप्रसादमुदधिस्नानं सितं चामरं छत्रं सुव्यजनं फलानि मृदुलं पुष्पाणि सस्यं कृषिम् । कीर्तिं मौक्तिककांस्यरौप्यमधुरक्षीरादिवस्त्राम्बुगो- योषाप्ति सुखभोजनं तनुसुखं रूपं वदेच्चन्द्रतः ॥२॥

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३१ सत्त्वं भूफलितं सहोदरगुणं शौर्यं रणं साहसं विद्वेषं च महानसाग्निकनकज्ञात्यस्त्रचोरान्रिपून् । उत्साहं परकामिनीरतिमसत्योक्तिं महीजाद्वदे- द्वैर्यं चित्तसमुन्नतिं च कलुषं सेनाधिपत्यं क्षतम् ॥३॥ पाण्डित्यं सुवचः कलानिपुणतां विद्वत्स्तुतिं मातुलं वाक्चातुर्यमुपासनादिपटुतां विद्यासु युक्तिं मतिम् । यज्ञं वैष्णवकर्म सत्यवचनं शुक्तिं विहारस्थलं शिल्पं बान्धवयौवराज्यसुहृदस्तद्भागिनेयं बुधात् ॥४॥ ज्ञानं सद्गुणमात्मजं च सचिवं स्वाचारमाचार्यकं • माहात्म्यं श्रुतिशास्त्रधीस्मृतिमतिं सर्वोन्नतिं सद्गतिम् । देवब्राह्मणभक्तिमध्वरतपःश्रद्धाश्च कोशस्थलं वैदुष्यं विजितेन्द्रियं धवसुखं संमानमीड्याद्वदेत् ॥५॥ संपद्वाहनवस्त्रभूषणनिधिद्रव्याणि तौर्यत्रिकं भार्यासौख्यसुगन्धपुष्पमदनव्यापारशय्यालयान् । श्रीमत्त्वं कवितासुखं बहुवधूसङ्गं विलासं मदं साचिव्यं सरसोक्तिमाह भृगुजादुद्वाहकर्मोत्सवम् ॥६॥ आयुष्यं मरणं भयं पतिततां दुःखावमानामयान् दारिद्र्यं भृतकापवादकलुषाण्याशौचनिन्द्यापदः । स्थैर्यं नीचजनाश्रयं च महिषं तन्द्रीमृणं चायसं दासत्वं कृषिसाधनं रविसुतात्कारागृहं बन्धनम् ॥७॥ तांबा, सोना, पिताः, शुभ फल, (अर्थात् अपना शुभ), धैर्य, शौर्य,

३२ फलदीपिका (पराक्रम) युद्ध में विजय, आत्मा, सुख, प्रताप, राजसेवा, शक्ति, प्रकाश, भगवान शिव सम्बन्धी कार्य, वन (जंगल) या पहाड़ में यात्रा, होम (हवन) कार्य में प्रवृत्ति, देवस्थान (मन्दिर) तीक्ष्णता, उत्साह आदि का विचार बुद्धिमान् मनुष्य सूर्य से करे। अर्थात् सूर्य उपर्युक्त का कारक है ॥ १ ॥ माता का कुशल, चित्त की प्रसन्नता, समुद्र स्नान, सफ़ेद चंवर (या सफ़ेद वस्तु और चंवर) छत्र, सुन्दर पंखे (राज चिह्न) फल, पुण्य, मुलायम वस्तु, खेती, अन्न, कीर्ति (यश), मोती, चाँदी, काँसा, दूध, मधुर पदार्थ, वस्त्र, जल, गाय, स्त्री प्राप्ति, सुखपूर्वक भोजन, रूप (सुन्दरता) —इनके सम्बन्ध का फलादेश चन्द्रमा से कहना चाहिये। चन्द्रमा इन सब का कारक है ॥ २ ॥ अब यह बताते हैं कि मंगल से किन-किन वस्तुओं का विचार करे । सत्व (शारीरिक और मानसिक ताक़त) पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, भाई-बहिनों के गुण (भाई-बहिनों का सुख कैसा रहेगा ) क्रूरता, रण, साहस, विद्वेष (शत्रुता) रसोई की अग्नि, सोना, ज्ञाति (जाति के लोग—दायाद) अस्त्र, चोर, शत्रु, उत्साह, दूसरे पुरुष की स्त्री में रति, मिथ्या भाषण, वीर्य (ताक़त, पराक्रम) चित्त की समुन्नति (चित्त का उत्साह, उदारता; बहादुरी या ऊंचापन), कालुष्य (पाप या बुरा काम) व्रण (घाव), चोट, सेनाधिपत्य आदि का विचार मंगल से करें ॥ ३ ॥ बुध किन बातों पर विशेष प्रभाव डालता है या यों कहिये कि बुध किन वस्तुओं का विशेष अधिष्ठाता है ? पाण्डित्य, अच्छी वाक् शक्ति (बोलने की शक्ति), कला, निपुणता, विद्वानों द्वारा स्तुति, मामा, वाक्- चातुर्य, उपासना आदि में पटुता (चतुरता), विद्या में बुद्धि का योग, बुद्धि (बुद्धिमान होना अलग बात है और विद्या में बुद्धि लगाये रहना पृथक् बात है ) यज्ञ, भगवान विष्णु सम्बन्धी धार्मिक कार्य, सत्य वचन, सीप, विहार स्थल (आमोद-प्रमोद की जगह), शिल्प (तथा

