फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय : ग्रह भेद ४७ ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार है। सूर्य और मंगल तेज के अधिष्ठाता हैं और दृष्टि (देखने की शक्ति) पर इनका अधिकार है । चन्द्रमा और शुक्र का रसनेन्द्रिय पर विशेष अधिकार है क्योंकि यह दोनों जल तत्व के अधिष्ठाता हैं । बुध घ्राणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है । क्योंकि इसमें पृथ्वी तत्व अधिक है। बृहस्पति आकाश तत्व प्रधान होने से श्रवणेन्द्रिय का अधिष्ठाता है। शनि, राहु और केतु वायु के अधिष्ठाता हैं और इनसे स्पर्श का विचार करना चाहिये । प्रयोजन क्या ? यदि बृहस्पति पीड़ित होगा तो मनुष्य बहरा हो जावेगा या कम सुनेगा। राहु, गुलिक और केतु सूर्य के शत्रु हैं इस कारण मनुष्य की आत्मा और शरीर को कष्ट पहुंचाते हैं ॥२५॥ क्षीणेन्द्वर्ककुजाहिकेतुरविजाः पापाः सपापश्च वित् क्लीबाः केतुबुधार्कजाः शशितमःशुक्राः स्त्रियोऽन्ये नराः । रुद्राम्बागुहविष्णुधातृकमलाकालाह्वजा देवताः सूर्यादग्निजलाग्निभूमिखपयोवाय्वात्मकाः स्युर्ग्रहाः ॥२७॥ क्षीण चन्द्रमा सूर्य, मंगल, राहु, केतु और शनि पाप ग्रह हैं। यदि बुध पाप ग्रहों के साथ बैठा हो तो पापी; यदि शुभ-ग्रह के साथ बैठा हो तो शुभ। ऊपर जो क्षीण चन्द्रमा, सूर्य आदि जिस क्रम से ग्रहों का नाम लिखा गया है उसी क्रम से उन्हें क्रमशः अधिकाधिक पापी समझना चाहिये । यह ग्रन्थकार का अभिप्राय मालूम होता है। बहुतों के मत से पापी केवल मंगल, शनि, राहु, केतु होते हैं। सूर्य क्रूर होता है पापी नहीं। बुध और चन्द्रमा स्वभावतः शुभ ग्रह हैं। बुध केतु और शनि नपुंसक हैं। चन्द्रमा राहु और शुक्र स्त्री ग्रह हैं । सूर्य, मंगल और बृहस्पति पुरुष ग्रह हैं। सूर्य का अग्नि तत्व है, इसका अधिष्ठाता देवता रुद्र है। चन्द्रमा का १. गुलिक शनि का बेटा है, यह कोई ग्रह नहीं है। इसका स्थान बदलता रहता है ।