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३३

शिल्प कार्य में चतुरता), बन्धु, युवराज, मित्र, भानजा, भानजी आदि का विचार बुध से करें ॥ ४ ॥ अब बृहस्पति किन-किन का कारक है यह बताते हैं : ज्ञान : अच्छे गुण, पुत्र, मंत्री, अच्छा आचार (आचरण), या अपना आचरण (चरित्र, कार्य), आचार्यत्व (पढ़ाना या दीक्षा देना) माहात्म्य (आत्मा का महान् होना) श्रुति (वेद) शास्त्र, स्मृति आदि का ज्ञान, सब की उन्नति, सद्गति, देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति, यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा, खज़ाना, विद्वत्ता, जितेन्द्रियता, सम्मान, दया आदि का विचार बृहस्पति से करें । विशेष यह है कि यदि स्त्री की जन्मकुण्डली का विचार करना हो तो पति सुख का विचार भी बृहस्पति से करना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्पत्ति, सवारी, वस्त्र, भूषण, निधि¹ में रखे हुए द्रव्य, तौर्यत्रिक (नाचने, गाने तथा बाजे का योग), सुगन्धि, पुष्प, रति (स्त्री, पुरुष प्रसंग), शय्या (पलंग) और उससे सम्बन्धित व्यापार, मकान, धनिक होना, अर्थात् वैभव, कविता का सुख, विलास, मंत्रित्व (मिनिस्टर होना), सरस उक्ति, विवाह या अन्य शुभ कर्म, उत्सव आदि का विचार शुक्र से करें । विशेष यह है कि यदि पुरुष की जन्मकुण्डली हो तो स्त्री सुख का विचार भी शुक्र से करना चाहिये—अपनी विवाहिता पत्नी से कैसा सुख है और विवाहिता के अतिरिक्त—अन्य स्त्रियों का उपभोग कैसा होगा ।—जिस तरह श्लोक ५ में बताया गया है कि बृहस्पति पति कारक है उसी तरह श्लोक ६ में यह बताया है कि शुक्र स्त्री कारक है। फल- दीपिका के इस अध्याय में जो स्थिरकारक बताये हैं उनका फलादेश में बड़ा महत्त्व है । जो ज्योतिषी स्थिर कारक का विचार नहीं करते वह फलादेश में बहुत भूल कर बैठते हैं। एक सज्जन ने हमें जन्मकुण्डली दिखाई, कुंभ लग्न था । शुक्र की महादशा चल रही थी, उम्र करीब २२ वर्ष के लगभग थी । करीब २४वें वर्ष में सूर्य की महादशा प्रारम्भ होती थी। उन्हें १. ज़मीन के अन्दर गड़ा हुआ या संग्रह किया हुआ द्रव्य ।

३४ फलदीपिका कई ज्योतिषियों ने यह बताया था कि सूर्य सप्तमेश है इस कारण सूर्य की महादशा लगने पर विवाह होगा किन्तु हमने शुक्र स्त्री कारक होता है इस आधार पर शुक्र में ही विवाह कहा था और हमारा फलादेश ठीक बैठा। कहने का तात्पर्य यह है कि केवल भावेश के भंवर में पड़कर भूल में न पड़ना चाहिये। किसी भी स्थान का स्वामी बृहस्पति हो और यदि अच्छे स्थान पर पड़ा है और उसकी अन्तर्दशा है तो मनुष्य की युवावस्था में सन्तान दे जावेगा या सन्तान सम्बन्धी सुख देगा। शुक्र अच्छा पड़ा हो तो स्त्री सम्बन्धी विलास देगा ॥ ६ ॥ आयु, मरण, भय, पतन (किसी ऊंचे स्थान से गिरना या सम्मान- च्युत होना, जातिच्युत आदि होना), अपमान, बीमारी, दुःख, दरिद्रता, बदनामी, पाप, मज़दूरी, अपवित्रता, निन्दा, आपत्ति, कलुषता (मन का साफ न होना, निन्दा, निन्दित कर्म आदि) आपत्ति, मरने का सूतक, स्थिरता, नीच व्यक्तियों का आश्रय, भैंस, तन्द्रा (आलस्य, ऊँघना) कर्ज़, लोहे की वस्तु, नौकरी, दासता, जेल जाना, गिरफ्तार होना, खेती के साधन आदि का विचार शनि महाराज से करें । ७ ॥ पित्तास्थिसारोऽल्पकचश्च रक्तश्यामाकृतिः स्यान्मधुपिङ्गलाक्षः । कौसुम्भवासाश्चतुरस्रदेहः शूरः प्रचण्डः पृथुबाहुरर्कः ॥८॥ स्थूलो युवा च स्थविरः कृशः सितः कान्तेक्षणश्चासितसूक्ष्ममूर्धजः । रक्तैकसारो मृदुवाक् सितांशुको गौरः शशी वातकफात्मको मृदुः ॥ मध्ये कृशः कुञ्चितदीप्तकेशः क्रूरेक्षणः पैत्तिक उग्रबुद्धिः । रक्ताम्बरो रक्ततनुर्महीजश्चण्डोऽत्युदारस्तरुणोऽतिमज्जः ॥१०॥ दूर्वालताश्यामतनुस्त्रिधातुमिश्रः सिरावान्मधुरोक्तियुक्तः । रक्तायताक्षो हरितांशुकस्त्वक्सारो बुधो हास्यरुचिः समाङ्गः ॥

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३५ पीतद्युतिः पिङ्गरुचेक्षणः स्यात् पीनोन्नतोराश्च बृहच्छरीरः । कफात्मकः श्रेष्ठमतिः सुरेड्यः सिंहाब्जनादश्च वसुप्रधानः ॥१२॥ चित्राम्बराकुञ्चितकृष्णकेशः स्थूलाङ्गदेहश्च कफानिलात्मा । दूर्वाङ्कुराभः कमनो विशालनेत्रो भृगुः साधितशुक्लवृद्धिः ॥१३॥ पङ्गुर्निम्नविलोचनः कृशतनुर्दीर्घः सिरालोऽलसः कृष्णाङ्गः पवनात्मकोऽतिपिशुनः स्नाय्वात्मको निर्घृणः । मूर्खः स्थूलनखद्विजः परुषरोमाङ्गोऽशुचिस्तामसो रौद्रः क्रोधपरो जरापरिणतः कृष्णाम्बरो भास्करिः ॥१४॥ अब प्रत्येक ग्रह का स्वरूप और उसकी प्रकृति बताते हैं। इसका प्रयोजन क्या है ? यदि लग्न में कोई ग्रह हो तो उसी ग्रह के गुण और प्रकृति के अनुसार जातक की प्रकृति होती है । जिसके लग्न में मंगल है उसकी प्रकृति में उग्रता, साहस, रणप्रियता आदि गुण आवेंगे । किस राशि में स्थित होकर लग्न में मंगल है इसका भी बहुत प्रभाव पड़ेगा । यदि बलवान् मंगल है तो शूरवीर सेनापति होकर लड़ सकता है, यदि दुर्बल पाप पीड़ित मंगल है तो कुंजड़ों की-सी लड़ाई मोल ले सकता है । जब लग्न में कोई ग्रह नहीं होता है तो लग्नेश की तरह मनुष्य की आकृति, प्रकृति, गुण, स्वभाव आदि होते हैं । इस कारण प्रत्येक ग्रह की प्रकृति, स्वभाव आदि जानना आवश्यक है । जो ग्रह लग्न को देखते हैं वह भी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार जातक को प्रभावित करते हैं । इसके अतिरिक्त जो ग्रह रोग पीड़ित या बीमार करता है उसी ग्रह की प्रकृति और दोष जनित रोग होगा । उदाहरण के लिये सूर्य पित्त रोग करेगा तो शनि वायु रोग । इन्हीं सब बातों को समझने के लिये सातों ग्रहों के गुण, प्रकृति, स्वभाव आदि नीचे बताये जाते हैं । सूर्य की पित्त प्रकृति होती है, इसकी अस्थियाँ (हड्डियाँ) दृढ़ होती

३६ फलदीपिका हैं, थोड़े केश (सिर के बाल) होंगे । इसकी आकृति रक्त-श्याम (कुछ स्याही लिये हुए लाल) होती है । इसके नेत्र की पुतलियाँ शहद की तरह कुछ भूरापन और ललाई लिये हुए; इसकी आकृति चौकोर है; इसकी भुजायें विशाल हैं; यह लाल वस्त्र धारण किये हुए है; स्वभाव ' से सूय शूर और प्रचण्ड है ॥ ८ ॥ चन्द्रमा का स्थूल (बड़ा) शरीर है । वह युवावस्था का भी है और प्रौढ़ावस्था का भी है; उसका शरीर सफेद और कमजोर¹ है; उसके सिर के केश सूक्ष्म और काले हैं; उसके नेत्र बहुत सुन्दर हैं; उसके शरीर में रक्त की प्रधानता है; अर्थात् शरीर रक्त-प्रवाह पर चन्द्रमा का आधिपत्य है । चन्द्रमा की वाणी मृदु है और गौर वर्ण वाला सफ़ेद वस्त्र पहनने वाला है । यह मृदु (मुलायम) है—शरीर से भी, स्वभाव से भी । त्रिदोषों में कफ और वात पर इसका विशेष अधिकार है अर्थात् चन्द्रमा अपनी अन्तर्दशा में वात रोग या कफ रोग या वातकफात्मक रोग उत्पन्न करेगा ॥ ९ ॥ मंगल मध्य में कृश है अर्थात् उसकी पतली कमर है; इसके सिर के केश घुंघराले और चमकीले हैं; इसकी दृष्टि में क्रूरता है और स्वभाव से भी उग्र बुद्धि है । यह पित्त प्रधान है । लाल वस्त्र धारण किये हुए और इसके शरीर का भी वर्ण लाल ही है । यह स्वभाव से प्रचण्ड है किन्तु अति उदार है; शरीर के मज्जा भाग पर इसका विशेष अधिकार है (इसका आशय यह हुआ कि जिसकी जन्मकुण्डली में मंगल बलवान् है उसके शरीर की मज्जा बलवान् होगी; जिसका मंगल निर्बल है उसकी मज्जा निर्बल होगी) मंगल तरुण अवस्था का है (इसका आशय यह हुआ कि यदि किसी मनुष्य की जन्मकुण्डली में बलवान् मंगल लग्न में १. चन्द्रमा को स्थूल भी कहा है; कृश भी कहा है; प्रतीत होता है पक्ष बल अधिक होने से स्थूल शरीर होगा, पक्ष बल कम होने से कृश शरीर होगा ।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ३७ पड़ा है तो वह पचास वर्ष की अवस्था में भी ३० वर्ष के समान प्रतीत होगा ॥ १० ॥ अब बुध का स्वरूप तथा प्रकृति बतलाते हैं। बुध के शरीर की कान्ति नवीन दूब के समान है। इसमें वात, पित्त, कफ, त्रिदोषों का सम्मिश्रण है। इसका आशय यह है कि जन्मकुण्डली में बुध यदि पीड़ित हो तो अपनी दशा-अन्तर्दशा में वायु से उत्पन्न, कफ से उत्पन्न तथा पित्त से उत्पन्न तीनों प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकता है। यह नसों से युक्त हैं (कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर में जो स्नायु मंडल है—जिसे अंग्रेजी में नर्वस सिस्टम कहते हैं उसका अधिष्ठाता बुध है। यदि बुध पीड़ित होतो नर्वस सिस्टम में खराबी होगी।) बुध स्वभाव से मधुर वाणी बोलने वाला होता है। इसके शरीर के अंग बराबर हैं अर्थात् सुडौल हैं। जो जितना बड़ा होना चाहिये वह अंग वैसा ही है। बुध मज़ाकपसंद है। जिन स्त्रियों या पुरुषों की कुण्डलियों में बुध चन्द्रमा से युक्त होता है वे मज़ाकपसंद होते हैं। कोई-न-कोई तमसखुर की बात बोलते रहते हैं। जिस प्रकार मंगल में मज्जा प्रधान है इसी प्रकार बुध त्वचा प्रधान है। त्वचा शरीर के सबसे ऊपर की जिल्द (खाल) को कहते हैं। बुध अच्छा होने से त्वचा अच्छी होगी, बुध पापाक्रान्त होने से त्वचा के रोग होंगे। बुध के नेत्र लंबाई लिये हैं और वह हरे वस्त्र धारण करता है। यह बुध का स्थूल परिचय है; अब बृहस्पति के विषय में कहते हैं ॥ ११ ॥ बृहस्पति का पीला वर्ण है किन्तु नेत्र और सिर के बाल कुछ भूरापन लिये हुए हैं। इसकी छाती पुष्ट और ऊंची है और बड़ा शरीर है। यह कफ प्रधान है। वैद्यक शास्त्र में कफ प्रकृति वालों में जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस व्यक्ति में घटित होंगे जिसकी कुण्डली में बलवान् बृहस्पति लग्न में होगा या बलवान् होकर नवांश का स्वामी है। बृहस्पति बलवान् होने से मनुष्य बहुत बुद्धिमान् होता है; बुध से भी बुद्धि देखी जाती है और बृहस्पति से भी। तब दोनों से ही बुद्धि का विचार किया जावे तो तारतम्य क्या होगा ? बुध से किसी बात को शीघ्र समझ लेना, किसी विषय का

४० फलदीपिका प्रकार सकेत मात्र से श्लोकों में बातें बतायी गई हैं । जन्मकुण्डली में या प्रश्नकुण्डली में अपनी बुद्धि से ऊहापोह द्वारा इन बताई हुई बातों का उपयोग करना चाहिये । चन्द्रमा के स्थान निम्नलिखित हैं :—दुर्गा जी का मन्दिर, जिस कमरे में स्त्री या स्त्रियां रहती हों, ऐसा स्थान जहाँ जल, औषधि (जड़ी, बूटी आदि) शहद, या शराब हो । चन्द्रमा पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशा का स्वामी है । अब मंगल के विषय में कहते हैं कि युद्ध भूमि, जहां अग्नि हो, या जहां चोर और म्लेच्छ रहते हों, इनका आधिपत्य मंगल का है। मंगल दक्षिण दिशा का स्वामी है । बुध निम्नलिखित स्थानों का अधिपति है :—जहां विष्णु मन्दिर हो, जहां विद्वान् लोग बैठते हों, आमोद-प्रमोद का स्थान, जहां ज्योतिषी या गणित कर्ता बैठते हों । बुध की दिशा उत्तर है । अब बृहस्पति के स्थान बताते हैं । खजाना, पीपल का वृक्ष, देवताओं और ब्राह्मणों के रहने का स्थान—इनका अधिपति बृहस्पति है । यह ईशान (पूर्वोत्तर) दिशा का स्वामी है । अब शुक्र के विशेष स्थान बताते हैं—वेश्याओं के घर, जहां पर्दे में स्त्रियों को रखा जाता हो, शयन स्थान, नाचने की जगह । शुक्र आग्नेय (पूर्व-दक्षिण) दिशा का स्वामी है । शनि के स्थान निम्नलिखित हैं—जहां नीची श्रेणी के लोग रहते हों, शास्ता१ का मन्दिर, अपवित्र स्थान, यह शनि के रहने के स्थान हैं। यह पश्चिम दिशा का स्वामी है । अब राहु, केतु के स्थान बताते हैं । वल्मीक (दीमक के कीड़ों द्वारा बनाया हुआ जंगल में उच्च स्थान) जहां सांप रहते हों, ऐसे छिद्र जिनमें अन्धेरा हो, राहु केतु पश्चिम- दक्षिण (नैऋत्य) दिशा के स्वामी होते हैं ॥ १५ ॥ १६ ॥ शैवो भिषङ्नृपतिरध्वरकृत्प्रधानी व्याघ्रो मृगो दिनपतेः किल चक्रवाकः शास्ताङ्गनारजककर्षकतोयगाः स्यु- रिन्दोः शशश्च हरिणश्च बकश्चकोरः ॥१७॥ १. देवता विशेष ।

? मेंढ़ा. In Hindi, मेंढ़ा.

Line 24: बुध—ग्वाला, विद्वान् आदमी, शिल्पी, उत्तम हिसाब करने वाला Wait, विद्वान् has halanta: विद्वान्.

Line 25: या ज्योतिषी विष्णु भक्त, गरुड़, चातक, तोता तथा बिल्ली । Wait, विष्णु भक्त or विष्णुभक्त? There is a space: विष्णु भक्त.

Let's double-check all line numbers and exact lines from top to bottom.

Page content lines: दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४१ भौमो महानसगतायुधभृत्सुवर्ण- ˙काराजकुकुटशिवाकपिगृध्रचोराः । Wait, L3: is there a quote mark or apostrophe or dot? It looks like ' or ˙. In printing, sometimes a stray mark or opening quote: ‘काराज.... But often it's an ink speck. Let's look at other places. There are a few tiny ink specks (like on L11 near स्युः). Wait, could it be an avagraha? No, सुवर्ण- ends L2, L3 starts with काराज... because the word was सुवर्णकाराज.... Wait, why would there be a mark? In some books, a hyphen is at the

४२ फलदीपिका बृहस्पति—ज्योतिषी, मन्त्री, गुरु, ब्राह्मण, सन्यासी¹, मुख्य पुरुष, कबूतर, घोड़ा, हंस । शुक्र—गाने वाला, धनी, वैश्य (सौदागर), व्यभिचारी या कामी पुरुष, नट, कपड़ा बुनने वाला, वेश्या, मोर, गाय, भैंस, तोता । शनि—तेल बेचने व खरीदने वाला, नौकर, नीच पुरुष, शिकारी, लुहार, हाथी, कौआ, कोयल । राहु केतु—बौद्ध, सांप पकड़ने वाला, गधा, मेंढ़ा, भेड़िया, ऊंट, सांप, मच्छर, खटमल, कीड़े मकोड़े, उल्लू, ऐसा स्थान जहां अन्धेरा रहता हो । ऊपर जो विविध ग्रहों से सम्बन्धित जानवर, पदार्थ, व्यवसाय, वस्त्र या स्थान का उल्लेख किया गया है इसको विस्तारपूर्वक समझाने के लिये बहुत स्थान चाहिये केवल एक उदाहरण देकर इसका उपयोग बताया जाता है । मान लीजिये किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में बलवान् शुक्र की महादशा प्रारंभ हो रही हो तो ऊपर जो शुक्र से सम्बन्धित--शुक्र के व्यक्ति किंवा वस्तु का निर्देश किया गया है उनसे लाभ होगा । अनेक वस्तुओं में से किस से ? यदि देहात का रहने वाला खेतिहर है तो सम्भवतः गायों से लाभ हो जाय—यदि बम्बई में रहने वाला सिनेमा लाइन का बड़ा डाइरेक्टर है तो वेश्याओं को नौकर रखकर नवीन चलचित्र बनाने से लाभ हो जावे । यह सब ग्रह के साथ-साथ परिस्थिति और सम्भावना देखकर कहना चाहिये ॥ १७-२० ॥ सौम्यः समोऽर्कजसितावहितौ खरांशो- रिन्दोर्हितौ रविबुधावपरे समाः स्युः । भौमस्य मन्दभृगुजौ तु समौ रिपुर्ज्ञः सौम्यस्य शीतगुररिः सुहृदौ सितार्कौ ॥२१॥ १. बहुत-से टीकाकार मुख्य सन्यासी यह अर्थ करते हैं परन्तु हम उनसे सहमत नहीं ।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४३ सुरेद्धिषौ कविबुधौ रविजः समः स्या- न्मध्यौ कवेर्गुरुकुजौ सुहृदौ शनिज्ञौ । जीवः समः सितविदौ रविजस्य मित्रे ज्ञेया अनुक्तखचरास्तु तदन्यथा स्युः ॥२२॥ इन दो श्लोकों में यह बताया गया है कि किस ग्रह के कौन मित्र हैं; कौन शत्रु हैं और कौन से न शत्रु न मित्र । जो न मित्र होते हैं न शत्रु होते हैं उन्हें ज्योतिष में "सम" कहते हैं ।

ग्रहमित्रसमशत्रु
सूर्यचं० मं० वृ०बु०शु० श०
चन्द्रसू० बु०मं० वृ० शु०श०
मंगलसू० चं० वृ०शु० श०बु०
बुधसू० शु०मं० वृ० श०चं०
बृहस्पतिसू० चं० मं०श०बु० शु०
शुक्रबु० श०मं० वृ०सू० चं०
शनिबु० शु०वृ०सू० चं० मं०
यह नैसर्गिक मैत्री चक्र है अर्थात् स्वभाव से कौन ग्रह किसका मित्र
होता है कौन किसका शत्रु आदि । अब आगे के श्लोक में यह बतावेंगे कि
किसी जन्मकुण्डली में कोई दो ग्रह आपस में मित्र हैं या शत्रु यह कैसे
देखना ॥ २१-२२ ॥
अन्योन्यं त्रिसुखस्वलान्त्यभवगास्तत्कालमित्राण्यमी
तन्नैसर्गिकमप्यवेक्ष्य कथयेत्तस्यातिमित्राहितान् ।
शौर्याज्ञे रविजो गुरुर्गुरुसुतौ भौमश्चतुर्थाष्टमौ
पूर्णं पश्यति सप्तमं च सकलास्तेष्वंध्रिवृद्ध्या क्रमात् ॥२३॥
ऊपर नैसर्गिक या स्वाभाविक मैत्री बतलाने के बाद अब तात्कालिक

४४ फलदीपिका

मैत्री बताते हैं। जिस ग्रह का विचार करना हो उससे द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, दशम, एकादश, द्वादश स्थान में जो ग्रह होते हैं वे उसके मित्र होते हैं तथा विचारणीय ग्रह से जो ग्रह प्रथम (उसी राशि में) पाँचवें, छठ, सातवें, आठवें, नवें, घर होता है वह उसका शत्रु होता है। यह दो प्रकार की मैत्री देखने के बाद यह नतीजा निकालना चाहिये कि परिणामतः वे मित्र हुए, सम या शत्रु । (१) जो नैसर्गिक तथा तात्कालिक दोनों प्रकार से मित्र हों वे अधिमित्र (अत्यन्त मित्र) हुए । (२) जो दोनों प्रकार से शत्रु हुए वे अधिशत्रु (अत्यन्त शत्रु) हुए। (३) जो एक जगह मित्र और एक जगह शत्रु, वे सम (न शत्रु न मित्र ) हुए । (४) जो एक जगह मित्र और दूसरी जगह सम वे मित्र हुए । (५) जो एक जगह शत्रु और दूसरी जगह सम वे शत्रु हुए। इस प्रकार जन्मकुण्डली में मित्रामित्र चक्र बनाकर देखना चाहिये। इसका प्रयोजन क्या ? जो अधिमित्र या मित्र के घर में होता है वह शुभ फल देता है। क्रूर हो तो भी उतना खराब फल नहीं देता। जो शत्रु या अधिशत्रु के घर में हो वह अच्छा फल नहीं देता, वह यदि शुभ ग्रह हो तो भी उतना अच्छा फल नहीं देता। क्रूर ग्रह हो तो भी बहुत ही खराब फल देगा।

ग्रहों की दृष्टि—कौन-सा ग्रह किस स्थान को किस दृष्टि से देखता है यह नीचे के चक्र में बताया जाता है।

दृष्टिचक्र पूर्ण त्रिपाद आधी चौथाई सूर्य ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० चन्द्र ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० मंगल ४, ८, ७ ५, ९ ३, १०

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४५ पूर्ण त्रिपाद आधी चौथाई बुध ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० बृहस्पति ५, ७, ९ ४, ८ ३, १० शुक्र ७ ४, ८ ५, ९ ३, १० शनि ३, १०, ७ ४, ८ ५, ९ सूर्य की सातवें स्थान पर पूर्ण दृष्टि होती है ; चौथे और आठवें स्थान पर तीन चौथाई, पांचवें और नवें स्थान पर आधी तथा तीसरे और दसवें स्थान पर एक चौथाई । इसी प्रकार दिये गये चक्र के अनुसार अन्य ग्रहों के विषय में समझना चाहिये ॥ २३ ॥ सूर्यादेरयनं क्षणो दिनमृतुर्मासश्च पक्षः शर- द्विप्रौ शुक्रगुरू रविक्षितिसुतौ चन्द्रो बुधोऽन्त्यः शनिः । प्राहुः सत्त्वरजस्तमांसि शशिगुर्वर्काः कविज्ञौ परे ˙ ग्रीष्मादर्ककुजौ शशी शशिसुतो जीवः शनिर्भार्गवः ॥२४॥ ग्रहों के स्वरूप और लक्षण कुछ तो पहले बताये गये हैं और कुछ नीचे बताये जाते हैं । प्रत्येक ग्रह कितने काल का अधिष्ठाता है उसकी जाति क्या है; सतोगुणी है या रजोगुणी या तमोगुणी और किस ऋतु के वे अधिष्ठाता हैं यह नीचे के चक्र से स्पष्ट होगा । ग्रह काल जात¹ गुण ऋतु सूर्य आधा वर्ष क्षत्रिय सात्विक ग्रीष्म चन्द्र २ घड़ी वैश्य सात्विक वर्षा मंगल एक दिन क्षत्रिय तामसिक ग्रीष्म बुध दो महीना शूद्र राजसिक शरद् बृहस्पति एक महीना ब्राह्मण सात्विक हेमन्त शुक्र १५ दिन ब्राह्मण राजसिक वसन्त शनि १ वर्ष म्लेच्छ तामसिक शिशिर १. बहुत-से ज्योतिष ग्रन्थ चन्द्रमा को ब्राह्मण, बुध को वैश्य मानते हैं ।

४६ फलदीपिका ताताम्बे रविभार्गवौ दिवि निशि प्राभाकरीन्दू स्मृतौ तद्व्यस्तेन पितृव्यमातृभगिनीसंज्ञौ तदा तत्क्रमात् । वामाक्षीन्दुरिनोऽन्यदक्षि कथितो भौमः कनिष्ठानुजो जीवो ज्येष्ठसहोदरः शशिसुतो दत्तात्मजः संज्ञितः ॥२५॥ अब यह बताते हैं कि किस-किस ग्रह से क्या-क्या और विचार करना चाहिये । सूर्य—यदि दिन में जन्म हो तो पितृ कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो चाचा का कारक । शरीर में दक्षिण नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है । चन्द्रमा—यदि रात्रि में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि दिन में जन्म हो तो चन्द्रमा से मौसी का विचार करें । शरीर में, बायें नेत्र पर इसका विशेष अधिकार है । मंगल—मंगल से छोटे भाई का विचार करना चाहिये । बुध—गोद लिया हुआ पुत्र (दत्तक पुत्र) । वृहस्पति—बड़ा भाई । शुक्र—यदि दिन में जन्म हो तो मातृ कारक, यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे मौसी का विचार करे । शनि—यदि दिन में जन्म हो तो चाचा का विचार इससे करे और यदि रात्रि में जन्म हो तो इससे पिता का विचार करे ॥ २५ ॥ देहो देही हिमरुचिरिनस्त्विन्द्रियाण्यारपूर्वा आदित्यद्विड्गुलिकशिखिनस्तस्य पीडाकराः स्युः । गन्धः सौम्यो भृगुजशशिनौ द्वौ रसौ सूर्यभौमौ रूपौ शब्दो गुरुरथ परे स्पर्शसंज्ञाः प्रदिष्टाः ॥२६॥ प्रत्येक ग्रहों से अनेक बातों का विचार किया जाता है । यहां कुछ और विषय बताये जाते हैं कि किसका विचार किससे किया जाय । सूर्य आत्मा है, चन्द्रमा शरीर है, मंगल आदि पांचों ग्रहों का पांचों

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४७ ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार है। सूर्य और मंगल तेज के अधिष्ठाता हैं और दृष्टि (देखने की शक्ति) पर इनका अधिकार है । चन्द्रमा और शुक्र का रसनेन्द्रिय पर विशेष अधिकार है क्योंकि यह दोनों जल तत्व के अधिष्ठाता हैं । बुध घ्राणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है । क्योंकि इसमें पृथ्वी तत्व अधिक है। बृहस्पति आकाश तत्व प्रधान होने से श्रवणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है। शनि, राहु और केतु वायु के अधिष्ठाता हैं और इनसे स्पर्श का विचार करना चाहिये । प्रयोजन क्या ? यदि बृहस्पति पीड़ित होगा तो मनुष्य बहरा हो जावेगा या कम सुनेगा। राहु, गुलिक और केतु सूर्य के शत्रु हैं इस कारण मनुष्य की आत्मा और शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं ॥२५॥ क्षीणेन्द्वर्ककुजाहिकेतुरविजाः पापाः सपापश्च वित् क्लीबाः केतुबुधार्कजाः शशितमःशुक्राः स्त्रियोऽन्ये नराः । रुद्राम्बागुहविष्णुधातृकमलाकालाह्वजा देवताः सूर्यादग्निजलाग्निभूमिखपयोवाय्वात्मकाः स्युर्ग्रहाः ॥२७॥ क्षीण चन्द्रमा सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि पाप ग्रह हैं। यदि बुध पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो पापी; यदि शुभ-ग्रह के साथ बैठा हो तो शुभ। ऊपर जो क्षीण चन्द्रमा, सूर्य आदि जिस क्रम से ग्रहों का नाम लिखा गया है उसी क्रम से उन्हें क्रमशः अधिकाधिक पापी समझना चाहिये । यह ग्रन्थकार का अभिप्राय मालूम होता है। बहुतों के मत से पापी केवल मंगल, शनि, राहु, केतु होते हैं। सूर्य क्रूर होता है पापी नहीं। बुध और चन्द्रमा स्वभावतः शुभ ग्रह हैं। बुध केतु और शनि नपुंसक हैं। चन्द्रमा राहु और शुक्र स्त्री ग्रह हैं । सूर्य, मंगल और बृहस्पति पुरुष ग्रह हैं। सूर्य का अग्नि तत्व है, इसका अधिष्ठाता देवता रुद्र है। चन्द्रमा का १. गुलिक शनि का बेटा है, यह कोई ग्रह नहीं है। इसका स्थान बदलता रहता है ।

४८ फलदीपिका जल तत्व । इसकी अधिष्ठात्री देवी अम्बा (पार्वती) । मंगल का अग्नि तत्व और देवता कार्तिक स्वामी । बुध का पृथ्वी तत्व और इसके अधिष्ठाता देव विष्णु हैं । बृहस्पति का आकाश तत्व और ब्रह्मा देवता । शुक्र का जल तत्व और अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी । शनि का वायु तत्व और देवता यम । राहु का अधिष्ठाता आदि शेष और केतु का ब्रह्मा है । राहु और केतु चमकने वाले ग्रह नहीं हैं; ये केवल स्थान विशेष हैं इस कारण इनके तत्व का निर्देश नहीं किया । वैसे शनि की तरह वात प्रभाव दिखाने के कारण वायु तत्व माना जा सकता है । ग्रहों के अधिष्ठाता देवता बताने का तात्पर्य यह है कि जिस ग्रह का नवें या पांचवें घर से सम्बन्ध हो उस ग्रह से सम्बन्धित देवता में भक्ति होगी । देखिये कल्याण वर्ष २८ संख्या ४ में हमारा लेख भगवद्भक्ति और नवग्रह । जिस ग्रह की महादशा अन्तर्दशा में रोग या पीड़ा हो उस ग्रह से सम्बन्धित देवता की आराधना से पीड़ा शीघ्र शान्त होगी । गोधूमं तण्डुलं वै तिलचणककुलुत्थाढकश्याममुद्गा निष्पावा माष अर्केन्द्वसितगुहशिखिक्रूरविद्भूग्वहीनाम् । भोगीनाक्यर्जरिजोवज्ञशशिशिखिसितेष्वम्बराख्यं कलिङ्गं सौराष्ट्रावन्तिसिन्धून्सुमगधयवनान्पर्वतान्कीकटाइंच ॥२८॥ माणिक्यं तरणेः सुधायममलं मुक्ताफलं शीतगो- र्माहेयस्य च विद्रुमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मतम् । देवेड्यस्य च पुष्परागमसुरामात्यस्य वज्रं शने- र्नीलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेधवैदूर्यके ॥२९॥ इसे श्लोकों में किस ग्रह का किस अन्न पर विशेष प्रभाव है और किस देश या प्रान्त विशेष पर विशेष अधिकार है—आदि बताते हैं ।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४९ सूर्य गेहूँ कलिंग माणिक चन्द्रमा चावल यवन स्वच्छ मोती मंगल मसूर अवन्ती मूंगा बुध मूंग मगध पन्ना बृहस्पति चना सिन्धु पुखराज शुक्र श्याम मूंग¹ कीकट हीरा शनि तिल सौराष्ट्र नीलम राहु उड़द अम्बर गोमेद केतु कुल्थी पर्वत लहसनिया भारतवर्ष एक महान् देश है, देश के किस भाग में मनुष्य की उन्नति होगी ? जो ग्रह कुण्डली में बलवान् हो वह जिस प्रदेश का, अधिष्ठाता है उसमें विशेष अभ्युदय की आशा है। जो ग्रह कुण्डली में निर्बल या पीड़ित है, उससे सम्बन्धित देश में मनुष्य का उत्थान नहीं होगा। अन्न विशेष का फलित में उपयोग यही होता है कि पीड़ा कारक ग्रह की दशा-अन्तर्दशा या अनिष्ट गोचर काल में उस ग्रह से सम्बन्धित अन्न का दान करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ ताम्रं कांस्यं धातुताम्रं त्रपु स्यात् स्वर्णं रौप्यं चायसं भास्करादेः । वस्त्रं तत्तद्वर्णयुक्तं विशेषाज्जीर्णं मन्दस्याग्निदग्धं कुजस्य ॥३०॥ भानोः कटुर्भूमिसुतस्य तिक्तं लावण्यमिन्दोरथ चन्द्रजस्य । मिश्रीकृतं यन्मधुरं गुरोस्तु शुक्रस्य चाम्लं च शनेः कषायः ॥ अब ग्रहों के धातु, वस्त्र विशेष तथा भोजन के किस प्रकार के स्वाद का कौन-सा ग्रह अधिष्ठाता है, यह बताया जाता है। १. श्याम मूंग या काले मूंग से किस अन्न से तात्पर्य है यह समझ में नहीं आता। अन्य ज्योतिष के ग्रंथों में शुक्र का अन्न श्वेत चावल लिखा है।

५० फलदीपिका ग्रह धातु वस्त्र स्वाद सूर्य तांबा केसरिया कड़वा चन्द्रमा कांसा सफेद नमकीन मंगल तांबा लाल (जला हुआ) तिक्त (तीखा) बुध सीसा हरा मिला-जुला बृहस्पति सोना पीला मीठा शुक्र चाँदी सफेद या धब्बेदार खट्टा शनि लोहा काला (पुराना) कसैला विशेष यह है कि मंगल से—अग्नि से जला हुआ कपड़ा तथा शनि से पुराना जीर्ण वस्त्र समझना चाहिये। सूर्य का स्वाद कड़वा और मंगल का तिक्त या तीखा बताया गया है। भारतीय पद्धति में मधुर कटु, अम्ल, तिक्त, कषाय और लवण ये छः रस माने गये हैं सो छः ग्रहों के छः रस अलग-अलग बताये गये हैं। बुध का मिला जुला। भास्वग्दीष्पतिचन्द्रजक्षितिभुवां स्याद्दक्षिणे लाञ्छनं शेषाणामितरत्र तिग्मकिरणात्कट्यां शिरःपृष्ठयोः। कक्षेंऽसे वदने च सक्थिचरणे चिह्नं वयांस्यर्कतो नेमे नाथ तटं नखं नग सनि ज्ञानाढ्य नग्नाटनम् ॥३२॥ अब ग्रहों के चिह्न स्थान किस ओर (दाहिनी ओर या बायीं ओर), तथा ग्रहों की अवस्था (उम्र) बतायी जाती है। सूर्य दाहिनी ओर कूल्हे पर या कमर पर उम्र ५० वर्ष चन्द्र बायीं ओर सिर पर ,, ७० ,, मंगल दाहिनी ओर पीठ पर ,, १६ ,, बुध दाहिनी ओर १बगल में ,, २० ,, बृहस्पति दाहिनी ओर कंधे पर ,, ३० ,, शुक्र बायीं ओर चेहरे पर ,, ७ ,, शनि बायीं ओर पैर (टांग) में ,, १०० ,, १. बगल—कांख।

दूसरा अध्याय : ग्रह भेद ५१ राहु की भी अवस्था १०० कही गयी है। जहां सौ वर्ष की संख्या बतायी गई.है वहां पूरे सौ वर्ष न समझकर अति वृद्ध समझना चाहिये । चोरी आदि के प्रश्न के फलादेश में जो चिह्न (लाँछन या लहसन) शरीर का भाग और अवस्था आदि बतायी गई है उससे सहायता मिल सकती है । नीलद्युतिर्दीर्घतनुः कुवर्णः पामी सपाषण्डमतः सहिक्कः । असत्यवादी कपटो च राहुः कुष्ठी परान्निन्दति बुद्धिहीनः ॥३३॥ रक्तोग्रदृष्टिर्विषवागुदग्रदेहः सशस्त्रः पतितश्च केतुः । धूम्रद्युतिर्धूमप एव नित्यं व्रणाङ्किताङ्गश्च कृशो नृशंसः ॥३४॥ सीसं च जीर्णवसनं तमसस्तु केतो- मृद्भाजनं विविधचित्रपटं प्रदिष्टम् । मित्राणि विच्छनिसितास्तमसोर्द्वयोस्तु भौमः समो निगदितो रिपवश्च शेषाः ॥३५॥ अब राहु केतु का कुछ विशेष परिचय देते हैं । राहु का दीर्घ शरीर है, नीला रंग है, इसकी म्लेच्छ जाति, शरीर में खुजली या चर्म रोग है यह अधार्मिक, पाखण्डमति है । इसको हिचकियां आती हैं, झूठ बोलता है । कपटी है, कोढ़ी है, बुद्धिहीन है और दूसरों की निन्दा करता है । केतु की आंखें लाल और उग्र हैं, उसकी वाणी में विष है, ऊंचा शरीर, शस्त्र धारण किये है, धुयें का-सा उसके शरीर का रंग है और सदैव धूम्रपान, (सिगरेट पीना) आदि करता रहता है । उसके शरीर में व्रणों (घावों) के निशान हैं। शरीर से कृश है परन्तु स्वभाव से क्रूर और अत्याचार करने वाला है । यह जाति से भी पतित है । इन लक्षणों का प्रयोजन क्या ? यदि किसी मनुष्य के द्वितीय स्थान में केतु हो तो वह कठोर वचन बोलने वाला होगा । यदि राहु की अन्तर्दशा में किसी व्यक्ति